तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
२१६ तर्कभाषा [ जातिबाधकाः
बन जायगा और उस दशा में 'अनवस्था' दोष होगा। जाति में जाति
मानने से जैसे 'घटत्व' जाति में 'घटत्वत्व' सामान्य माना जाने लगेगा। इसी
प्रकार दस घटत्वत्वों में रहने वाला एक और सामान्य घटत्व-त्व-त्व बन जायगा।
और यह परम्परा अनन्त काल तक चलती रहेगी। उसकी कहीं समाप्ति नहीं
होगी। इसलिए 'अनवस्था' दोष होने से जाति में जाति रहने का सिद्धान्त
नहीं माना जा सकता है। अतएव सामान्य पदार्थ, जो जाति स्वरूप है दूसरी
जाति या 'सत्ता सामान्य' को नहीं माना जा सकता है। इसलिए 'अनवस्था-
भयात्' सामान्य' में 'सत्ता' जाति नहीं रहती है यह सिद्ध हुआ ।
इसी प्रकार 'विशेष' में भी 'सामान्य' नहीं माना जा सकता है। 'विशेष'
में यदि 'सामान्य' माना जाय तो उस विशेष का स्वरूप ही नष्ट हो जायगा।
विशेष को अन्तिम भेदक धर्म के रूप में माना गया है और उसका स्वरूप
ही 'स्वतः व्यावृत्त' है। 'नित्यद्रव्यवृत्तयोऽन्त्या विशेषाः'। नित्य द्रव्य परमाणु
आदि में रहने वाले अन्तिम भेदक धर्म को 'विशेष' कहते हैं। और प्रत्येक
परमाणु आदि में रहने वाला 'विशेष' बिल्कुल अलग अलग 'स्वतः व्यावृत्त'
होता है। अब यदि उन अलग अलग विशेषों में 'विशेषत्व' नाम का सामान्य
धर्म या जाति मान ली जाय तो फिर 'विशेष' का जो 'स्वतः व्यावृत्त' स्वरूप है
वही नष्ट हो जायगा। अतएव 'स्वरूपहानि-भयात्' 'विशेष' में 'सामान्य' नहीं
माना जाता है। इसलिए 'विशेष' पदार्थ में भी 'सत्ता' जाति नहीं रहती है।
इसी प्रकार 'समवाय' में भी 'सामान्य' नहीं रहता है। समवाय में 'सामान्य'
के अभाव मानने का कारण 'असम्बन्ध' है । अर्थात् यदि समवाय में 'समवा-
यत्व' जाति मानें तो जाति 'समवाय' सम्बन्धसे ही व्यक्ति में रहती है इसलिए
समवाय में भी 'समवाय' सम्बन्ध से ही जाति रहेगी। अतएव 'समवाय'
पदार्थ में उससे भिन्न 'समवायत्व' जाति की स्थिति का निर्वाह करने वाला
एक और 'समवाय' मानना होगा। जो कि सम्भव नहीं है। इसलिए समवाय
में समवायत्व जाति का नियामक कोई सम्बन्ध न बनने से 'समवाय' में जाति
नहीं रहती है । अतएव 'समबाय' में 'सत्ता' जाति नहीं रहती है । इस प्रकार
१ 'सामान्य' में जाति मानने में 'अनवस्था', २ 'विशेष' में जाति मानने में
'रूप-हानि', और ३ 'समवाय' में जाति मानने में 'असम्बन्ध' दोषों के बाधक
होने से इन तीनों पदार्थों में 'सत्ता' अथवा अन्य कोई भी जाति नहीं रहती ।
अतः यह तीनों 'सत्ता' जाति के सम्बन्ध से 'सत्' नहीं कहलाते अपितु 'स्वरूप
सामान्यम् ] प्रमेयनिरूपणम् २१७
सत्' हैं। जातिबाधक इन हेतुओं का संग्रह एक कारिका में इस प्रकार किया गया है-
व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं सङ्करोऽथाऽनवस्थितिः ।
रूपहानिरसम्बन्धो जातिबाधकसंग्रहः ॥
बौद्ध लोग 'सामान्य' या 'जाति' पदार्थ को नहीं मानते हैं। नैयायिकों का
'सामान्य' नित्य और अनेक समवेत धर्म है। 'नित्यत्वे सति अनेकसमवेतं
सामान्यम्' यह भी उसका लक्षण किया गया है। इसके अनुसार सामान्य
नित्य ही होता है। परन्तु बौद्ध लोग तो क्षणभङ्गवादी हैं। उनके यहां 'सर्वं
क्षणिकम्', सब कुछ क्षणिक है यह एक मुख्य सिद्धान्त है। इसलिए वह 'जाति'
जैसे नित्य पदार्थ को मान ही नहीं सकते हैं। 'जाति' का खण्डन कर देने
पर 'जाति' का कार्य 'अनुवृत्ति-प्रत्यय' अथवा एकाकार प्रतीति है वह कैसे
होगी ? इस प्रश्न का उत्तर बौद्ध लोग 'अपोह' के द्वारा देते हैं। अर्थात्
'अनुवृत्ति-प्रत्यय' का कारण वह जाति के स्थान पर 'अपोह' को मानते हैं।
'अपोह' का अर्थ है 'अतद्व्यावृत्ति' या 'तद्भिन्न-भिन्नत्व' । दस घट व्यक्तियों
में जो घटः, घटः इस प्रकार की अनुगत प्रतीति होती है उसका कारण उनमें
रहने वाला 'घटत्व सामान्य' नहीं अपितु उनका 'अघटव्यावृत्त' या घटभिन्न
सारे जगत् में भिन्न होना ही है। अतत् अर्थात् अघट, अर्थात् घट से भिन्न
सारा जगत् हुआ, उस जगत् से भिन्न घट हुआ। यह 'तद्भिन्न-भिन्नत्व' या
'अतद्व्यावृत्ति' ही घटों में अनुगत प्रतीति का कारण है। इसी को बौद्ध
दार्शनिक 'अपोह' कहते हैं।
यहां यह प्रश्न हो सकता है कि नैयायिक एकाकार प्रतीति का कारण
'घटत्व सामान्य' को मानते हैं और बौद्ध सामान्य को न मान कर उसके स्थान
पर 'अपोह' को एकाकार प्रतीति का आधार मानते हैं। इन दोनों में नाम
के अन्तर के अतिरिक्त और तात्त्विक अन्तर क्या है ? इसका उत्तर यह है
कि नैयायिकों का 'सामान्य' अन्य पदार्थों से भिन्न एक भावभूत नित्य पदार्थ
है। और बौद्धों का 'अपोह' 'अन्योन्याभाव' रूप है। न्याय, वैशेषिक जिसको
'अन्योन्याभाव' कहते हैं उसी को बौद्ध दार्शनिक 'अपोह' या 'अतद्व्यावृत्ति'
अथवा 'तद्भिन्नभिन्नत्व' आदि शब्दों से कहते हैं। उनका अभिप्राय यह है
कि नैयायिक 'अन्योऽन्याभाव' को मानते ही हैं उसी 'अन्योन्याभाव' रूप
'अपोह' से जब एकाकार प्रतीति का उपपादन हो सकता है तब 'सामान्य' नाम
के एक अन्य अयौक्तिक पदार्थ को क्यों माना जाय। अतः उसका मानना व्यर्थ है।
१ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली
२१८ तर्कभाषा [ सामान्यम्
अत्र कश्चिदाह 'व्यक्तिव्यतिरिक्तं सामान्यं नास्ति' इति । तत्र वयं
ब्रूमः किमालम्बना तर्हि भिन्नेषु विलक्षणेषु पिण्डेष्वेकाकारा बुद्धिर्विना
सर्वानुगतमेकम् । यच्च तदालम्बनं तदेव सामान्यमिति ।
ननु तस्याऽतद्व्यावृत्तिकृतैवैकाकारा बुद्धिरस्तु । तथाहि, सर्वेष्वेव
हि गोपिण्डेषु, अगोभ्योऽश्वादिभ्यो व्यावृत्तिरस्ति । तेनागोव्यावृत्ति-
विषय एवायमेकाकारः प्रत्ययोऽनेकेषु, न तु विधिरूपगोत्वसामान्यविषयः ।
मैवम् । विधिमुखेनैवैकाकारस्फुरणात् ।
इसके विपरीत नैयायिकों का कहना है कि घटः आदि प्रतीति में 'अपोह'
को कारण मानना अनुभव विरुद्ध क्लिष्ट कल्पना है। जब हम दस घड़ों को
देखते हैं तब उन सब में एक अनुगतधर्म की हमको प्रतीति होती है। उन
सब घटों में रहने वाले समान धर्म या 'सामान्य' के आधार पर ही उनमें
एकाकार प्रतीति होती है। 'अतद्व्यावृत्ति' या 'तद्भिन्नभिन्नत्व' का बोध,
'घटः' आदि एकाकार प्रतीति के काल में नहीं होता है। अतः अनुभव विरुद्ध
होने से 'अपोह' को कारण मानना उचित नहीं है इसलिए सामान्य को मानना
ही चाहिए। इसी बात को ग्रंथकार आगे कहते हैं—
यहाँ [ सामान्य के विषय में ] कोई [ बौद्ध ] कहता है कि [ घटादि ]
व्यक्ति से अतिरिक्त [ उसमें रहने वाला 'घटत्व' आदि ] 'सामान्य' नहीं है।
इस [ पूर्वपक्ष के विषय ] में हम [ यह ] कहते हैं कि [ यदि सामान्य नहीं
है तो ] भिन्न भिन्न विलक्षण [ घट आदि ] पिण्डों में [ होने वाली ] एकाकार
प्रतीति का उन सब में रहने वाले एक [ घटत्वादि सामान्य ] के सिवाय और
क्या आधार है। जो उस [ एकाकार प्रतीति ] का आधार [ आलम्बन या विषय ]
है, वही 'सामान्य' है।
[ इस पर पूर्वपक्षी बौद्ध कहता है ] अच्छा [ वह ] एकाकार प्रतीति 'अतद्-
व्यावृत्ति' कृत ही मान ली जाय । जैसे कि सब ही गोपिण्डों में ['अगो' अर्थात्]
गोभिन्न अश्वादि से व्यावृत्ति [भिन्नता] होती है। इसलिए अ-गोव्यावृत्ति [गोभिन्न-
भिन्नत्व] विषयक ही अनेक [ गोपिण्डादि ] में होने वाला यह एकाकार ज्ञान है
भावभूत [ गोत्वादि ] सामान्यविषयक नहीं।
[ इसका उत्तर नैयायिक देता है ] यह ठीक नहीं है। एकाकार प्रतीति के
विधिमुख [ भाव रूप ] से ही होने से। [अर्थात् एकाकार प्रतीति में अतद्व्यावृत्ति
स्पष्ट अनुभव में नहीं आती है अपितु अनुगत भावभूत 'सामान्य' ही उस प्रतीति
का विषय होता है ] ।
विशेषः ] प्रमेयनिरूपणम् २१६
विशेषः
विशेषो नित्यो नित्यद्रव्यवृत्तिः । व्यावृत्तिबुद्धिमात्रहेतुः । नित्य-
द्रव्याणि त्वाकाशादीनि पञ्च । पृथिव्यादयश्चत्वारः परमाणुरूपाः ।
विशेष
नित्यद्रव्य [ परमाणु आदि ] में रहने वाला और नित्य [ अन्तिम भेदक धर्म ]
विशेष है । [ वह ] केवल व्यावृत्ति [ भेद ] बुद्धि का हेतु होता है । नित्यद्रव्य
[ से ] आकाश आदि पांच हैं । [ जिनमें से ] पृथिवी आदि चार [ १ पृथिवी,
२ जल, ३ वायु, ४ अग्नि केवल ] परमाणु रूप [ ही नित्य है । कार्य रूप पृथिवी
आदि नित्य है । इनमें रहने वाला अन्तिम भेदक धर्म 'विशेष' कहलाता ] है ।
'विशेष' पदार्थ वैशेषिक दर्शन का सबसे मुख्य पदार्थ है । इसी के आधार
पर कदाचित् इस दर्शन का 'वैशेषिक' नाम पड़ा है । घटादि पदार्थों का
सजातीय पदार्थान्तर से जो भेद होता है उसका उपपादन साधारणतः अवयव
भेद के आधार पर किया जाता है । एक घट दूसरे से क्यों भिन्न है । इसका
उत्तर यह है कि दोनों घट भिन्न अवयवों अर्थात् कपालों से बने हैं । वह
कपाल परस्पर क्यों भिन्न हैं इसका भी उत्तर वही है कि उनके अवयव अर्थात्
कपालिकाएं भिन्न हैं । फिर कपालिकाओं के भेद के विषय में भी अवयव
भेद को ही कारण कहा जा सकता है । इस प्रकार चलते चलते परमाणुओं
पर पहुँचते हैं । वहां भी यह प्रश्न होता है कि एक पार्थिव परमाणु दूसरे
पार्थिव परमाणु से क्यों भिन्न है । इसका उत्तर अवयव-भेद से नहीं दिया जा
सकता है । क्योंकि परमाणु के अवयव नहीं होते हैं । इसलिए परमाणुओं
के भेद का उपपादन करने के लिए उनमें 'विशेष' पदार्थ की कल्पना की गई
है । इस 'विशेष' के रहने के कारण एक पार्थिव परमाणु, दूसरे पार्थिव परमाणु
से भिन्न है ।
अब प्रश्न यह हो सकता है कि यह 'विशेष' क्यों भिन्न हैं ? इसका उत्तर
यह है कि 'विशेष' का स्वरूप ही 'स्वतो-व्यावृत्त' है । उसका भेदक अन्य
कोई धर्म नहीं है । यह 'विशेष' ही नित्य द्रव्यों में रहने वाला अन्तिम भेदक
धर्म है । यह 'विशेष' जिन नित्य द्रव्यों में रह सकता है वह नित्यद्रव्य पृथिवी
आदि चार के परमाणु और आकाश कुल पांच है । शेष चार द्रव्यों में से
काल और दिक् अभिन्न व एक हैं, अतः उनमें 'विशेष' के मानने की
आवश्यकता नहीं है । आत्मा और मन के भेदक धर्म उनके अपने गुण अदृष्ट,
धर्म, अधर्म, संस्कार आदि ही हो जाते हैं इसलिए उनमें भी 'विशेष' के
२२० तर्कभाषा [ समवायः
समवायः
अयुतसिद्धयोः सम्बन्धः समवायः । स चोक्त एव ।
नन्ववयवावयविनावप्ययुतसिद्धौ तेन तयोः सम्बन्धः समवाय
इत्युक्तम् । न चैतद् युक्तम् । अवयवातिरिक्तस्यावयविनोऽभावात् ।
परमाणव एव बहवस्तथाभूताः सन्निकृष्टाः घटोऽयं घटोऽयमिति गृह्यन्ते ।
अत्रोच्यते । अस्त्येकः स्थूलो घट इति प्रत्यक्षा बुद्धिः । न च सा
परमाणुष्वनेकेष्वस्थूलेष्वतीन्द्रियेषु भवितुमर्हति । भ्रान्तेयं बुद्धिरिति
चेत् । न । बाधकाभावात् ।
मानने की आवश्यकता नहीं है । अतः पृथिवी आदि पांच में ही 'विशेष'
के मानने की आवश्यकता होती है ।
समवाय
आगे समवाय का निरूपण करते हैं ।
'अयुत सिद्धों' का सम्बन्ध 'समवाय' होता है । उसका वर्णन किया जा
चुका है ।
[ प्रश्न ] अवयव और अवयवी भी 'अयुत-सिद्ध' हैं इसलिए उनका सम्बन्ध
'समवाय' है यह [ आपने पहिले समवाय के वर्णन के प्रसङ्ग में ] कहा था ।
परन्तु वह ठीक नहीं है क्योंकि अवयव के अतिरिक्त अवयवी [ घटादि ] की
कोई सत्ता नहीं है । [ यह बौद्धों का मत है । वह अवयवों के अतिरिक्त अवयवी
को नहीं मानते हैं । क्योंकि घटादि में अवयवी जैसी कोई वस्तु दिखाई नहीं
देती है । उनका कहना है कि ] बहुत से परमाणु ही उस [ घटादि ] के रूप में
एकत्रित होकर, यह घड़ा है, यह घड़ा है इस रूप में गृहीत होते हैं । [इसलिए उन
परमाणु रूप अवयवों के अतिरिक्त घट रूप कोई 'अवयवी' नहीं है ] ।
इस विषय में [ सिद्धान्तपक्ष से उत्तर ] कहते हैं । एक, स्थूल, घट है इस
