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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 330 में से

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पृष्ठ 33

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उपर्युक्त सारी स्थिति से यही परिणाम निकलता है कि न्याय-सूत्रों की रचना
भी एक काल में नहीं हुई। सबसे पूर्व गोतम के अध्यात्मप्रधान न्यायसूत्र
की रचना हुई। उसके बाद अध्यात्मप्रधान उपनिषद्विद्या से अक्षपाद ने आन्वीक्षिकी
न्याय विद्या को पृथक् करने के लिए उसके प्रमेयप्रधान स्वरूप के स्थान पर
प्रमाणप्रधान स्वरूप देकर अक्षपाद ने उसका नवीन संस्करण किया¹ और बौद्ध
युग में उसमें कुछ प्रक्षेप और परिवर्धन होकर ही न्याय-शास्त्र को वर्तमान
स्वरूप प्राप्त हो सका है।
'न्याय-सूत्रों' के बाद न्याय-शास्त्र का दूसरा पुराना ग्रन्थ 'वात्स्यायन भाष्य'
है जिसका रचनाकाल ४०० वि० (जैकोबी के अनुसार ३००, अन्यों के अनुसार
४०० वि०) के लगभग निर्धारित किया गया है। ४०० वि० से लेकर १००० वि०
तक के ६०० वर्षों में न्याय-शास्त्र के जिस प्रचुर साहित्य का निर्माण हुआ उस
सारे न्याय साहित्य का आधार ग्रन्थ 'न्यायसूत्र' और 'वात्स्यायन भाष्य' हैं। अन्य
जो कुछ भी साहित्य तैयार हुआ वह सभी इन्हीं के समर्थन में और उन्हीं के
टीका-प्रटीका के रूप लिखा गया है। इसी लिए उस सबको 'प्राचीन न्याय' साहित्य
के नाम से कहा जाता है।
यद्यपि न्याय सूत्रों के बाद 'प्राचीन न्याय' के विषय में कोई मौलिक ग्रन्थ नहीं
लिखा गया फिर भी १७ वीं शताब्दी तक प्राचीन न्याय के साहित्य का निर्माण
होता रहा, जो न्याय-सूत्रों की टीका-प्रटीका के रूप में ही था। इसमें से भी ४००
से लेकर १००० वि० तक जिस साहित्य का निर्माण हुआ वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
१—भाष्यकार वात्स्यायन [ ३०० वि० ]—
न्याय दर्शन के भाष्यकार वात्स्यायन कौन हैं यह भी एक विवादग्रस्त प्रश्न
है। 'अभिधानचिन्तामणि' नामक ग्रन्थ में हेमचन्द्र [जैन] ने 'वात्स्यायन' के
अनेक नामों का निर्देश किया है, जो इस प्रकार है—
'वात्स्यायनो मल्लनागः कौटिल्यश्चणकात्मजः ।
द्रामिलः पक्षिलस्वामी, विष्णुगुप्तोऽङ्गुलश्च सः ॥'
इसके अनुसार वात्स्यायन, पक्षिलस्वामी, कौटिल्य और चाणक्य सब एक ही
व्यक्ति के नाम हैं और वह द्रविड़ देश का रहनेवाला प्रतीत होता है जिसकी
राजधानी काञ्चीपुर वर्तमान काञ्चीवरम् थी। इसीलिए उसके नामों में 'द्रामिल'
भी एक नाम है और 'पक्षिलस्वामी' नाम भी उसी देशवासी का नाम जान पड़ता
है। इसके अतिरिक्त न्यायदर्शन अध्याय २, अ० १ सूत्र ४० में वात्स्यायन ने उदा-
१. आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ चरक की रचना भी इसी प्रकार हुई, प्रथम अग्निवेश ने
फिर चरक ने उसका नवीन संस्करण किया जो आजकल उपलब्ध होता है। जैसा
कि 'दृढबल' ने लिखा, अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते।