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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 330 में से

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पृष्ठ 282

सामान्यम् ] प्रमेयनिरूपणम् २१७
सत्' हैं। जातिबाधक इन हेतुओं का संग्रह एक कारिका में इस प्रकार किया गया है-
व्यक्तेरभेदस्तुल्यत्वं सङ्करोऽथाऽनवस्थितिः ।
रूपहानिरसम्बन्धो जातिबाधकसंग्रहः ॥
बौद्ध लोग 'सामान्य' या 'जाति' पदार्थ को नहीं मानते हैं। नैयायिकों का
'सामान्य' नित्य और अनेक समवेत धर्म है। 'नित्यत्वे सति अनेकसमवेतं
सामान्यम्' यह भी उसका लक्षण किया गया है। इसके अनुसार सामान्य
नित्य ही होता है। परन्तु बौद्ध लोग तो क्षणभङ्गवादी हैं। उनके यहां 'सर्वं
क्षणिकम्', सब कुछ क्षणिक है यह एक मुख्य सिद्धान्त है। इसलिए वह 'जाति'
जैसे नित्य पदार्थ को मान ही नहीं सकते हैं। 'जाति' का खण्डन कर देने
पर 'जाति' का कार्य 'अनुवृत्ति-प्रत्यय' अथवा एकाकार प्रतीति है वह कैसे
होगी ? इस प्रश्न का उत्तर बौद्ध लोग 'अपोह' के द्वारा देते हैं। अर्थात्
'अनुवृत्ति-प्रत्यय' का कारण वह जाति के स्थान पर 'अपोह' को मानते हैं।
'अपोह' का अर्थ है 'अतद्व्यावृत्ति' या 'तद्भिन्न-भिन्नत्व' । दस घट व्यक्तियों
में जो घटः, घटः इस प्रकार की अनुगत प्रतीति होती है उसका कारण उनमें
रहने वाला 'घटत्व सामान्य' नहीं अपितु उनका 'अघटव्यावृत्त' या घटभिन्न
सारे जगत् में भिन्न होना ही है। अतत् अर्थात् अघट, अर्थात् घट से भिन्न
सारा जगत् हुआ, उस जगत् से भिन्न घट हुआ। यह 'तद्भिन्न-भिन्नत्व' या
'अतद्व्यावृत्ति' ही घटों में अनुगत प्रतीति का कारण है। इसी को बौद्ध
दार्शनिक 'अपोह' कहते हैं।
यहां यह प्रश्न हो सकता है कि नैयायिक एकाकार प्रतीति का कारण
'घटत्व सामान्य' को मानते हैं और बौद्ध सामान्य को न मान कर उसके स्थान
पर 'अपोह' को एकाकार प्रतीति का आधार मानते हैं। इन दोनों में नाम
के अन्तर के अतिरिक्त और तात्त्विक अन्तर क्या है ? इसका उत्तर यह है
कि नैयायिकों का 'सामान्य' अन्य पदार्थों से भिन्न एक भावभूत नित्य पदार्थ
है। और बौद्धों का 'अपोह' 'अन्योन्याभाव' रूप है। न्याय, वैशेषिक जिसको
'अन्योन्याभाव' कहते हैं उसी को बौद्ध दार्शनिक 'अपोह' या 'अतद्व्यावृत्ति'
अथवा 'तद्भिन्नभिन्नत्व' आदि शब्दों से कहते हैं। उनका अभिप्राय यह है
कि नैयायिक 'अन्योऽन्याभाव' को मानते ही हैं उसी 'अन्योन्याभाव' रूप
'अपोह' से जब एकाकार प्रतीति का उपपादन हो सकता है तब 'सामान्य' नाम
के एक अन्य अयौक्तिक पदार्थ को क्यों माना जाय। अतः उसका मानना व्यर्थ है।
१ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली