तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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२—वार्तिककार श्री उद्योतकर—[ ६३५ वि० ]
प्राचीन न्याय के साहित्य में 'वात्स्यायन भाष्य, के बाद समय और महत्त्व दोनों
की दृष्टि से दूसरा स्थान 'न्यायवार्तिक' का है इसके निर्माता श्री 'उद्योतकराचार्य'
का समय आधुनिक विद्वानों की दृष्टि में ६३५ वि० के लगभग है। 'उद्योतकर'
के पूर्ववर्ती 'दिङ्नाग' आदि बौद्ध आचार्यों ने 'वात्स्यायन भाष्य' का जो खण्डन
किया उसी का उद्धार करने के लिए उद्योतकर ने इस 'न्याय-वार्तिक' की रचना
की है। उन्होंने स्वयं लिखा है—
यदक्षपादः प्रवरो मुनीनां, शमाय शास्त्रं जगतो जगाद ।
कुतार्किकाज्ञाननिवृत्तिहेतोः, करिष्यते तस्य मया प्रबन्धः ॥
'वासवदत्ता' नामक प्रसिद्ध गद्य काव्य के निर्माता श्री महाकवि 'सुबन्धु' ने
भी अपने ग्रन्थ में न्याय के स्वरूप की रक्षा करने वाले के रूप में उद्योतकर का
स्मरण किया है—
न्यायस्थितिमिवोद्योतकरस्वरूपां, बौद्धसङ्गतिमिवालङ्कार-
भूषिताम्······वासवदत्तां ददर्श।
'पाशुपताचार्य' और 'भारद्वाज' इन दो नामों से भी कहीं-कहीं 'उद्योतकर' का
उल्लेख मिलता है। यह दोनों नाम उनके गोत्र और सम्प्रदाय के कारण प्रसिद्ध हैं।
उन्होंने स्वयं भी विशेषण रूप से अपने लिए इन दोनों शब्दों का प्रयोग किया है-
इति श्रीपरमर्षिभारद्वाज-पशुपताचार्य-श्रीमदुद्योतकर-कृतौ न्यायवार्तिके पञ्चमोऽध्यायः
श्री 'उद्योतकर' ने अपने ग्रन्थ में अधिकतर बौद्ध आचार्य 'दिङ्नाग' और नागार्जुन
का खण्डन किया है और 'दिङ्नाग' के लिए सर्वत्र 'भदन्त¹' शब्द का प्रयोग किया
है जो बौद्ध भिक्षुओं का आदरसूचक शब्द है। नैयायिकों और बौद्धों का सबसे मुख्य
विवाद आत्म तत्त्व के विषय में है। 'उद्योतकर' ने इस प्रश्न को एक विचित्र ढंग से
उठाया है। उनका कहना है कि बौद्ध विद्वान् यदि आत्म तत्त्व का खण्डन करते हैं
तो वह वस्तुतः अपने ही सिद्धान्त और अपने ही धर्म ग्रन्थों के विपरीत बोलते हैं।
संयुक्तनिकाय ३. २. से निम्नांश उद्धृत कर वे उसे आत्मतत्त्व का समर्थक बतलाते हैं—
तथा भारं वो भिक्षवो देशिष्यामि भारहारं च, भारः पञ्चस्कन्धा
भारहारश्च पुद्गल इति । यश्चात्मा नास्तीति स मिथ्यादृष्टिको भवतीति सूत्रम्।
भारं वो भिक्खवे देसिस्सामि । भारहारं च । कतमो भिक्खवे
भारो । पंचुपादान स्कन्धा तिस्स वचनीयम् । कतमो च भिक्खवे
भारहारो । पुग्गलो तिस्स वचनीयम् ।
इसके विपरीत बौद्ध विद्वानों का आत्म तत्त्व का खण्डन करना उनके धर्म
१ अहो प्रमाणानभिज्ञता भदन्तस्य । न्याय वा० १. १. ६.