तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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अष्टाध्यायी के जिन दो सूत्रों का उल्लेख 'गोल्डस्टकर' महोदय ने किया है
उसके अतिरिक्त अन्य स्थलों पर भी न्याय का उल्लेख पाणिनि की अष्टाध्यायी में
मिलता है। यही नहीं अपितु चतुर्थ अध्याय के द्वितीय पाद के 'क्रतूक्थादिसूत्रा-
न्ताट्ठक्' ४, २, ६० के सूत्रान्तर्गत उक्थादि गण के 'गणपाठ' में 'न्याय' शब्द का
पाठ कर पाणिनि ने 'नैयायिक' शब्द की सिद्धि की है। ठक् प्रत्यय का विधान
करने वाला यह सूत्र 'तदधीते तद्वेद' इस अर्थ में ठक् का विधान करता है, जिससे
'नैयायिक' शब्द का अर्थ 'न्यायमधीते नैयायिकः' होता है। इस प्रकार पाणिनि
की अष्टाध्यायी और गोल्डस्टकर महोदय का ऐतिहासिक विवेचन सतीश बाबू की
कल्पना की निस्सारता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है।
प्राचीन न्याय का साहित्य
जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है न्यायशास्त्र का प्रारम्भ कब से हुआ यह निश्चित
रूप से कह सकना कठिन है। परन्तु फिर भी गोल्डस्टकर और उसके आधारभूत
पाणिनि-सूत्रों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि न्यायशास्त्र बहुत पुरानी
और सम्भवतः नहीं, निश्चित रूप में पाणिनि से पूर्व की चीज़ है। न्यायशास्त्र का सबसे
पुराना ग्रन्थ जो इस समय मिलता है वह न्यायसूत्र है। परन्तु यह नहीं कहा जा
सकता कि यह न्यायसूत्र ठीक इसी रूप में पाणिनि के पूर्व की चीज है। इस बात
के अनेक प्रमाण हैं कि न्यायसूत्रों के अनेक सूत्र अत्यन्त आधुनिककाल के हैं। जिन
सूत्रों में बौद्ध सिद्धान्तों का खण्डन हुआ है उनकी रचना बौद्धकाल के बाद की है
बौद्ध मत की आलोचना के प्रकरण में लिखे गए अनेक सूत्रों के शब्द-विन्यास से
यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि वह सूत्र बौद्ध ग्रन्थों के आधार पर लिखे गए हैं। दोनों
की, विषय के साथ आनुपूर्वी और शब्दविन्यास में भी कुछ समानता है।
उदाहरण के लिए हम ऐसे कुछ सूत्र नीचे उद्धृत करते हैं—
| माध्यमिक सूत्र | न्याय सूत्र |
| नसंभवः स्वभावस्य युक्तः प्रत्ययहेतुभिः। | न स्वभावसिद्धिरापेक्षिकत्वाद् । |
| स्वभावः कृतको नामभविष्यति पुनः कथम् | व्याहतत्वादयुक्तम् । |
| ( माध्यमिक सूत्र. अ. १५. पृ. ९३ ) | ( न्या. सू. अ. ४. १ ३९-४० ) |
| ( B. T. S. Edition, Calcutta ) | स्वप्नविषयाभिमानवदयं प्रमाणप्रमेया- |
| यथा माया यथा स्वप्नो गन्धर्वनगरं यथा । | भिमानः । ( ४. २. ३१ ) |
| तथोत्पादस्तथा स्थानंतथा भङ्ग उदाहृतम्॥ | माया-गन्धर्वनगर-मृगतृष्णिकावद्वा । |
| ( मा. सू. अ. ७. ) | ( ४. २. ३२. ) |
१. उक्थ, लोकायत, न्यास, न्याय, पुनरुक्त, निरुक्त, निमित्त, द्विपदा, ज्योतिष, अनुपद्,
अनुकल्प, यज्ञ, धर्म, चर्चा, क्रमेतर, श्लक्षण, संहिता, पदक्रम, संघट, वृत्ति, परिषद्,
संग्रह, गण [गुण], आयुर्वेद । इत्युक्थादिः ॥ ४,२,६० ॥ (गणपाठ, ४. २. ६०. पा.)