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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 330 में से

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पृष्ठ 290

विज्ञानवादनिरासः ] प्रमेयनिरूपणम् २२५
स्वीकार नहीं करते हैं। उन में से 'माध्यमिक' सम्प्रदाय 'शून्यवादी' और
'योगाचार' सम्प्रदाय 'विज्ञानवादी' नाम से प्रसिद्ध है। 'विज्ञानवादी योगाचार
सम्प्रदाय' के मत में केवल ज्ञान का अस्तित्व है घट-पट आदि अर्थों की
वास्तविक सत्ता नहीं है। उनकी प्रतीति स्वप्न में दिखाई देने वाली वस्तुओं
के समान केवल कल्पित और भ्रम रूप है। उनका कहना यह है कि अर्थ
और ज्ञान दोनों का अस्तित्व मानने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि लौकिक
व्यवहार का उपपादन केवल एक ज्ञान के आधार पर भी किया जा सकता
है। जैसे स्वप्न में घट, पट आदि पदार्थों का अस्तित्व नहीं होता है केवल ज्ञान
ही होता है और उसी ज्ञान के आधार पर स्वप्न-काल में सारे लौकिक व्यवहारों
का उपपादन हो जाता है इसी प्रकार जागृत-काल का सारा व्यवहार भी
अर्थों के बिना केवल ज्ञानमात्र से चल रहा है। इसलिए ज्ञान से व्यतिरिक्त
अर्थों का अस्तित्व नहीं है। केवल ज्ञान ही एक यथार्थ वस्तु है। अन्य सब
दृश्यमान जगत् स्वप्नवत् परिकल्पित और मिथ्या है। यही 'विज्ञानवादी'
'योगाचार' सम्प्रदाय के मत का सार है।
ब्रह्मवादी वेदान्त मत—
वेदान्त दर्शन का 'शाङ्कर' सम्प्रदाय भी बौद्धों के इस 'विज्ञानवाद' से
मिलता-जुलता सम्प्रदाय है। उनके मत में ब्रह्म ही सत्य वस्तु है और जगत्
स्वप्न परिकल्पित वस्तु के समान मिथ्या है। वह जगत् को ब्रह्म का 'विवर्त'
मात्र कहते हैं। 'विवर्त' का अर्थ है 'अतात्त्विक अन्यथा प्रतीति'। जैसे रज्जु में
सर्प की प्रतीति।
'विवर्तवाद' तथा 'परिणामवाद'—
सृष्टि के विषय में दो प्रकार के मत हैं। सांख्य का मत 'परिणामवाद'
कहलाता है और शाङ्कर वेदान्त का मत 'विवर्तवाद' कहलाता है। दूध से
दही बनता है। यहां दही को दूध का 'परिणाम' कहा जाता है। पहिले दूध
रूप में प्रतीति होती थी उसके स्थान पर अब दही की प्रतीति हो रही है।
यहां न केवल प्रतीति में भेद हो गया है। अपितु दुग्ध रूप पदार्थ के स्वरूप
में भी परिवर्तन हो गया है। इसलिए इस प्रतीति को 'तात्त्विक अन्यथाप्रतीति'
कहते हैं इसी को 'विकार' या 'परिणाम' भी कहते हैं।
इसके विपरीत रज्जु में सर्प की प्रतीति 'अतात्त्विक अन्यथा प्रतीति' है।
उस में रज्जु बदल कर सर्प नहीं बन गई। रज्जु ज्यों की त्यों रज्जु ही है पर
उसमें प्रतीति सर्प की होने लगी है इसको 'अतात्त्विक अन्यथा प्रतीति'
१५ त० भा०