प्रकार का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है । किन्तु [ अवयवी के बिना माने ] अनेक,
अस्थूल [ सूक्ष्म ] और अतीन्द्रिय परमाणुओं में वह [ अनेक परमाणुओं में
एकः, अ-स्थूल अर्थात् सूक्ष्म परमाणुओं में स्थूलः, और अतीन्द्रिय अप्रत्यक्ष
परमाणुओं में प्रत्यक्ष घटः यह प्रतीति ] नहीं बन सकती है । यह [ एकः स्थूलः
प्रत्यक्षः घटः इत्यादि ] बुद्धि, भ्रम है यह भी नहीं कह सकते हैं बाधक का
अभाव होने से ।
नैयायिकों के सिद्धान्तपक्ष का अभिप्राय यह है कि 'एकः, स्थूलः, प्रत्यक्षः,
घटः' इस प्रकार की प्रतीति केवल परमाणुओं में नहीं हो सकती है । अनेक
अभावः ] प्रमेयनिरूपणम् २२१
तदेवं षट्पदार्था द्रव्यादयो वर्णिताः। ते च विधिमुखप्रत्ययवेद्य-
त्वाद् भावरूपा एव।
अभावरूपः सप्तमः पदार्थः
इदानीं निषेधमुखप्रमाणगम्योऽभावरूपः सप्तमः पदार्थः प्रतिपाद्यते ।
स च अभावः संक्षेपतो द्विविधः। संसर्गाभावोऽन्योन्याभावश्चेति ।
संसर्गाभावोऽपि त्रिविधः। प्रागभावः, प्रध्वंसाभावोऽत्यन्ताभावश्चेति ।
उत्पत्तेः प्राक् कारणे कार्यस्याभावः प्रागभावः। यथा तन्तुषु पटा-
परमाणुओं में एकः प्रतीति, अथवा सूक्ष्म परमाणुओं में स्थूलः घटः प्रतीति,
यदि मानी जाय तो उसको भ्रम कहने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है। परन्तु
भ्रम-प्रतीति उसको कहते हैं। जिसका बाध हो। अंधेरे में पड़ी रस्सी को देख
कर सर्प का भ्रम हो जाता है परन्तु प्रकाश में देखने पर वह सर्प-प्रतीति
बाधित हो जाती है। यह सर्प नहीं रज्जु है इस प्रकार अनुभव होने लगता है।
इसलिए जो प्रतीति की मिथ्या प्रतीति नहीं कहा जा सकता है। अपितु वह
यथार्थ प्रतीति ही है। इस यथार्थ प्रतीति के उपपादन के लिए परमाणु
समुदाय से अतिरिक्त घटादि अवयवी का मानना आवश्यक है। जैसे दस
सदस्यों से मिल कर एक सभा या समाजका निर्माण हुआ है। यह सदस्य जब
एक विशेष स्थान पर विशेष सूचना और नियम के अनुसार बैठते या एकत्र
होते हैं तब वह सभा या समाज कहलाता है। वैसे चलते-फिरते कहीं यों ही
एकत्र हो जाय तो वह सभा समाज या समाज का अधिवेशन नहीं कहलाता
है। इसलिए अवयव समुदाय से 'अवयवी' को अलग ही मानना चाहिये।
उसके माने बिना अनेक परमाणुओं में एकः, सूक्ष्म परमाणुओंमें स्थूलः और
अप्रत्यक्ष परमाणुओं में प्रत्यक्षः घटः इस प्रतीति का उपपादन नहीं हो सकता है।
इस प्रकार द्रव्य आदि छ [ भाव ] पदार्थों का वर्णन हो गया। वह विधि
रूप ज्ञान का विषय होने से भाव रूप 'अभाव' रूप सप्तम पदार्थ ही हैं।
'अभाव' रूप सप्तम पदार्थ
अब निषेध मुख प्रमाण से गम्य 'अभाव' रूप सातवें पदार्थ का प्रतिपादन
करते हैं। वह 'अभाव' संक्षेप में दो प्रकार का होता है। १ संसर्गाभाव
और २ अन्योन्याभाव । [ उनमें से ] संसर्गाभाव भी तीन प्रकार का है।
१ प्रागभाव, २ प्रध्वंसाभाव, और ३ अत्यन्ताभाव ।
उत्पत्ति के पूर्व कारण में कार्य का जो अभाव [ होता है वह ] 'प्रागभाव'
[ कहलाता ] है। जैसे [ पट की उत्पत्ति के पूर्व ] तन्तुओं में [ वर्तमान ] पट
२२२ तर्कभाषा [ अभावः
भावः । स चानादिरुत्पत्तेरभावात् । विनाशी च, कार्यस्यैव तद्विनाश-
रूपत्वात् ।
उत्पन्नस्य कारणेऽभावः प्रध्वंसाभावः । प्रध्वंसो विनाश इति यावत् ।
यथा भग्ने घटे कपालमालायां घटाभावः । स च मुद्गरप्रहारादिजन्यः ।
स चोत्पत्तिमानप्यविनाशी नष्टस्य कार्यस्य पुनरनुत्पत्तेः ।
त्रैकालिकोऽभावोऽत्यन्ताभावः । यथा वायौ रूपाभावः । अन्यो-
न्याभावस्तु तादात्म्यप्रतियोगिताकोऽभावः । 'घटः पटो न भवति' इति ।
का अभाव । [ उसकी ] उत्पत्ति न होने से वह अनादि है । और [ अनादि
होने पर भी ] विनाशी है । कार्य के ही उस के विनाश रूप होने से ।
घट की उत्पत्ति हो जाने से घट का 'प्रागभाव' नष्ट हो जाता है । इसलिए
'प्रागभाव' विनाशी है । घट का 'प्रागभाव' कब से प्रारम्भ हुआ यह नहीं
कहा जा सकता । जब घड़ा बना, उसके पूर्व अनादि काल से उस घट का
अभाव है । इसलिए यह 'प्रागभाव' अनादि है। जो पदार्थ अनादि हो वह
अनन्त, और जो सादि हो वह सान्त होता है यह सामान्य नियम है परन्तु
वह केवल भाव पदार्थों के विषयमें ही लागू होता है अभाव के विषय में नहीं।
अभाव में तो 'प्रागभाव' अनादि होने पर भी सान्त होता है । और 'प्रध्वंसा-
भाव' सादि होने पर भी अनन्त होता है ।
उत्पन्न हुए [ घटादि मुद्गर-प्रहारादि के कारण जब टूट जाते हैं तब उस
घट आदि ] का कारण [कपाल आदि के रूप] में जो अभाव वह 'प्रध्वंसाभाव'
[ कहलाता ] है । प्रध्वंस का अर्थ विनाश है । जैसे घड़े के फूट जाने पर कपाल
माला में [ वर्तमान ] घटाभाव । और वह [ प्रध्वंसाभाव ] मुद्गर-प्रहार आदि
से उत्पन्न हुआ है । वह उत्पत्तिमान् होने पर भी अविनाशी हैं [ क्योंकि ] नष्ट
हुए कार्य की पुनः उत्पत्ति नहीं हो सकती है । [ उस मिट्टी से अथवा उन
कपालों से यदि दुबारा घड़ा बनाया भी जाय तो वह दूसरा ही घट होगा ।
पूर्व विनष्ट घट दुबारा कभी उत्पन्न नहीं हो सकता है । इसलिए प्रध्वंसाभाव
सादि होने पर भी अनन्त होता है ] ।
त्रैकालिक [ और संसर्गावच्छिन्न प्रतियोगिक ] अभाव अत्यन्ताभाव
[ कहलाता ] है । जैसे वायु में रूप का अभाव है [ त्रैकालिक अभाव है, और
संसर्गावच्छिन्न प्रतियोगिताक अभाव होने 'अत्यन्ताभाव' है ] 'अन्योन्याभाव' तो
'तादात्म्य-प्रतियोगिताक' अभाव होता है । जैसे 'घट पट नहीं होता है' यह
[ 'अन्योन्याभाव' का उदाहरण है ] ।
अभावयोर्भेदः ] प्रमेयनिरूपणम् २२३
'अत्यन्ताभाव' और 'अन्योन्याभाव' का भेद—
'अन्योन्याभाव' जैसे घट, पट नहीं है और 'अत्यन्ताभाव' जैसे वायु में
रूप नहीं है, यह दोनों ही अभाव त्रैकालिक अभाव होते हैं परन्तु उनमें भेद
