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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 330 में से

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पृष्ठ 34

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हरणरूप में भात बनाने का वर्णन किया है जो उस देश का विशेष भोजन है। इन
सबसे प्रतीत होता है कि वात्स्यायन द्रविड़ देश के रहने वाले ही थे।
वात्स्यायन के जो नाम 'अभिधान-चिन्तामणि' में दिए हैं उनमें 'कौटिल्य' और
'चणकात्मज' यह दो नाम भी हैं। नन्दवंश के विध्वंसक और मौर्य साम्राज्य के
संस्थापक आर्य चाणक्य का नाम भारतीय इतिहास में अत्यन्त प्रसिद्ध है।
कौटिल्य भी उन्हीं का दूसरा नाम है। अब यदि 'अभिधान-चिन्तामणि' में 'वात्स्यायन'
के जो नाम दिए हैं वह सब वस्तुतः एक ही व्यक्ति के नाम हैं तो यह मानना
पड़ेगा कि आर्य चाणक्य ही वात्स्यायन नाम से न्यायदर्शन के भाष्यकार हैं।
वात्स्यायन भाष्य के प्रथम सूत्र के अन्त में आर्य चाणक्य-प्रणीत 'कौटिल्य
अर्थशास्त्र' नामक ग्रन्थ से एक श्लोक भी उद्धृत किया गया है, जो इस प्रकार है-
प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् ।
आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्तिता ।
वात्स्यायन के नाम से ही वर्तमान समय में कामशास्त्र के आधारभूत
'कामसूत्र' मिलते हैं। अत एव अभिधान-चिन्तामणि के अनुसार 'न्याय भाष्य',
'कौटिल्य-अर्थशास्त्र' और 'कामसूत्र' तीनों के रचयिता एक ही व्यक्ति हैं। परन्तु
श्री सतीश चन्द्र विद्याभूषण जी इससे सहमत नहीं हैं।
वात्स्यायन का समय—
प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक 'दिङ्नाग' [ ५०० वि० सं० ] ने अपने 'प्रमाणसमुच्चय'
नामक ग्रन्थ में 'वात्स्यायन भाष्य' के अनेक अंशों की आलोचना तथा खण्डन
किया है। इससे यह निश्चित है कि वात्स्यायन, दिङ्नाग से पूर्ववर्ती अर्थात्
५०० वि० सं० से पूर्व के हैं।
दूसरे प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक 'वसुबन्धु' हैं जिनका समय ४८० वि० सं० है।
उन्होंने अनुमान की जिस प्रणाली का तथा अवयवों का जो निरूपण किया है वह
'वात्स्यायन भाष्य' की प्रणाली से सर्वथा भिन्न है। यह प्रणाली यदि 'वात्स्यायन'
के सामने आई होती तो वे अवश्य उसकी आलोचना करते। अत एव यह प्रतीत
होता है कि 'वात्स्यायन', 'वसुबन्धु' के भी पूर्ववर्ती हैं।
परन्तु जैसा कि पहले कहा जा चुका है न्यायसूत्रों में अनेक ऐसे [ प्रक्षिप्त ]
सूत्र हैं जिनमें बौद्ध-सिद्धान्तों का निर्देश है और वह 'माध्यमिक सूत्र' तथा 'लङ्का-
वतार' के आधार पर है। अत एव वात्स्यायन का काल उक्त ग्रन्थों के पश्चात् ही
निश्चित होगा।
मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त का काल ३०० वि० ऐतिहासिक विद्वानों
ने निर्धारित किया है और उपर्युक्त प्रमाणों के आधार पर भी उनका समय भी
४०० वि० सं० के लगभग ही निश्चित होता है। अत एव इससे इस बात की भी
पुष्टि होती है कि 'वात्स्यायन' और 'कौटिल्य' सम्भवतः एक ही व्यक्ति हैं।
३ त० भू०