तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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भारत की राजनीतिक स्थिति में परिवर्तन हो जाने पर मुख्यतः राज्याश्रय से
पोषित बौद्ध धर्म अधिक काल तक भारत में ठहर नहीं सका। प्रतिकूल
परिस्थितियों के उत्पन्न होते ही बौद्ध विद्वान् भारत को छोड़कर अपने अधिक
अनुकूल पड़ने वाले तिब्बत, लङ्का आदि देशों को चले गये। इसलिये सन् ११००
में 'मोक्षाकर गुप्त' की 'तर्कभाषा' की रचना के बाद 'बौद्ध न्याय' की प्रगति एक
दम रुक गई। परन्तु 'जैन धर्म' उन प्रतिकूल परिस्थितियों में दृढ़तापूर्वक भारत
में ही जमा रहा। इसलिये उसका साहित्य निर्माण का कार्य चलता ही रहा।
और १६८८ तक 'यशोविजय' की सुन्दर दार्शनिक कृतियाँ प्राप्त होती रहीं। इस
प्रकार इतने लम्बे समय में 'बौद्ध न्याय' तथा 'जैन न्याय' का जो साहित्य तैयार
हुआ उसकी सूची हम आगे दे रहे हैं। इसी को हम 'मध्य न्याय' का साहित्य
कह सकते हैं।