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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 330 में से

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पृष्ठ 284

विशेषः ] प्रमेयनिरूपणम् २१६
विशेषः
विशेषो नित्यो नित्यद्रव्यवृत्तिः । व्यावृत्तिबुद्धिमात्रहेतुः । नित्य-
द्रव्याणि त्वाकाशादीनि पञ्च । पृथिव्यादयश्चत्वारः परमाणुरूपाः ।
विशेष
नित्यद्रव्य [ परमाणु आदि ] में रहने वाला और नित्य [ अन्तिम भेदक धर्म ]
विशेष है । [ वह ] केवल व्यावृत्ति [ भेद ] बुद्धि का हेतु होता है । नित्यद्रव्य
[ से ] आकाश आदि पांच हैं । [ जिनमें से ] पृथिवी आदि चार [ १ पृथिवी,
२ जल, ३ वायु, ४ अग्नि केवल ] परमाणु रूप [ ही नित्य है । कार्य रूप पृथिवी
आदि नित्य है । इनमें रहने वाला अन्तिम भेदक धर्म 'विशेष' कहलाता ] है ।
'विशेष' पदार्थ वैशेषिक दर्शन का सबसे मुख्य पदार्थ है । इसी के आधार
पर कदाचित् इस दर्शन का 'वैशेषिक' नाम पड़ा है । घटादि पदार्थों का
सजातीय पदार्थान्तर से जो भेद होता है उसका उपपादन साधारणतः अवयव
भेद के आधार पर किया जाता है । एक घट दूसरे से क्यों भिन्न है । इसका
उत्तर यह है कि दोनों घट भिन्न अवयवों अर्थात् कपालों से बने हैं । वह
कपाल परस्पर क्यों भिन्न हैं इसका भी उत्तर वही है कि उनके अवयव अर्थात्
कपालिकाएं भिन्न हैं । फिर कपालिकाओं के भेद के विषय में भी अवयव
भेद को ही कारण कहा जा सकता है । इस प्रकार चलते चलते परमाणुओं
पर पहुँचते हैं । वहां भी यह प्रश्न होता है कि एक पार्थिव परमाणु दूसरे
पार्थिव परमाणु से क्यों भिन्न है । इसका उत्तर अवयव-भेद से नहीं दिया जा
सकता है । क्योंकि परमाणु के अवयव नहीं होते हैं । इसलिए परमाणुओं
के भेद का उपपादन करने के लिए उनमें 'विशेष' पदार्थ की कल्पना की गई
है । इस 'विशेष' के रहने के कारण एक पार्थिव परमाणु, दूसरे पार्थिव परमाणु
से भिन्न है ।
अब प्रश्न यह हो सकता है कि यह 'विशेष' क्यों भिन्न हैं ? इसका उत्तर
यह है कि 'विशेष' का स्वरूप ही 'स्वतो-व्यावृत्त' है । उसका भेदक अन्य
कोई धर्म नहीं है । यह 'विशेष' ही नित्य द्रव्यों में रहने वाला अन्तिम भेदक
धर्म है । यह 'विशेष' जिन नित्य द्रव्यों में रह सकता है वह नित्यद्रव्य पृथिवी
आदि चार के परमाणु और आकाश कुल पांच है । शेष चार द्रव्यों में से
काल और दिक् अभिन्न व एक हैं, अतः उनमें 'विशेष' के मानने की
आवश्यकता नहीं है । आत्मा और मन के भेदक धर्म उनके अपने गुण अदृष्ट,
धर्म, अधर्म, संस्कार आदि ही हो जाते हैं इसलिए उनमें भी 'विशेष' के