तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ तर्कभाषा [ सामान्यम्
अत्र कश्चिदाह 'व्यक्तिव्यतिरिक्तं सामान्यं नास्ति' इति । तत्र वयं
ब्रूमः किमालम्बना तर्हि भिन्नेषु विलक्षणेषु पिण्डेष्वेकाकारा बुद्धिर्विना
सर्वानुगतमेकम् । यच्च तदालम्बनं तदेव सामान्यमिति ।
ननु तस्याऽतद्व्यावृत्तिकृतैवैकाकारा बुद्धिरस्तु । तथाहि, सर्वेष्वेव
हि गोपिण्डेषु, अगोभ्योऽश्वादिभ्यो व्यावृत्तिरस्ति । तेनागोव्यावृत्ति-
विषय एवायमेकाकारः प्रत्ययोऽनेकेषु, न तु विधिरूपगोत्वसामान्यविषयः ।
मैवम् । विधिमुखेनैवैकाकारस्फुरणात् ।
इसके विपरीत नैयायिकों का कहना है कि घटः आदि प्रतीति में 'अपोह'
को कारण मानना अनुभव विरुद्ध क्लिष्ट कल्पना है। जब हम दस घड़ों को
देखते हैं तब उन सब में एक अनुगतधर्म की हमको प्रतीति होती है। उन
सब घटों में रहने वाले समान धर्म या 'सामान्य' के आधार पर ही उनमें
एकाकार प्रतीति होती है। 'अतद्व्यावृत्ति' या 'तद्भिन्नभिन्नत्व' का बोध,
'घटः' आदि एकाकार प्रतीति के काल में नहीं होता है। अतः अनुभव विरुद्ध
होने से 'अपोह' को कारण मानना उचित नहीं है इसलिए सामान्य को मानना
ही चाहिए। इसी बात को ग्रंथकार आगे कहते हैं—
यहाँ [ सामान्य के विषय में ] कोई [ बौद्ध ] कहता है कि [ घटादि ]
व्यक्ति से अतिरिक्त [ उसमें रहने वाला 'घटत्व' आदि ] 'सामान्य' नहीं है।
इस [ पूर्वपक्ष के विषय ] में हम [ यह ] कहते हैं कि [ यदि सामान्य नहीं
है तो ] भिन्न भिन्न विलक्षण [ घट आदि ] पिण्डों में [ होने वाली ] एकाकार
प्रतीति का उन सब में रहने वाले एक [ घटत्वादि सामान्य ] के सिवाय और
क्या आधार है। जो उस [ एकाकार प्रतीति ] का आधार [ आलम्बन या विषय ]
है, वही 'सामान्य' है।
[ इस पर पूर्वपक्षी बौद्ध कहता है ] अच्छा [ वह ] एकाकार प्रतीति 'अतद्-
व्यावृत्ति' कृत ही मान ली जाय । जैसे कि सब ही गोपिण्डों में ['अगो' अर्थात्]
गोभिन्न अश्वादि से व्यावृत्ति [भिन्नता] होती है। इसलिए अ-गोव्यावृत्ति [गोभिन्न-
भिन्नत्व] विषयक ही अनेक [ गोपिण्डादि ] में होने वाला यह एकाकार ज्ञान है
भावभूत [ गोत्वादि ] सामान्यविषयक नहीं।
[ इसका उत्तर नैयायिक देता है ] यह ठीक नहीं है। एकाकार प्रतीति के
विधिमुख [ भाव रूप ] से ही होने से। [अर्थात् एकाकार प्रतीति में अतद्व्यावृत्ति
स्पष्ट अनुभव में नहीं आती है अपितु अनुगत भावभूत 'सामान्य' ही उस प्रतीति
का विषय होता है ] ।