तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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(ख) दूसरे प्रकार के 'प्रकरण ग्रन्थ' वे हैं जो मुख्यतः न्याय के ग्रन्थ होते हुए भी
वैशेषिक दर्शन के पदार्थों का भी समावेश कर लेते हैं। इस प्रकार के ग्रन्थों में
'श्रीवरदराज' को 'तार्किकरक्षा' और 'केशवमिश्र' की 'तर्कभाषा' के नाम लिए जा
सकते हैं। इन दोनों ने न्याय के षोडश पदार्थों का वर्णन किया है और दोनों ने
'वैशेषिक' के द्रव्यादि पदार्थों का अन्तर्भाव 'प्रमेय' में कर लिया है। इनमें से
वरदराज का समय लगभग ११५० और केशवमिश्र का समय लगभग १२७५ है।
(ग) तीसरे प्रकार के 'प्रकरण ग्रन्थ' वे हैं जो मुख्यतः 'वैशेषिक' के ग्रन्थ हैं
परन्तु न्यायदर्शन के 'प्रमाण' पदार्थ का पूर्णरूप से उनमें समावेश हो गया है।
इनमें से कुछ में 'प्रमाण' का अन्तर्भाव 'वैशेषिक' के 'गुणप्रकरण' में किया गया है
और कुछ में 'आत्मप्रकरण' में जो कि द्रव्य का एक भेद है। न्याय और वैशेषिक के
पदार्थों को इस प्रकार मिलाकर प्रतिपादन करने की शैली भी श्री उदयन के बाद
विशेष रूप से प्रचलित हुई। उदयन ने अपनी 'लक्षणावली' में वैशेषिक दर्शन
के सात [अभाव सहित] पदार्थों का वर्णन किया है। परन्तु उनमें न्याय के प्रमाण'
पदार्थ का निरूपण नहीं है। उससे पूर्व केवल 'प्रशस्तपादभाष्य' में 'प्रमाण' का भी
समावेश हुआ है। इस प्रकार के ग्रन्थों में १२वीं शताब्दी के 'वल्लभाचार्य' की
'न्यायलीलावती', 'अन्नंभट्ट' [ १६२३], का 'तर्कसंग्रह', विश्वनाथ न्यायपञ्चानन'
[ १६३४ ] का 'भाषापरिच्छेद', 'लौगाक्षि भास्कर' की 'तर्ककौमुदी' के नाम लिए
जा सकते हैं।
(घ) चौथे प्रकार के प्रकरण ग्रन्थ वे हैं जिनमें कुछ न्याय और कुछ वैशेषिक
के पदार्थों का निरूपण है जैसे 'शशधर' [ ११२५ ] का 'न्यायसिद्धान्तदीप' ।
इसी प्रकरण में 'सर्वदर्शनसंग्रह' के लेखक श्री 'माधवाचार्य' के नाम का भी
उल्लेख कर देना चाहिए।
तत्त्वचिन्तामणि (एक युग प्रवर्तक ग्रन्थ) —
पिछले प्रकरण में हमने जिन प्रकरण ग्रन्थों का उल्लेख किया है, वह सब
नव्यग्रन्थ होते हुए नव्यन्याय के महत्वपूर्ण ग्रन्थ नहीं हैं। नव्यन्याय के साहित्य
में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान 'गङ्गेशोपाध्याय' के 'तत्त्वचिन्तामणि' नामक ग्रन्थ
का है। इसे ही वस्तुतः नव्यन्याय का आधारभूत ग्रन्थ और 'गङ्गेशोपाध्याय को
नव्यन्याय का पिता माना जाता है। इस ग्रन्थ ने न्यायशास्त्र के इतिहास में
वस्तुतः एक नवीन युग की सृष्टि की है। अब तो संस्कृत शिक्षा पर भी कुछ आंग्ल
पद्धति का प्रभाव दिखाई देने लगा है। परन्तु अब से केवल एक पीढ़ी पूर्व तक
'तत्त्वचिन्तामणि' या उसके किसी एक खण्ड को पढ़े बिना दार्शनिक पाण्डित्य प्राप्त
करना असम्भव समझा जाता था।
इस ग्रन्थ के रचयिता श्री गङ्गेशोपाध्याय एक मैथिल विद्वान् थे जिन्होंने
सन् १२०० के लगभग इस ग्रन्थ की रचना की। अपने निर्माण काल से ही यह
ग्रन्थ मैथिल सम्प्रदाय की शिक्षा का चरम उद्देश्य बन गया। केवल इस ग्रन्थ का