यह है कि अत्यन्ताभाव तो 'संसर्गावच्छिन्न-प्रतियोगिताक' अभाव होता है और
'अन्योन्याभाव' तादात्म्यप्रतियोगिताक' अभाव होता है। जैसे घट पट नहीं है।
अर्थात् घट और पट का तादात्म्य या अभेद नहीं है। 'घटः पटो न' यहां घट
और पट के संयोग सम्बन्ध का निषेध नहीं किया जा रहा है। घट और पट
का संयोग होने पर भी 'घटः पटो न' यह व्यवहार हो सकता है। इसलिए
घट और पट के संयोग रूप संसर्ग का निषेध करना इसका प्रयोजन नहीं है
अपितु उन दोनों के अभेद, ऐक्य, या तादात्म्य का निषेध किया जा रहा है।
'घटः पटो न' का अर्थ 'घटपटयोस्तादात्म्यं न' यह है। अर्थात् तादात्म्य से जो
अभाव उसको 'अन्योन्याभाव' कहते हैं।
जिसका अभाव होता है उसको अभाव का 'प्रतियोगी' कहते हैं। 'यस्य
अभावः स तस्य प्रतियोगी' । जैसे घटाभाव का प्रतियोगी घट, और पटाभाव
का प्रतियोगी 'पट' होता है। 'प्रतियोगी' में उस अभाव की प्रतियोगिता रहती
है। और उस 'प्रतियोगिता' का नियामक कोई सम्बन्ध होता है। जहां अभाव
रहता है उसको अभावका अधिकरण या 'अनुयोगी' कहते हैं। और 'प्रतियोगी'
का अधिकरण या 'अनुयोगी' के साथ जो सम्बन्ध होता है वही उस अभाव का
प्रतियोगितानियामक अथवा 'प्रतियोगितावच्छेदक-सम्बन्ध' कहलाता है। जैसे
'भूतले घटाभावः' इस प्रतीति में भूतल अधिकरण या 'अनुयोगी' है घट
'प्रतियोगी' है। भूतल और घट का संयोग सम्बन्ध होता है इसलिए भूतल में
जो घटाभाव रहता है उसका नियामक अथवा अवच्छेदक सम्बन्ध भी संयोग
ही होगा। इसलिए 'भूतले घटाभावः' या 'भूतले घटो नास्ति' को न्याय की
भाषा में 'भूतलानुयोगिक-घटप्रतियोगिक-संयोगसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक
अभाव' भी कह सकते हैं। यह संयोग एकप्रकारक सम्बन्ध या संसर्ग है इसलिए
यह अभाव 'संसर्गाभाव' कहलाता है।
'घटः पटो न' यह 'अन्योन्याभाव' का जो उदाहरण दिया है उसमें घट
और पट के तादात्म्य का निषेध किया गया है। अतएव यह अभाव
'तादात्म्यप्रतियोगिताक' अभाव है। यह अभाव भी त्रैकालिक अभाव ही है।
और 'अत्यन्ताभाव' का लक्षण ही 'त्रैकालिकोऽभावोऽत्यन्ताभावः' किया गया
है। अर्थात् त्रैकालिक अभाव को 'अत्यन्ताभाव' कहते हैं। इसलिए
२६४ तर्कभाषा [ विज्ञानवादनिरासः
तदेवमर्था व्याख्याताः ।
विज्ञानवादनिरासः
ननु ज्ञानाद् ब्रह्मणो वा अर्था व्यतिरिक्ता न सन्ति । मैवम् । अर्था-
नामपि प्रत्यक्षादिसिद्धत्वेनाशक्यापलापत्वात् ।
'अत्यन्ताभाव' और 'अन्योन्याभाव' का भेद 'प्रतियोगितावच्छेदक-सम्बन्ध'
के आधार पर ही होता है । 'अन्योन्याभाव' में 'प्रतियोगितावच्छेदक-धर्म'
'तादात्म्य' होता है और 'अत्यन्ताभाव' में 'प्रतियोगितावच्छेदक-सम्बन्ध'
'तादात्म्य' से भिन्न 'संयोग' या 'समवाय' आदि संसर्ग होता है । 'प्रागभाव,'
'प्रध्वंसाभाव' और 'अत्यन्ताभाव' इन तीनों में 'प्रतियोगितावच्छेदक-सम्बन्ध'
तादात्म्य से भिन्न संयोगादि संसर्ग ही होता है । इसलिए यह तीनों अभाव
'संसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताक अभाव' होने से 'संसर्गाभाव' कहलाते हैं। इसके
विपरीत 'अन्योन्याभाव' में 'प्रतियोगितावच्छेदक-धर्म' 'तादात्म्य' के होने से
'तादात्म्य-प्रतियोगिताक अभाव' को 'अन्योन्याभाव' कहते हैं ।
इस प्रकार [ वैशेषिकाभिमत द्रव्य आदि षट् पदार्थ रूप ] अर्थों की व्याख्या
हो गई ।
विज्ञानवाद का निराकरण—
[ प्रश्न ] ज्ञान अथवा ब्रह्म से अतिरिक्त [ द्रव्य आदि ] अर्थों की सत्ता
[ ही ] नहीं है । [ तब आप उनका वर्णन कैसे करते हैं ] ।
[ उत्तर ] यह कहना ठीक नहीं है । [ द्रव्य आदि ] अर्थों के भी प्रत्यक्ष
सिद्ध होने से उनका निषेध नहीं किया जा सकता है ।
विज्ञानवादी बौद्ध मत—
अर्थों के निरूपण के बाद इस प्रश्न के उठाने का अभिप्राय यह है कि
वेदान्त तथा बौद्ध मत जो अर्थों का अलग अस्तित्व नहीं मानते हैं उनके
मत का संक्षेप में निराकरण किया जाय । बौद्धों के चार मुख्य दार्शनिक
सम्प्रदाय हैं । १ माध्यमिक, २ योगाचार, ३ सौत्रान्तिक और ४ वैभाषिक ।
इनमें से 'सौत्रान्तिक' और 'वैभाषिक' यह दोनों घट-पट आदि बाह्य पदार्थों
का अस्तित्व मानते हैं । उनमें परस्पर भेद यह है कि उन में से एक
[ सौत्रान्तिक ] बाह्य अर्थों को प्रत्यक्ष सिद्ध मानता है और दूसरा [वैभाषिक]
'साकारज्ञानवाद' को स्वीकार कर ज्ञान में घट-पटादि अर्थों का आकार मान
कर उससे अर्थ का अनुमान मानता है । अर्थ को प्रत्यक्ष नहीं मानता । शेष
दो सम्प्रदाय अर्थात् 'माध्यमिक' और 'योगाचार' बाह्य अर्थों का अस्तित्व ही
विज्ञानवादनिरासः ] प्रमेयनिरूपणम् २२५
स्वीकार नहीं करते हैं। उन में से 'माध्यमिक' सम्प्रदाय 'शून्यवादी' और
'योगाचार' सम्प्रदाय 'विज्ञानवादी' नाम से प्रसिद्ध है। 'विज्ञानवादी योगाचार
सम्प्रदाय' के मत में केवल ज्ञान का अस्तित्व है घट-पट आदि अर्थों की
वास्तविक सत्ता नहीं है। उनकी प्रतीति स्वप्न में दिखाई देने वाली वस्तुओं
के समान केवल कल्पित और भ्रम रूप है। उनका कहना यह है कि अर्थ
और ज्ञान दोनों का अस्तित्व मानने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि लौकिक
व्यवहार का उपपादन केवल एक ज्ञान के आधार पर भी किया जा सकता
है। जैसे स्वप्न में घट, पट आदि पदार्थों का अस्तित्व नहीं होता है केवल ज्ञान
ही होता है और उसी ज्ञान के आधार पर स्वप्न-काल में सारे लौकिक व्यवहारों
का उपपादन हो जाता है इसी प्रकार जागृत-काल का सारा व्यवहार भी
अर्थों के बिना केवल ज्ञानमात्र से चल रहा है। इसलिए ज्ञान से व्यतिरिक्त
अर्थों का अस्तित्व नहीं है। केवल ज्ञान ही एक यथार्थ वस्तु है। अन्य सब
दृश्यमान जगत् स्वप्नवत् परिकल्पित और मिथ्या है। यही 'विज्ञानवादी'
'योगाचार' सम्प्रदाय के मत का सार है।
ब्रह्मवादी वेदान्त मत—
वेदान्त दर्शन का 'शाङ्कर' सम्प्रदाय भी बौद्धों के इस 'विज्ञानवाद' से
मिलता-जुलता सम्प्रदाय है। उनके मत में ब्रह्म ही सत्य वस्तु है और जगत्
स्वप्न परिकल्पित वस्तु के समान मिथ्या है। वह जगत् को ब्रह्म का 'विवर्त'
मात्र कहते हैं। 'विवर्त' का अर्थ है 'अतात्त्विक अन्यथा प्रतीति'। जैसे रज्जु में
सर्प की प्रतीति।
'विवर्तवाद' तथा 'परिणामवाद'—
सृष्टि के विषय में दो प्रकार के मत हैं। सांख्य का मत 'परिणामवाद'
कहलाता है और शाङ्कर वेदान्त का मत 'विवर्तवाद' कहलाता है। दूध से
दही बनता है। यहां दही को दूध का 'परिणाम' कहा जाता है। पहिले दूध
रूप में प्रतीति होती थी उसके स्थान पर अब दही की प्रतीति हो रही है।
यहां न केवल प्रतीति में भेद हो गया है। अपितु दुग्ध रूप पदार्थ के स्वरूप
में भी परिवर्तन हो गया है। इसलिए इस प्रतीति को 'तात्त्विक अन्यथाप्रतीति'
कहते हैं इसी को 'विकार' या 'परिणाम' भी कहते हैं।
इसके विपरीत रज्जु में सर्प की प्रतीति 'अतात्त्विक अन्यथा प्रतीति' है।
उस में रज्जु बदल कर सर्प नहीं बन गई। रज्जु ज्यों की त्यों रज्जु ही है पर
उसमें प्रतीति सर्प की होने लगी है इसको 'अतात्त्विक अन्यथा प्रतीति'
१५ त० भा०
२२६ तर्कभाषा [ विवर्तवादः
या 'विवर्त' कहते हैं। इस 'विवर्त' और 'परिणाम' का लक्षण इस प्रकार किया
गया है—
सतत्त्वतोऽन्यथा प्रथा विकार इत्युदीरितः ।
अतत्त्वतोऽन्यथा प्रथा विवर्त इत्युदाहृतः ॥
अर्थात् जहां तत्त्व-परिवर्तन सहित अन्यथा प्रतीति होती है उसको 'विकार'
कहते हैं। जैसे दही दूध का 'विकार' है। इसी को 'परिणाम' भी कहते हैं।
सांख्य दर्शन 'परिणामवाद' का प्रतिपादन करता है। और तत्त्व-परिवर्तन के
बिना होने वाली अन्यथा प्रतीति को 'विवर्त' कहते हैं। जैसे सर्प रज्जु का
'परिणाम' नहीं अपितु 'विवर्त' है। शाङ्कर वेदान्त 'विवर्तवाद' का संस्थापक
है। उसके मत में जगत् ब्रह्म का 'विवर्त' है। अर्थात् जगत् की प्रतीति ब्रह्म
में इसी प्रकार है जैसे रज्जु में सर्प की प्रतीति। इस प्रकार शाङ्कर मत में भी
जगत्, 'विज्ञान-वादी' बौद्धों के समान, स्वप्न-परिकल्पित वस्तुओं के तुल्य
भ्रममात्र है। उसका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। वास्तविक सत्य वस्तु
ब्रह्म ही है।
इस प्रकार बौद्धों के 'विज्ञानवाद' और शङ्कराचार्य के 'ब्रह्मवाद' में बहुत
कुछ समानता है। उनमें जो मुख्य अन्तर है वह यह है कि बौद्ध सबको क्षणिक
मानते हैं इसलिए उनका 'विज्ञान' भी 'क्षणिक विज्ञान' है। इसके विपरीत
'शाङ्कर वेदान्त' का 'ब्रह्म' नित्य पदार्थ है। इसलिए दोनों में भेद तो है परन्तु
फिर भी उनका बहुत सा स्वरूप मिलता-जुलता है इसलिए सांख्य-प्रवचन
भाष्य में, निम्न पुराण-वचन के आधार पर उस शाङ्कर 'मायावाद' को 'प्रच्छन्न
बौद्ध' कहा गया है—
मायावादमसच्छास्त्रं 'प्रच्छन्नं बौद्धमेव' च ।
मयैव कथितं देवि कलौ ब्राह्मणरूपिणा ॥
बौद्धों के 'विज्ञानवाद' में और शङ्कर के 'ब्रह्मवाद' में क्रमशः 'विज्ञान'
और 'ब्रह्म' से अतिरिक्त अर्थों का अस्तित्व नहीं माना जाता है। उसका खण्डन
करने के लिए ही ग्रन्थकार ने यहां इस प्रसङ्ग की अवतारणा की है। सिद्धान्त
पक्ष से इन दोनों मतों के खण्डन में जो युक्ति दी गई है वह केवल इतनी ही
है कि द्रव्य आदि पदार्थ प्रत्यक्ष-सिद्ध हैं अतएव उनका अपलाप नहीं किया जा
सकता है। अतः उनका अस्तित्व मानना अनिवार्य है।
'तर्कभाषा' प्रधानतः न्याय की शैली के आधार पर लिखी गई है
इसीलिए न्याय के प्रमाण, प्रमेय आदि षोडश पदार्थों का निरूपण चल रहा है।
प्रमेय बारह माने गये हैं। उनमें से १ आत्मा, २ शरीर, ३ इन्द्रिय, इन तीनों के
बुद्धिनिरूपणम् ] प्रमेयनिरूपणम् २२७
५ बुद्धिः
बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानं प्रत्यय इत्यादिभिः पर्यायशब्दैर्याऽभिधीयते सा
बुद्धिः । अर्थप्रकाशो वा बुद्धिः । सा च संक्षेपतो द्विविधा । अनुभवः
स्मरणं च । अनुभवोऽपि द्विविधो, यथार्थोऽयथार्थश्चेति ।
तत्र यथार्थोऽर्थाऽविसंवादी । स च प्रत्यक्षादिप्रमाणैर्जन्यते । यथा
चक्षुरादिभिरदुष्टैर्घटादिज्ञानम् । धूमलिङ्गकमग्निज्ञानम् । गोसादृश्य-
निरूपण के बाद चौथा पर्याय 'अर्थ' का आया । इस 'अर्थ' प्रमेय के अन्तर्गत
नवीन न्याय की शैली में वैशेषिकोक्त द्रव्य आदि छः पदार्थों का अन्तर्भाव कर
लिया गया है। वैसे न्याय-सूत्रकार ने अर्थ शब्द से वैशेषिकोक्त द्रव्य आदि षट्
पदार्थों का ग्रहण न करके रूपादि गुणों का ग्रहण किया है। जैसा कि—
गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणास्तदर्थाः ।
इस सूत्र से स्पष्ट है। परन्तु नवीन आचार्यों ने इसी 'अर्थ' प्रमेय के
अन्तर्गत वैशेषिक के द्रव्यादि षट् पदार्थों का ग्रहण कर उनका
निरूपण किया है। 'तर्कभाषा' ने भी इसी पद्धति का अवलम्बन कर यहाँ तक
वैशेषिकोक्त सब पदार्थों का वर्णन इस 'अर्थ' निरूपण-प्रसङ्ग में कर दिया है।
अब आगे क्रमप्राप्त पञ्चम प्रमेय 'बुद्धि' का निरूपण प्रारम्भ करते हैं। यद्यपि
वैशेषिक के गुणों के अन्तर्गत बुद्धि का संक्षिप्त वर्णन किया जा चुका है। परन्तु
न्याय में उसको अलग प्रमेय माना है अतएव आगे उसके क्रमप्राप्त होने
से उसका वर्णन करते हैं।
५. बुद्धि
बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान, प्रत्यय आदि पर्याय शब्दों से जिसको कहा जाता है
वह बुद्धि है। अथवा अर्थ के ज्ञान को बुद्धि कहते हैं। वह संक्षेप से दो प्रकार
की है [ एक ] अनुभव और [ दूसरी ] स्मरण । [ उनमें से ] अनुभव भी दो
प्रकार का होता है [ एक ] यथार्थ और [ दूसरा ] अयथार्थ ।
उसमें यथार्थ [ अनुभव ] अर्थ का अविसंवादी [ अर्थानुसारी ] होता है
और वह प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से उत्पन्न होता है। जैसे १ दोषरहित चक्षु
आदि से घट आदि का ज्ञान [ यह प्रत्यक्ष यथार्थानुभव है ] । २ धूम आदि
[ शुद्ध ] लिङ्ग से अग्नि आदि का ज्ञान [ यह यथार्थ अनुमानरूप अनुभव हुआ ] ।
३ गो के सादृश्य को देखने से गवय शब्द से वाच्य होने का ज्ञान [ यह उपमान
१ न्यायदर्शन, १, १, १४ ।
१२८ तर्कभाषा [ बुद्धिनिरूपणम्
दर्शनाद् गवयशब्दवाच्यताज्ञानम् । 'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत'
इत्यादि वाक्याज्ज्योतिष्टोमस्य स्वर्गसाधनताज्ञानञ्च ।
अयथार्थस्तु अर्थव्यभिचारी, अप्रमाणजः । स त्रिविधः । संशय-
स्तर्को विपर्ययश्चेति, संशयतर्कौ वक्ष्येते ।
विपर्ययस्तु अतस्मिंस्तद्ग्रहः । भ्रम इति यावत् । यथा पुरोवर्तिन्य-
रजते शुक्तिकादौ रजतारेापः, 'इदं रजतम्' इति ।
प्रमाणजन्य यथार्थ अनुभव हुआ ] । ४ स्वर्ग की इच्छा रखने वाला ज्योतिष्टोम
याग करे, इस [ वेद ] वाक्य से ज्योतिष्टोम [ याग ] में स्वर्गसाधनता का ज्ञान
[ यह शब्द प्रमाणजन्य यथार्थ अनुभव हुआ ] ।
अयथार्थ [ अनुभव ] तो अर्थ का व्यभिचारी और अप्रमाण से उत्पन्न
होता है । वह तीन प्रकार है । १ संशय, २ तर्क और ३ विपर्यय । [ इनमें से ]
संशय और तर्क [ न्याय के षोडश पदार्थों में गिने हुए हैं अतएव आगे यथा-
स्थान ] कहे जावेंगे । [ विपर्यय को यहाँ कहते हैं ] अतत् में तत्
[ अरजत शुक्तिकादि में रजत ] की प्रतीति विपर्यय या भ्रम है । जैसे सामने
स्थित अरजत शुक्तिकादि में रजत का आरोप, कि यह रजत है । [भ्रम कहलाता है]।
ख्यातिपञ्चक—
भ्रमज्ञान अथवा विपर्यय ज्ञान का विश्लेषण कई दार्शनिक सम्प्रदायों
में भिन्न २ रीति से किया गया है । जिसके परिणामस्वरूप मुख्यतः 'पञ्च
ख्यातियां' प्रसिद्ध हैं ।
आत्मख्यातिरसतख्यातिरख्यातिः ख्यातिरन्यथा ।
तथानिर्वचनीयख्यातिरित्येतत् ख्यातिपञ्चकम् ॥
'ख्याति' शब्द का अर्थ ज्ञान है । भ्रमस्थल में किसका ज्ञान होता है
इसको लेकर इन पांच 'ख्यातियों' की स्थापना हुई है । इनमें से 'आत्म-
ख्याति' और 'असत्ख्याति' यह दो बौद्ध पक्ष हैं । 'आत्मख्याति' में आत्म
शब्द से 'विज्ञानवादी' बौद्धों के 'विज्ञानतत्त्व' का ग्रहण करना चाहिए। 'विज्ञान-
वाद' के अनुसार घट-पट आदि बाह्य विषयों का तो कोई अस्तित्व है ही
नहीं । केवल 'विज्ञान' ही इन सब रूपों में भासता है यह बात पहिले कह चुके
हैं । इसलिए भ्रमस्थल में स्वयं 'विज्ञान' ही भ्रान्त घट के रूप में भी भासता
है । यही 'आत्मख्याति' पक्ष का सार है । दूसरी 'असत् ख्याति' 'शून्यवादी'
माध्यमिक बौद्धों का अभिमत पक्ष है । उनके मत में 'विज्ञान' का भी अस्तित्व
ख्यातिपञ्चकम् ] प्रमेयनिरूपणम् २२६
नहीं है और शून्य ही सब रूपों में भासता है इसलिए भ्रमस्थल में भी शून्य
का ही भान होता है । यह 'असत्ख्याति' का अभिप्राय है।
तीसरा 'अख्याति' पक्ष मीमांसकों में प्रभाकर-सम्प्रदाय का है। 'अख्याति'
का अर्थ 'ज्ञान का अभाव' अर्थात् 'भेदाग्रह' है। प्रभाकर का मत यह है कि
'अतस्मिंस्तत्प्रतीति' 'अतद्रूपप्रतिष्ठ-ज्ञान' अथवा 'तदभाववति तत्प्रकारकं ज्ञानं
भ्रमः' आदि भ्रम के जो लक्षण किए गए हैं उस प्रकार का भ्रमरूप ज्ञान होता ही
नहीं है। जिसको दूसरे लोग 'भ्रम' कहते हैं उसका विश्लेषण कर, प्रभाकर
यह कहते हैं कि यहाँ भ्रम का कोई अवसर नहीं है। जैसे शुक्ति में रजत की
प्रतीति को भ्रम कहा जाता है। यहां तर्कभाषाकार ने भी 'अतस्मिंस्तत्' रूप
भ्रम-ज्ञान का उदाहरण यही दिया है। प्रभाकर का कहना है कि यह
वस्तुतः एक ज्ञान नहीं है अपितु इसमें 'इदम्' और 'रजतम्' यह दो ज्ञान अलग
अलग हैं। 'इदम्' अंश का ज्ञान इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न
'प्रत्यक्ष' ज्ञान होता है और वह यथार्थ ज्ञान है। 'रजतम्' इस अंश की 'स्मृति'
होती है। वह भी यथार्थ है। इस प्रकार 'इदम्' अंश जो प्रत्यक्ष अनुभवात्मक
है वह इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य होने से यथार्थ है। और 'रजतम्' यह अंश
संस्कारजन्य और स्मरणात्मक है, वह भी यथार्थ है। इसलिए दोनों अंशों में
से कहीं भी भ्रम नहीं है।
तब प्रश्न यह होता है कि शुक्ति को भ्रम से रजत समझ कर मनुष्य उसको उठाने
में क्यों प्रवृत्त हो जाता है इसका उत्तर यह है कि इन दोनों ज्ञानों के भेद का
ग्रहण उसको नहीं रहता है। उस समय उस व्यक्ति को यह ज्ञान नहीं रहता है कि
मुझे जो 'इदं रजतम्' ज्ञान हो रहा है उसमें से 'इदम्' अंश तो 'अनुभवात्मक'
प्रत्यक्ष है और 'रजतम्' अंश 'स्मरणात्मक' है। अनुभव और स्मरणरूप द्विविध
ज्ञान के भेद का ग्रहण न होने से ही मनुष्य उस सीप को उठाने में प्रवृत्त
हो जाता है। इसलिए इस व्यवहार का कारण 'भेदाग्रह' है। इसी 'भेदाग्रह'
को 'अख्याति', भेद की अख्याति, अर्थात् भेद का ज्ञान न होना कहते हैं।
इसी को 'अख्यातिवाद' कहते हैं। और वह प्रभाकर का सिद्धान्त है।
चौथा 'अनिर्वचनीय ख्याति' वाला पक्ष वेदान्तियों का है। उपनिषद् में
स्वप्न-वर्णन के प्रसङ्ग में आया है, 'तत्र न रथाः, न रथयोगाः, अथ रथान्
रथयोगान् पथः सृजते' । अर्थात् वहाँ न रथ होते हैं और न रथयुक्त मार्ग
आदि, परन्तु स्वप्नद्रष्टा रथों और रथयुक्त मार्गों की सृष्टि कर लेता है।
इस उपनिषद्वाक्य में 'सृजते' शब्द का प्रयोग होता है इससे सिद्ध होता है कि
२३० तर्कभाषा [ बुद्धिः
स्मरणमपि यथार्थमयथार्थञ्चेति द्विविधम् । तदुभयं जागरे । स्वप्ने
तु सर्वं ज्ञानं स्मरणमयथार्थञ्च । दोषवशेन तदिति स्थाने इदमित्युदयात् ।
सर्वञ्च ज्ञानं निराकारमेव न तु ज्ञानेऽर्थेन स्वस्याकारो जन्यते ।
साकारज्ञानवादनिराकरणात् । अत एवाकारेणार्थानुमानमपि निरस्तम् ।
