तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअभावः ] प्रमेयनिरूपणम् २२१
तदेवं षट्पदार्था द्रव्यादयो वर्णिताः। ते च विधिमुखप्रत्ययवेद्य-
त्वाद् भावरूपा एव।
अभावरूपः सप्तमः पदार्थः
इदानीं निषेधमुखप्रमाणगम्योऽभावरूपः सप्तमः पदार्थः प्रतिपाद्यते ।
स च अभावः संक्षेपतो द्विविधः। संसर्गाभावोऽन्योन्याभावश्चेति ।
संसर्गाभावोऽपि त्रिविधः। प्रागभावः, प्रध्वंसाभावोऽत्यन्ताभावश्चेति ।
उत्पत्तेः प्राक् कारणे कार्यस्याभावः प्रागभावः। यथा तन्तुषु पटा-
परमाणुओं में एकः प्रतीति, अथवा सूक्ष्म परमाणुओं में स्थूलः घटः प्रतीति,
यदि मानी जाय तो उसको भ्रम कहने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है। परन्तु
भ्रम-प्रतीति उसको कहते हैं। जिसका बाध हो। अंधेरे में पड़ी रस्सी को देख
कर सर्प का भ्रम हो जाता है परन्तु प्रकाश में देखने पर वह सर्प-प्रतीति
बाधित हो जाती है। यह सर्प नहीं रज्जु है इस प्रकार अनुभव होने लगता है।
इसलिए जो प्रतीति की मिथ्या प्रतीति नहीं कहा जा सकता है। अपितु वह
यथार्थ प्रतीति ही है। इस यथार्थ प्रतीति के उपपादन के लिए परमाणु
समुदाय से अतिरिक्त घटादि अवयवी का मानना आवश्यक है। जैसे दस
सदस्यों से मिल कर एक सभा या समाजका निर्माण हुआ है। यह सदस्य जब
एक विशेष स्थान पर विशेष सूचना और नियम के अनुसार बैठते या एकत्र
होते हैं तब वह सभा या समाज कहलाता है। वैसे चलते-फिरते कहीं यों ही
एकत्र हो जाय तो वह सभा समाज या समाज का अधिवेशन नहीं कहलाता
है। इसलिए अवयव समुदाय से 'अवयवी' को अलग ही मानना चाहिये।
उसके माने बिना अनेक परमाणुओं में एकः, सूक्ष्म परमाणुओंमें स्थूलः और
अप्रत्यक्ष परमाणुओं में प्रत्यक्षः घटः इस प्रतीति का उपपादन नहीं हो सकता है।
इस प्रकार द्रव्य आदि छ [ भाव ] पदार्थों का वर्णन हो गया। वह विधि
रूप ज्ञान का विषय होने से भाव रूप 'अभाव' रूप सप्तम पदार्थ ही हैं।
'अभाव' रूप सप्तम पदार्थ
अब निषेध मुख प्रमाण से गम्य 'अभाव' रूप सातवें पदार्थ का प्रतिपादन
करते हैं। वह 'अभाव' संक्षेप में दो प्रकार का होता है। १ संसर्गाभाव
और २ अन्योन्याभाव । [ उनमें से ] संसर्गाभाव भी तीन प्रकार का है।
१ प्रागभाव, २ प्रध्वंसाभाव, और ३ अत्यन्ताभाव ।
उत्पत्ति के पूर्व कारण में कार्य का जो अभाव [ होता है वह ] 'प्रागभाव'
[ कहलाता ] है। जैसे [ पट की उत्पत्ति के पूर्व ] तन्तुओं में [ वर्तमान ] पट