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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 330 में से

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पृष्ठ 44

[ ४३ ]

बौद्ध न्याय के निर्माता आचार्य

१८ अशोक [ ९०० ई० ]—
१ अवयविनिराकरण
२ सामान्यदूषण दिक् प्रसारिता
१९ चन्द्रगोमिन् [द्वितीय, ९२५ ई०]—
न्याय सिद्ध्यालोक
२० प्रज्ञाकर गुप्त [ ९४० ई० ]—
प्रमाण वार्तिकालङ्कार
सहावलम्बनिश्चय
विक्रमशिला विश्वविद्यालय के दक्षिण
द्वार के द्वारपाल प्रज्ञाकरमति [९८३]
इनसे भिन्न थे ।
२१ आचार्य जेतारि [ ९८० ई० ]—
१ हेतुतत्त्वोपदेश, २ बालावतारातर्क
३ धर्मधर्मिविनिश्चय
२२ जिन [ ९४० ई० ]—
प्रमाण वार्तिकालङ्कार टीका
२३ रत्नकीर्ति [ १००० ई० ]—
१ अपोहसिद्धि, २ क्षणभङ्गसिद्धि
२४ रत्नवज्र [ १०४० ई० ]—
‘युक्ति प्रयोग’
२५ जिनमित्र [ १०२५ ई० ]—
न्यायविन्दु पिण्डितार्थ
२६ दानशील [१०२५ ई०] पुस्तक पाठोपाय
२७ ज्ञान श्री मित्र [ १०४० ई० ]—
‘कार्यकारणभावसिद्धि’
२८ ज्ञान श्री भद्र [ १०५० ई० ]—
‘प्रमाण विनिश्चय टीका’

जैन न्याय के निर्माता आचार्य

१८ देवसूरी [ १०८६ ई० ]—
१ प्रमाणनयतत्त्वालोकालङ्कार
२ स्याद्वाद रत्नोकर
[ प्रमाणनयतत्त्वालोकालङ्कार टीका ]
१९ चन्द्रप्रभ सूरि [ ११०२ ई० ]
दर्शनशुद्धि या प्रमेयरत्नकोष
न्यायावतार वृत्ति
२० हेमचन्द्रसूरी [ १०८८-११७२ ई० ]-
१ प्रमाण मीमांसा
२ अभिधान चिन्तामणि
३ काव्यानुशास्त्रवृत्ति
४ छन्दोनुशास्त्रवृत्ति
५ अनेकार्थसंग्रह, ६ द्व्याश्रर्यमहाकाव्य
७ त्रिषष्टि शलाका पुरुष चरित
८ योगशास्त्र, ९ निघण्टु शेष
२१ नेमिचन्द्र कवि [ ११५० ई० ]—
‘पार्श्वनाथ चरित’ में कणाद के खण्डन
करने का वर्णन है । ग्रन्थ नहीं मिलता।
२२ आनन्द सूरी [ व्याघ्र शिशुक ]
[ १०९३-११३५ ]—
२३ अमर चन्द्र सूरी [ सिंहशिशुक ]
‘सिंह व्याघ्र लक्षण’ प्रवर्त्तक
२४ हरिभद्रसूरी [ ११२० ई० ]
१ षड् दर्शन समुच्चय
२ न्याय प्रवेश सूत्र
३ न्यायावतार वृत्ति
४ दशवैकालिकानियुक्ति टीका
२५ पार्श्वदेव गणी [ ११३३ ई० ]—
‘न्यायप्रवेश पञ्जिका’
२६ श्रीचन्द्र [११३७]-न्यायप्रवेशटिप्पण
२७ देवभद्र [ ११५० ई० ]—
‘न्यायावतार टिप्पण’
२८ चन्द्रसेन सूरी ११५० ई० ]—
‘उत्पाद सिद्धि प्रकरण’