उपनिषत्कार के मत में स्वप्न काल में 'प्रातिभासिक' रथ आदि उत्पन्न होते हैं।
उनकी स्थिति तथा प्रतीति केवल स्वप्न-काल में ही रहती है। जागने पर वह
स्वयं समाप्त हो जाते हैं। इसी प्रकार भ्रम के स्थल में भी 'प्रातिभासिक रजत'
की उत्पत्ति होती है। उस नवोत्पन्न 'प्रातिभासिक' रजत की स्थिति उतने ही काल
तक रहती है जितनी देर तक भ्रम की स्थिति है। इसीलिए उसको 'प्राति-
भासिक रजत' कहते हैं। यह 'प्रातिभासिक' रजत सत्य है यह नहीं कहा जा
सकता है क्योंकि आगे चल कर उसका बाध होता है। और उसको नितान्त
असत् भी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि उसकी प्रतीति होती है। इसलिए यह
'प्रातिभासिक-रजत' 'सत्त्वेन' और 'असत्त्वेन' निर्वक्तुम् अशक्य होने से 'अनि-
र्वचनीय' रजत कहा जाता है। भ्रम-स्थल में 'अनिर्वचनीय' रजत आदि का
ही भान होता है। इसलिए शाङ्कर वेदान्त के इस सिद्धान्त को 'अनिर्वचनीय
ख्याति' नाम दिया गया है।
पञ्चम 'अन्यथा-ख्यातिवाद' नैयायिकों का पक्ष है। नैयायिकों का कहना
है कि शुक्ति-रजतस्थल में 'प्रातिभासिक रजत' की उत्पत्ति मानना उचित नहीं
है। दोष के प्रभाव से जैसे पाण्डुरोग के रोगी को 'पीतः शंखः' प्रतीति होने
लगती है इसी प्रकार दोषवश से हट्टस्थ अर्थात् बाजार में रखे हुए रजत की
प्रतीति शुक्ति में होने लगती है। इसी का नाम 'अन्यथा-ख्याति' है।
स्मरण भी दो प्रकार का होता है—१ यथार्थ और २ अयथार्थ। जाग्रत्
अवस्था में दोनों प्रकार का स्मरण होता है। और स्वप्न में तो सारा ज्ञान
स्मरणात्मक और अयथार्थ ही होता है। दोषवश से [ तत् ] वह के स्थान पर
यह [ इदम् ] प्रतीति होने से।
ज्ञान के आकार से अर्थों का अनुमान करके अर्थों को अनुमेय मानने
वाले बौद्धों के 'वैभाषिक' सम्प्रदाय का उल्लेख पीछे किया जा चुका है उनके
सिद्धान्त का निराकरण करने के लिए आगे का प्रकरण प्रारम्भ करते हैं—
और सारा ज्ञान निराकार ही होता है। अर्थ, ज्ञान में अपना [ कोई ]
आकार उत्पन्न नहीं करता है। साकार ज्ञानवाद का खण्डन हो जाने से [ अर्थात्
यदि ज्ञान का आकार माना जाय तो वह कोई नियत आकार नहीं बन सकता
मन आदयः ] प्रमेयनिरूपणम् २३१
प्रत्यक्षसिद्धत्वाद् घटादेः । सर्वं ज्ञानमर्थनिरूप्यं, अर्थप्रतिबद्धस्यैव तस्य
मनसा निरूपणात् । घटज्ञानवानहं, इत्येतावन्मात्रं गम्यते न तु 'ज्ञान-
वानहम्' इत्येतावन्मात्रं ज्ञायते ।
६ मनः
अन्तरिन्द्रियं मनः । तच्चोक्तमेव ।
७ प्रवृत्तिः
प्रवृत्तिः धर्माधर्ममयी यागादिक्रिया, तस्या जगद्व्यवहारसाधकत्वात् ।
८ दोषाः
दोषा राग-द्वेष-मोहाः ।
राग इच्छा ।
द्वेषो मन्युः, क्रोध इति यावत् ।
मोहो मिथ्याज्ञानं विपर्यय इति यावत् ।
६ प्रेत्यभावः
पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः । स चात्मनः पूर्वदेहनिवृत्तिः, अपूर्वदेह-
सङ्घातलाभः ।
है । ] इसलिए आकार से अर्थ का अनुमान भी खण्डित हो जाता है । घटादि
के प्रत्यक्ष सिद्ध होने से [ उनको अनुमेय मानने की कोई आवश्यकता भी नहीं
है ] । सारा ज्ञान अर्थ से निरूपित होता है । 'मैं घटज्ञानवान् हूँ' [ विषय
सहित ] यही प्रतीत होता है [ केवल विषय रहित ] 'ज्ञानवानहम्' केवल
इतना ही प्रतीत नहीं होता है । [अतः सारा ज्ञान अर्थ से ही निरूपित होता है]।
अन्तरिन्द्रिय [ का नाम ] 'मन' है । और वह कहा जा चुका है ।
धर्म अधर्म रूप यागादि क्रिया [ और उससे उत्पन्न धर्माधर्म ] प्रवृत्ति
[ कहलाते ] हैं । उस [ धर्माधर्म रूप प्रवृत्ति ] के जगत् के व्यवहार का
साधक होने से ।
राग द्वेष मोह [ यह तीनों ] 'दोष' हैं ।
'राग' इच्छा [ को कहते ] हैं ।
'द्वेष' मन्यु अर्थात् क्रोध [ को कहते हैं ] ।
'मोह' मिथ्या ज्ञान अर्थात् विपर्यय [ को कहते हैं ] ।
पुनर्जन्म प्रेत्यभाव [ प्रेत्य मर कर, भाव अर्थात् फिर उत्पन्न होना ] है ।
और वह [ पुनर्जन्म ] आत्मा के पूर्व शरीर की समाप्ति और नवीन शरीर आदि
समूह की प्राप्ति [ हो ] है [ अर्थात् पुनरुत्पत्ति नहीं समझनी चाहिए । क्योंकि
२४२ तर्कभाषा [ फलादयः
१० फलम्
फलं पुनर्भोगः सुखदुःखान्यतरसाक्षात्कारः ।
११ दुःखम्
पीडा दुःखम् । तच्चोक्तमेव ।
१२ अपवर्गः
मोक्षोऽपवर्गः । स चैकविंशतिप्रभेदभिन्नस्य दुःखस्यात्यन्तिकी निवृत्तिः।
एकविंशतिभेदास्तु शरीरं, षडिन्द्रियाणि, षड् विषयाः, षड् बुद्धयः,
सुखं दुःखञ्चेति गौणमुख्यभेदात् । सुखं तु दुःखमेव दुःखानुषङ्गि-
त्वात् । अनुषङ्गोऽविनाभावः । स चायमुपचारो मधुनि विषसंयुक्ते
मधुनोऽपि विषपक्षनिक्षेपवत् ।
स पुनरपवर्गः कथं भवति ?
उच्यते । शास्त्राद् विदितसमस्तपदार्थतत्त्वस्य, विषयदोषदर्शन-
विरक्तस्य मुमुक्षोर्ध्यायिनो ध्यानपरिपाकवशात् साक्षात्कृतात्मनः क्लेश-
आत्मा तो नित्य है वह कभी उत्पन्न नहीं होता है। देह इन्द्रिय आदि के साथ
आत्मा के पुनः सम्बन्ध का नाम ही प्रेत्यभाव या पुनर्जन्म है ] ।
सुख या दुःख में से किसी के अनुभव रूप भोग को 'फल' कहते हैं।
पीड़ा को 'दुःख' कहते हैं उसका वर्णन हो ही चुका ।
मोक्ष को 'अपवर्ग' कहते हैं। और वह [ मोक्ष ] इक्कीस प्रकार के दुःखों
की अत्यन्त निवृत्ति है [ दुःखों के ] इक्कीस भेद तो [ इस प्रकार हैं ] शरीर,
छः इन्द्रियाँ, छः विषय, छः ज्ञान, और सुख तथा दुःख । यह गौण और मुख्य
भेद से [ इक्कीस प्रकार के दुःख हैं, जिससे छूटने का नाम 'अपवर्ग' या मोक्ष
है ] । दुःख से मिश्रित होने के कारण [ लौकिक ] सुख भी दुःख ही है ।
अनुषङ्ग [ का अर्थ ] 'अविनाभाव' है। मधु के विष संयुक्त होने पर [मधु को भी]
विष समझे जाने के समान [ लौकिक सुख को दुःख से अविनाभूत, मिश्रित, होने
से दुःख समझने का ] उपचार [ गौणव्यवहार ] है ।
[ प्रश्न ] वह 'अपवर्ग' कैसे प्राप्त होता है ?
