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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 330 में से

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ग्रन्थों के ही विपरीत जाता है। इस प्रकार 'दिङ्नाग', 'वसुबन्धु', 'नागार्जुन'
आदि बौद्ध आचार्यों का खण्डन 'वार्तिक' में जगह-जगह मिलता है।
सिद्धान्त की दृष्टि से वार्तिककार सूत्रकार से अनेक स्थलों पर आगे बढ़ गये
हैं। जिन बातों का वर्णन सूत्र में नहीं है और न हो सकता था इस प्रकार के
अनेक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों का उल्लेख वार्तिक में हुआ है और वहीं से उत्तरवर्ती
न्याय साहित्य में आया है। इस प्रकार के सिद्धान्तों में से कुछ इस प्रकार हैं—
प्रत्यक्ष प्रकरण में—षोढा सन्निकर्ष।
अनुमान प्रकरण में—अनुमान के केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकी और अन्वय-
व्यतिरेकी वह तीन प्रकार के भेद।
शब्द प्रकरण में—स्फोटानुसार पूर्वपूर्ववर्णानुभवजनित-संस्कारसहकृत-चरम
वर्ण के श्रवण से उत्पन्न पद तथा वाक्य की प्रतीति।
३—श्री वाचस्पति मिश्र ( ८४० वि० )
न्यायवार्तिक की भी बौद्ध विद्वानों की ओर से कुछ प्रतिकूल आलोचना हुई।
उसके उद्धार के लिए वाचस्पति मिश्र को 'न्यायवार्तिक-तात्पर्यटीका' लिखने
की आवश्यकता पड़ी। वाचस्पति मिश्र मिथिला के रहनेवाले अति प्रतिभाशाली
विद्वान् थे। उनके गुरु का नाम त्रिलोचन था, सभी दर्शनों पर उनका समान
अधिकार था और सभी दर्शनों पर उनके महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ मिलते हैं जिनमें
सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान 'वेदान्त दर्शन' के 'शाङ्कर भाष्य' की टीका 'भामती' का
है। टीका का यह नामकरण उन्होंने अपनी पत्नी के नाम पर किया है।
उनके विषय में प्रसिद्ध है कि वे एक बड़े विरक्त और सच्चे दार्शनिक विद्वान्
थे। विवाहित होते हुए भी वे सदा गृहस्थ धर्म से पराङ्मुख रहे और अनवरत
रूप से गम्भीर मनन और दार्शनिक साहित्य की सृष्टि में प्रयत्नशील रहे।
वृद्धावस्था के आने तक उनके कोई सन्तान नहीं हुई तो एक दिन उनकी
पत्नी ने दुःखी होकर वंश की रक्षा और नाम चलाने की आवश्यकता की ओर
उनका ध्यान दिलाया। इस पर उन्होंने पत्नी को जो उत्तर दिया वह विश्वसाहित्य
की सर्वोच्च भावनाओं में से एक है।
उन्होंने कहा-पुत्र के होने पर भी तुम्हारा नाम और वंश चलता रहे इसका क्या
ठिकाना। मैं अब तक उस ओर नहीं गया, अब क्या जाऊँ। पर हाँ तुम्हारे नाम
को अमर करने के लिए मैं अपनी सर्वोत्तम कृति वेदान्त भाष्य की टीका का
नाम तुम्हारे नाम पर रख देता हूँ। तुम्हारा पुत्र संभव है एक या दो पीढ़ी
तुम्हारा नाम चलाता, परन्तु अब तुम्हारा नाम सदा के लिए अमर हो जायगा'।
और सचमुच आज 'वाचस्पति मिश्र' और 'भामती' की इस युगल
जोड़ी का नाम भारतीय साहित्य में सदा के लिए अमर हो गया है जो उनके
सैकड़ों पुत्रों और सहस्रों पौत्र-प्रपौत्रों से भी नहीं होता। ऐसे महापुरुष का पावन
चरित्र पढ़ कर हमारा हृदय गद्गद् और शरीर रोमाञ्चित हो उठता है। यह त्याग,