तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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चतुर्थश्चौपनिषदो धर्मः साधारणः स्मृतः ।
वानप्रस्थाद् गृहस्थाच्च ततोऽन्यः संप्रवर्तते ॥
अस्मिन्नेव युगे तात विप्रः सर्वार्थदर्शिभिः ।
मेधातिथिर्बुधः····································॥
एनं धर्मं कृतवन्तः ।
( महाभा० शा० प०, अ० २४३ श्लो० १४-१७ )
इन श्लोकों से हमारी दोनों धारणाओं की पुष्टि होती है । पहिली यह कि
मेधातिथि गोतम एक ही व्यक्ति हैं और दूसरी यह कि उन्होंने न्यायशास्त्र के
प्रमेय, साध्य या अध्यात्मप्रधान युग का निर्माण किया । कठोपनिषद् के—
शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद् वीतमन्युर्गौतमो माभिमृत्योः ।
त्वत् प्रसृष्टं माभिवदेत् प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥
यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।
एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥
हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।
यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥
( कठोपनि० १. १. १० । २. ४. १५ । २. ५. ६. )
इन उद्धरणों में जिन गौतम का उल्लेख पाया जाता है कदाचित् वे गौतम ही
न्यायशास्त्र के अध्यात्मप्रधान युग के निर्माता हैं । शुक्ल-यजुर्वेदीय-माध्यन्दिनीय
शाखा के शतपथ ब्राह्मण काण्ड १ अ० ४ में भी कदाचित् इन ही गौतम का वर्णन
है । इन्हीं के गोत्र में आगे चलकर गौतम बुद्ध उत्पन्न हुए हैं । श्री सतीशचन्द्र
विद्याभूषण का मत है कि शतपथ ब्राह्मण में गौतम के स्थान आदि का जो
विवरण पाया जाता है वह मिथिला के समीपवर्ती उपरिलिखित 'गौतम स्थान'
से बिल्कुल मिलता जुलता है । [ सन् १९१३ में श्री सतीश बाबू ने 'गौतम स्थान'
की यात्रा स्वयं की थी और उसके बाद ही यह सम्मति दी थी ] इस सम्बन्ध में
उनके शब्द इस प्रकार हैं—
‘His ( Nachikatas Gotam ) remote ancestor was perhaps the sage
Nodha Gotam descended from that Gotama who is described in the
Rigveda ( Mandal I sukt 62 verse 13, 1. 77. 5, 1. 85. 11 ) and Shata-
path Bramhana of the white yajurveda, as having settled in a Place
the description of which tallies with that of Gotama-sthana in Mithila’
( Indian logic, P. P. 19 )
फलतः बहुत प्राचीन काल में महर्षि गौतम ने आत्मविद्या के आचार्य के रूप
में न्यायशास्त्र को जन्म दिया था। उसके बाद कालान्तर में समय की आवश्यकता के