[ उत्तर ] कहते हैं । [ सबसे पहिले ] शास्त्रों [ के अध्ययन ] से समस्त
पदार्थों का तत्त्व ज्ञान प्राप्त करके विषयों के दोषों को देखने से [ लौकिक
विषयों के प्रति ] विरक्त, [ हुए अतएव ] मोक्ष की इच्छा करने वाले [ और
उसकी प्राप्ति के लिए योग शास्त्र में वर्णित प्रकार से ] ध्यान करने वाले मुमुक्षु
साधक के ध्यान के परिपक्व होने से आत्मसाक्षात्कार करने वाले अतएव
[ आत्म ज्ञान हो जाने से अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश रूप पांच ]
कर्मभेदाः ] प्रमेयनिरूपणम् २३३
हीनस्य, निष्कामकर्मानुष्ठानादनागतधर्माऽधर्मावनर्जयतः पूर्वोपात्तञ्च
धर्माऽधर्मप्रचयं योगर्द्धिप्रभावाद् विदित्वा, समाहृत्य भुञ्जानस्य पूर्वकर्म-
निवृत्तौ वर्तमानशरीरापगमे पूर्वशरीराभावाच्छरीराद्येकविंशतिदुःखस-
म्बन्धो न भवति कारणाभावात् । सोऽयमेकविंशतिप्रभेदभिन्नदुःखा-
निर्मोक्षः। सोऽपवर्ग इत्युच्यते ।
क्लेशों से रहित [ अविद्याऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशा पञ्चक्लेशाः । १ ] अतएव [ राग
द्वेष आदि के अभाव में ] निष्काम भाव से कर्मों के अनुष्ठान करने के कारण
[ निष्काम कर्म से धर्म अधर्म रूप संस्कारों की उत्पत्ति नहीं होती है । इसलिए ]
नए धर्म और अधर्म का उपार्जन न करने वाले; और पूर्वोपात्त धर्माधर्म को
योग शक्ति के प्रभाव से जान कर एक साथ भोग डालने वाले [ तत्त्व-ज्ञान हो
जाने पर राग, द्वेष, नहीं रहता अतएव निष्काम भाव से किए जाने वाले कर्मों
से नवीन धर्माधर्म उत्पन्न नहीं होते हैं । ] पूर्व कर्मों की समाप्ति पर वर्तमान
शरीर के नाश होने पर नए शरीर की उत्पत्ति [ के कारणभूत धर्माधर्म के
अभाव में ] न होने से इक्कीस प्रकार के दुःखों का सम्बन्ध [ आत्मा के साथ ]
कारण [ धर्माधर्म ] के अभाव से नहीं होता है। यही इक्कीस प्रकार के दुःखों
का विनाश मोक्ष है। वही 'अपवर्ग' कहलाता है।
कर्मों के भेद—
कर्म के तीन प्रकार हैं, एक 'प्रारब्ध' दूसरे 'सञ्चित' और तीसरे
'क्रियमाण' । जिन कर्मों का फल भोग करने के लिए यह शरीर प्राप्त हुआ
है उसका भोग प्रारम्भ हो चुका है अतएव वह 'प्रारब्ध' कहलाते हैं। इनका
नाश भोग पूर्ण होने पर ही होता है। 'क्रियमाण' कर्म वह है जो इस समय
में किया जा रहा है। इन कर्मों के संस्कार 'सञ्चित' होते रहते हैं । उनका
भोग आगे होगा अतएव वह 'सञ्चित' कर्म कहलाते हैं। जब तक तत्त्वज्ञान
या आत्मसाक्षात्कार नहीं होता है तब तक किए गए कर्मों से संस्कार बनते
हैं। परन्तु आत्मसाक्षात्कार के बाद किए जाने वाले कर्मों से संस्कार नहीं
बनते । इसलिये आत्मसाक्षात्कार के बाद मोक्ष की प्राप्ति के लिए 'प्रारब्ध'
कर्म और 'सञ्चित' कर्मों की समाप्ति का कार्य शेष रह जाता है। इन दोनों
की समाप्ति होने पर ही मोक्ष होता है। इनमें से 'प्रारब्ध' कर्मों का भोग
तो नियत समय तक अर्थात् जब तक इस वर्तमान शरीर की आयु निर्धारित
है तब तक चलता ही है। उसका उपपादन 'चक्रभूमि' के उदाहरण से किया
गया है। जैसे कुम्हार एक बार अपने 'चाक' को घुमा देता है तो उसमें जो
१ योग दर्शन २, ३ ।
२३४ तर्कभाषा [ कर्मनाशोपायाः
वेग संस्कार उत्पन्न हो जाता है उसके कारण चाक बहुत देर तक घूमता रहता
है इसी प्रकार प्रारब्ध कर्मों के वश यह शरीर अपने भोग के समाप्त होने तक
बना रहता है। 'तिष्ठति संस्कारवशाच्चक्रभ्रमिवद् धृतशरीरः'१। आत्म ज्ञान के
बाद जितने समय तक वर्तमान शरीर का नाश नहीं होता है तब तक साधक
'जीवन्मुक्ति' की अवस्था में रहता है। इस अवस्था में वह जो कुछ भी कर्म
करता है उसके उन कर्मों से नए संस्कार नहीं बनते हैं। इसीलिए कहा है कि
मातृवध पितृवध जैसे कर्मों से भी उसका कुछ नहीं बिगड़ता है।
'सञ्चित' कर्मों के नाश के प्रकार—
अब सञ्चित कर्मों से छुटकारा पाने का प्रश्न शेष रह जाता है। इसके विषय
में दो प्रकार के मत हैं। गीता का कथन तो यह है कि 'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि
भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन'। अर्थात् तत्त्वज्ञान की अग्नि उन सारे 'सञ्चित' कर्मों को
भस्म कर देती है। इस पक्ष में तत्त्वज्ञान के बाद योगी के लिए कुछ कर्तव्य
शेष नहीं रह जाता है। उसके मोक्ष में उतनी ही देर का विलम्ब है जब तक
उसके वर्तमान शरीर का पात नहीं होता। 'तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोच्यते'।
'सञ्चित' कर्मों के विनाश का दूसरा प्रकार वह है जिसका यहां तर्कभाषा-
कार ने वर्णन किया है। उसका आशय यह है कि तत्त्व ज्ञान होने पर योगी
को इस बात का ज्ञान भी योगसामर्थ्य से हो जाता है कि इस समय मेरे इतने
'सञ्चित' कर्म शेष पड़े हैं और साधारण प्रक्रिया के अनुसार इनका भोग मुझे
अमुक अमुक योनि में करना होगा। तब योगी, अपने योग-सामर्थ्य से एक
साथ उन सब शरीरों का निर्माण कर डालता है जिनमें उसके 'सञ्चित' कर्मों
का भोग होना है। इस प्रकार वह सारे 'सञ्चित' कर्मों को एक साथ ही भोग
डालता है। इसलिए भोग के लिए कोई 'सञ्चित' कर्म शेष नहीं रहता है। नया
कर्म उत्पन्न नहीं होता, और 'प्रारब्ध' का भोग से नाश हो जाता है इस
प्रकार नवीन शरीर की उत्पत्ति का कारण न होने से शरीरादि की उत्पत्ति
नहीं होती। यही मोक्ष है।
मोक्ष के स्वरूपविषयक दो मत—
जिस प्रकार मोक्ष प्राप्ति के प्रकार में दो प्रकार के मत हैं इसी प्रकार
मोक्ष के स्वरूप के विषय में भी दो प्रकार के मत हैं। नैयायिक आचार्य दुःख
१ सांख्यकारिका ६७ ।
संशयः ] संशयनिरूपणम् २३५
३ संशयः
एकस्मिन् धर्मिणि विरुद्धनानार्थविमर्शः संशयः । स च त्रिविधः ।
विशेषादर्शने सति समानधर्मदर्शनजः, विप्रतिपत्तिजः, असाधारणधर्मश्चेति ।
तत्रैको विशेषादर्शने सति समानधर्मदर्शनजः यथा 'स्थाणुर्वा पुरुषो
वा' इति । एकस्मिन्नेव हि पुरोवर्तिनि द्रव्ये स्थाणुत्वनिश्चायकं वक्र-
की अत्यन्त निवृत्ति को ही मोक्ष कहते हैं । परन्तु वेदान्ती मोक्ष में दुःख
निवृत्ति के अतिरिक्त नित्य सुख की प्राप्ति भी मानते हैं। उनका कहना है कि
आत्मा नित्य, विभु और आनन्द रूप है। संसार काल में देहादि के सम्बन्ध के
कारण नित्य-सुख की प्रतीति नहीं हो पाती है, परन्तु मोक्षावस्था में उसके
स्वस्वरूपभूत आनन्द की अभिव्यक्ति भी होती है। इसलिए मोक्ष में वह
आनन्दी भवति नित्य-सुख के अनुभव का 'आनन्दमय' हो जाता है। नैयायिक
मोक्ष में नित्य सुख की अभिव्यक्ति नहीं मानते हैं। इस विषय पर न्यायसूत्र के
वात्स्यायन भाष्य में बहुत विस्तार के साथ विचार किया गया है।
प्रमेयोंका निरूपण प्रारम्भ करते समय 'आत्म-शरीर-इन्द्रिय-अर्थ-बुद्धि-मनः-
प्रवृत्ति-दोष-प्रेत्यभाव-फल-दुःख-अपवर्गास्तु प्रमेयम्' इस सूत्र द्वारा बारह 'प्रमेय'
गिनाये थे। अपवर्ग का निरूपण समाप्त होने के साथ उन प्रमेयों का निरूपण
समाप्त हो जाता है। और इस प्रकार यहां तक न्याय के सोलह पदार्थों में से
'प्रमाण' तथा 'प्रमेय' इन दो पदार्थों का निरूपण समाप्त हो जाता है। अतएव
न्याय के प्रतिपाद्य तृतीय संशय पदार्थ का निरूपण प्रारम्भ करते हैं।
३ संशय
एक धर्म में विरुद्ध नाना धर्मों का परिज्ञान संशय [ कहलाता ] है। और
वह तीन प्रकार का होता है। १ विशेष के अदर्शन होते हुए समान धर्म के
दर्शन से उत्पन्न [ संशय दूसरा विशेषादर्शन होते हुए ] २ विप्रतिपत्ति से
उत्पन्न, [ संशय और तीसरा विशेषादर्शन होते हुए ] ३ साधारणधर्म के दर्शन
से उत्पन्न [ संशय ] ।
उनमें से पहिला विशेषादर्शन होने पर समानधर्म के दर्शन से उत्पन्न संशय
[ का उदाहरण ] जैसे [ यह ] स्थाणु है या पुरुष । सामने स्थित एक [ लम्बे
लम्बे ] द्रव्य में स्थाणुत्व के निश्चायक टेढ़ी मेढ़ी कोटर आदि [ अथवा ]
पुरुषत्व के निश्चय कराने वाले सिर हाथ आदि [ अवयवों ] को न देखने वाले
और [ सम्मुखस्थ पदार्थ में ] स्थाणु और पुरुष के समान धर्म ऊंचाई आदि
को देखने वाले पुरुष को [ उस पदार्थ के विषय में ] संशय होता है कि 'यह