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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 330 में से

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पृष्ठ 47

[ ४६ ]
३. नव्य न्याय की तीसरी विशेषता है 'प्रकरण ग्रन्थ'। प्रकरण ग्रन्थ एक
पारिभाषिक शब्द है जिसका लक्षण इस प्रकार है—
शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम् ।
आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चितः ॥
अर्थात् शास्त्र के एक अंश के प्रतिपादक और आवश्यकतानुसार अन्य शास्त्र के
उपयोगी अंश को भी प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ भेद को प्रकरण ग्रंथ कहते हैं।
नव्य न्याय में इस प्रकार के जिन अनेक प्रकरण ग्रंथों का निर्माण हुआ है,
उनको हम चार भागों में विभक्त कर सकते हैं।
(क) न्याय के वे प्रकरण ग्रन्थ जो केवल एक प्रमाण पदार्थ का निरूपण करते
हैं। और शेष १५ पदार्थों को प्रमाण के भीतर ही अन्तर्भूत कर लेते हैं। इस प्रकार
के ग्रन्थों में श्री 'भासर्वज्ञ' [ १००० ई० ] के 'न्यायसार' का नाम उल्लेख योग्य है।
'भासर्वज्ञ' सम्भवतः काश्मीर के रहने वाले दशम शताब्दी के दार्शनिक हैं।
केवल एक प्रमाण पदार्थ के प्रतिपादन की यह शैली बौद्ध साहित्य से ली गई
है। भासर्वज्ञ ने अपने सामने की उसी प्रचलित पद्धति से ही न्याय के पदार्थों का
निरूपण कर दिया है। परन्तु उन्होंने न केवल प्राचीन न्याय पद्धति को परिवर्तित
कर दिया है अपितु अनेक सिद्धान्तों को भी परिवर्तित रूप में प्रस्तुत किया है।
उदाहरण के लिये उन्होंने प्रमाण के तीन भेद प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम किये
हैं। जब कि न्यायशास्त्रों में इनके अतिरिक्त 'उपमान' प्रमाण भी माना गया है।
प्रमाणों का यह त्रिविध विभाग न्याय सिद्धान्त की अपेक्षा सांख्य और जैन सिद्धान्त
से अधिक मिलता है क्योंकि वे तीन प्रमाण मानते हैं। लेखक ने अनुमान को
स्वार्थानुमान और परार्थानुमान इन दो भेदों में विभक्त करने में भी बौद्ध और
जैन दार्शनिकों के विभाग का अवलम्बन किया है। और उन्हीं की तरह दृष्टान्ता-
भास एवं हेत्वाभासों का वर्णन किया है। नव्य न्याय के अन्य लेखकों की भाँति
'जाति' और 'निग्रह स्थान' को उन्होंने छोड़ नहीं दिया बल्कि परार्थानुमान के
प्रकरण में उनका भी वर्णन किया है। मोक्ष के सम्बन्ध में भी उनका सिद्धान्त
प्राचीन न्याय से भिन्न है। वे मोक्ष में नित्य आनन्द की अभिव्यक्ति मानते हैं जब
भाष्यकार वात्स्यायन ने अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक उसका खण्डन किया है।
इस प्रकार नव्य पद्धति पर न्यायशास्त्र के इस प्रथम ग्रंथ की रचना दसवीं
शताब्दी में हुई और उसने अपने अनुरूप आदर पाया। उसके ऊपर १८ टीकायें
लिखी गईं जिनमें से मुख्य मुख्य यह हैं—
१. न्यायसार टीका [ विजयसिंह गुणी ]
२. न्यायसार टीका [ जयतीर्थ ]
३. न्यायसार विचार [ भट्ट राघव ]
४. न्यायतात्पर्यदीपिका [ जयसिंह सूरि ]
शेष का उल्लेख ग्रन्थों में मिलता है टीका उपलब्ध नहीं है।