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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 330 में से

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पृष्ठ 46

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नव्य न्याय
भारत में बौद्ध धर्म के पतन के बाद, भारतीय इतिहास के एक नवीन युग
का प्रारम्भ हुआ जिसका प्रभाव भारतीय संस्कृति के अन्य भागों की भांति दार्श-
निक क्षेत्र पर भी पड़ा और न्याय साहित्य के निर्माण में उसने एक नवीन प्रकार
का परिवर्तन उत्पन्न कर दिया। दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दियाँ इस परिवर्तन
का संक्रान्तिकाल थीं। उनमें निर्माण होने वाले न्याय साहित्य की शैली भी बदली
हुई है और १२ वीं शताब्दी में तो उसमें अत्यधिक परिवर्तन हो गया है। इसीलिये
इस काल के न्याय साहित्य को 'नव्य न्याय' शब्द से कहा जाता है। इस नव्य
न्याय के युग में जिस साहित्य का निर्माण हुआ उसकी दो प्रमुख विशेषतायें हैं
जो उसे प्राचीन न्याय से भिन्न करती हैं। प्राचीन न्याय का सारा साहित्य सूत्रों
पर अवलम्बित था। उस समय जो ग्रन्थ बने वे या तो साक्षात् गोतम सूत्रों की
व्याख्या रूप थे या उनके भाष्य की टीका प्रटीका आदि के रूप में लिखे गये थे
और सूत्रक्रम का अवलम्बन कर उनमें प्रतिपादित पदार्थों को सूत्रकार की भावना
के अनुसार समझाने का प्रयत्न करते थे। इस युग में बौद्धों के खण्डन में इतने
विस्तृत न्याय साहित्य का निर्माण हुआ परन्तु 'उदयन' की 'न्यायकुसुमाञ्जलि' और
'आत्मतत्त्व विवेक' को छोड़कर सबका समावेश सूत्रानुसारी व्याख्या पद्धति के
भीतर हो गया। सूत्रों को छोड़कर स्वतन्त्र ग्रन्थ निर्माण की पद्धति उस
समय नहीं थी।
१. परन्तु नव्य न्याय की विशेषताओं में से पहिली विशेषता यह है कि उसके
प्राचीन सूत्र पद्धति की उपेक्षा करके स्वतन्त्र रूप से ग्रंथों का निर्माण प्रारम्भ
किया गया। न केवल न्याय में अपितु व्याकरणादि अन्य शास्त्रों में भी जिस
साहित्य का निर्माण इस काल में हुआ वहाँ भी यही बात स्पष्ट दिखाई देती है।
इसी ने उन शास्त्रों में भी नवीन व्याकरण, प्राचीन व्याकरण और नवीन वेदान्त,
प्राचीन वेदान्त आदि भेद कर दिये हैं। नवीन व्याकरण का आधारभूत सिद्धान्त-
कौमुदी ग्रन्थ लक्षणानुसारिणी प्राचीन आर्षपद्धति को छोड़कर लक्ष्यानुसारिणी
नवीन पद्धति से लिखा गया है। इसी प्रकार न्याय में नव्य पद्धति से जिस
साहित्य का निर्माण हुआ उसमें भी प्राचीन सूत्र पद्धति की सर्वथा उपेक्षा कर
स्वतन्त्र रूप में ग्रन्थों का निर्माण हुआ है।
२. नव्य न्याय की पद्धति की दूसरी विशेषता है पदार्थों के महत्त्व में आपेक्षिक
परिवर्तन। न्याय के षोडश पदार्थों में से जिनका महत्त्व प्राचीन पद्धति में अधिक
था वह नव्य युग में बहुत कम हो गया है और जिनका महत्त्व कम था उनका बढ़
गया है। उदाहरण के लिये प्राचीन न्याय के सूत्रकार ने सारा पाँचवा अध्याय केवल
'जाति' और 'निग्रह स्थान' इन दो पदार्थों के वर्णन में व्यय कर दिया है, परन्तु नव्य
न्याय में उनका उल्लेख केवल नाममात्र को मिलता है। इसके विपरीत अवयव आदि
का वर्णन प्राचीन न्याय की अपेक्षा नव्य न्याय में कहीं अधिक पाया जाता है।