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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 330 में से

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[ २६ ]
अनुरूप उस प्रमेय या आत्मप्रधान न्यायशास्त्र को प्रमाणप्रधान शास्त्र का स्वरूप
मिला। न्यायशास्त्र ने अपने इस नवीन रूप में भी अपना मुख्य ध्येय तो
आत्मज्ञान ही रखा, इसमें सन्देह नहीं, परन्तु ध्येय होते हुये न्यायशास्त्र प्रमाणों के
विस्तृत विवेचन में चला गया और उसके सामने आत्मा का विवेचन गौण पड़
गया है। न्यायशास्त्र के वर्तमान स्वरूप में प्रमाणों के विवेचन का ही प्राधान्य है।
इसका परिचय न केवल उत्तरवर्ती न्याय साहित्य से ही अपितु वात्स्यायन भाष्य
और मूलसूत्रों से भी भली-भाँति मिलता है। न्यायशास्त्र के प्रथम सूत्र—प्रमाण
प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्त-अवयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-वितण्डा-
हेत्वाभास-छल-जाति-निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः' में जिन षोडश
पदार्थों के तत्त्वज्ञान को निःश्रेयस का साधन बताया है, उनमें भी सर्वप्रथम स्थान
प्रमाण का रखा है और आत्मा का साक्षात् स्थान भी नष्ट कर प्रमेयों के भीतर
उसकी गणना की है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि वर्तमान न्यायशास्त्र ने
प्रमाणादि को अत्यधिक प्रधानता दी है। और उसका समर्थन करते हुए वात्स्यायन
भाष्य में लिखा है—
‘तेषां पृथगभिधानमन्तरेण अध्यात्मविद्यामात्रमियं स्याद् यथोपनिषदः'
अस्तु । न्यायशास्त्र अपने ‘अध्यात्मप्रधान' स्वरूप को छोड़कर इस नवीन रूप
में कब से आया यह कह सकना और भी कठिन है। ‘गोल्डस्टकर'१ का विचार है कि
न्यायशास्त्र का परिज्ञान पाणिनि को था और उनके बाद चतुर्थ शताब्दी B. C. में
कात्यायन को भी इन न्यायसूत्रों का परिज्ञान था। अतएव इसके पूर्व न्यायशास्त्र को
यह नवीन रूप कदाचित् प्राप्त हो चुका था। और उसका नवीन रूप में संस्करण
करने का श्रेय कदाचित् श्री अक्षपाद को दिया जाना चाहिए।
क्या भारतीय न्याय पर यूनानी प्रभाव है ?—
इसी प्रसङ्ग में हम डा० सतीशचन्द्र विद्याभूषण की एक और अद्भुत कल्पना
का भी उल्लेख कर देना चाहते हैं। आपने अपने एक लेख में२ बड़े समारम्भ के
साथ यह सिद्ध करने का यत्न किया है कि भारतीय न्यायशास्त्र को वर्तमानरूप
देने में ग्रीक दर्शन का बहुत बड़ा हाथ है। विशेषतः अनुमान में ‘पञ्चावयव वाक्य’
की प्रक्रिया का विकास भारत में बहुत पीछे हुआ उसके बहुत पूर्व ग्रीक में
‘अरिस्टाटिल’ ने इस ‘पञ्चावयव वाक्य’ की प्रक्रिया को परिपूर्ण और सुव्यवस्थित
रूप में प्रस्तुत कर दियाथा। आपने अपने विषय का उपपादन इस प्रकार किया है—
But so far as the five limbed syllogism of Hindu Logic is concerned
the Hindu logician may have been indebted some way or other to the
Greeks. While the syllogism definitely formulated as a logical doctrine
१. Gold stucker's panini P. P. 157
२. जनरल आफ रायल एशियाटिक सोसाइटी आफ ग्रेट ब्रिटेन एण्ड आयलैण्ड ।