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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 330 में से

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पृष्ठ 39

[ ३८ ]
मध्य न्याय
'प्राचीन न्याय' का संक्षिप्त परिचय हम ऊपर दे चुके हैं । 'नव्य-न्याय' का
परिचय आगे देंगे । इन दोनों के बीच में न्याय साहित्य का एक स्तर और है
जिसे हम 'मध्य-न्याय' कह सकते हैं । इस 'मध्य-न्याय' के भी दो भाग हैं एक
'बौद्ध-न्याय' और दूसरा 'जैन-न्याय' । बौद्ध और जैन-भारत के दो प्रमुख धर्म हैं
जिनका उदय ईसा के पूर्व छठी शताब्दी में हुआ था । परन्तु बौद्ध और जैन
न्याय उतने प्राचीन नहीं हैं । वास्तविक बौद्ध-न्याय का प्रारम्भ पञ्चम शताब्दी वि०
में आचार्य दिङ्नाग [ ४५०-५२० ] से, और वास्तविक 'जैन-न्याय' का प्रारम्भ
आचार्य सिद्धसेन दिवाकर [ ४८०-५५० ] से होता है । उनके पूर्व इन दोनों धर्मों
का लगभग एक हजार वर्ष से अधिक का इतिहास है । इस एक हजार वर्ष के
लम्बे काल में दोनों धर्मों में पर्याप्त दार्शनिक प्रगति हुई है । बौद्ध धर्म में इस
बीच सौत्रान्तिक, वैभाषिक, माध्यमिक तथा योगाचार नाम से चार दार्शनिक
सम्प्रदायों का विकास हो चुका था और नागार्जुन, असङ्ग, वसुबन्धु सरीखे
दार्शनिक यहाँ जन्म ले चुके थे । इसी प्रकार जैन धर्म में भी उपास्वाति जैसे
प्रकाण्ड दार्शनिक 'तत्त्वार्थाधिगम सूत्र' सदृश प्रौढ़ ग्रंथों की रचना कर चुके थे ।
परन्तु वह वस्तुतः उन दोनों धर्मों का 'प्रमेय प्रधान' युग था । महात्मा बुद्ध एवं
महावीर स्वामी ने जिस धर्म का उपदेश किया वह 'प्रमेय प्रधान' धर्म था । उसकी
विवेचना के लिये उन्होंने आवश्यकतानुसार उस समय की प्रचलित न्याय आदि
की प्रणालियों को ही अपना लिया था । इसलिये उन प्रारम्भिक एक सहस्र वर्षों
में हमें 'बौद्ध न्याय' या 'जैन न्याय' की अलग उपलब्धि नहीं होती है । पञ्चम
शताब्दी वि० में आकर बौद्धों में आचार्य दिङ्नाग ने, और जैनों में आचार्य
सिद्धसेन दिवाकर ने क्रमशः 'प्रमाण समुच्चय' एवं 'न्यायावतार' ग्रन्थ लिख कर
'बौद्ध न्याय' तथा 'जैन न्याय' को स्वतन्त्र स्वरूप एवं नवीन विवेचना शैली से
उपस्थित किया । इसीलिये आचार्य 'दिङ्नाग' 'बौद्ध न्याय' के तथा 'सिद्धसेन
दिवाकर' 'जैन न्याय' के प्रवर्त्तक या जन्मदाता माने जाते हैं ।
दिङ्नाग [ ४५०-५२० ई० ]
न्याय दर्शन के भाष्यकार 'पक्षिल स्वामी' या 'वात्स्यायन' 'काञ्जीवरम्' के
रहने वाले थे । इसी प्रकार बौद्ध न्याय के जन्मदाता आचार्य 'दिङ्नाग' भी
'काञ्चीवरम्' के एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुये थे । बौद्धों की 'वात्सी
पुत्रीय' शाखा के अनुयायी 'नागदत्त' नामक पण्डित ने उनको बौद्ध धर्म में
दीक्षित किया । उन्हीं से दिङ्नाग ने हीनयान के अनुसार त्रिपिटकों का अध्ययन
किया । उसके बाद प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान् वसुबन्धु से उन्होंने हीनयान तथा महा-
यान के त्रिपिटक आदि का अध्ययन किया । अपनी प्रखर तर्क शक्ति के कारण वे
'तर्क पुङ्गव' कहे जाते थे । उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उस समय के प्रसि-
द्धतम 'नालन्दा विश्वविद्यालय' ने उनको अपने यहाँ निमन्त्रित किया था ।