तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ तर्कभाषा [ अभावः
भावः । स चानादिरुत्पत्तेरभावात् । विनाशी च, कार्यस्यैव तद्विनाश-
रूपत्वात् ।
उत्पन्नस्य कारणेऽभावः प्रध्वंसाभावः । प्रध्वंसो विनाश इति यावत् ।
यथा भग्ने घटे कपालमालायां घटाभावः । स च मुद्गरप्रहारादिजन्यः ।
स चोत्पत्तिमानप्यविनाशी नष्टस्य कार्यस्य पुनरनुत्पत्तेः ।
त्रैकालिकोऽभावोऽत्यन्ताभावः । यथा वायौ रूपाभावः । अन्यो-
न्याभावस्तु तादात्म्यप्रतियोगिताकोऽभावः । 'घटः पटो न भवति' इति ।
का अभाव । [ उसकी ] उत्पत्ति न होने से वह अनादि है । और [ अनादि
होने पर भी ] विनाशी है । कार्य के ही उस के विनाश रूप होने से ।
घट की उत्पत्ति हो जाने से घट का 'प्रागभाव' नष्ट हो जाता है । इसलिए
'प्रागभाव' विनाशी है । घट का 'प्रागभाव' कब से प्रारम्भ हुआ यह नहीं
कहा जा सकता । जब घड़ा बना, उसके पूर्व अनादि काल से उस घट का
अभाव है । इसलिए यह 'प्रागभाव' अनादि है। जो पदार्थ अनादि हो वह
अनन्त, और जो सादि हो वह सान्त होता है यह सामान्य नियम है परन्तु
वह केवल भाव पदार्थों के विषयमें ही लागू होता है अभाव के विषय में नहीं।
अभाव में तो 'प्रागभाव' अनादि होने पर भी सान्त होता है । और 'प्रध्वंसा-
भाव' सादि होने पर भी अनन्त होता है ।
उत्पन्न हुए [ घटादि मुद्गर-प्रहारादि के कारण जब टूट जाते हैं तब उस
घट आदि ] का कारण [कपाल आदि के रूप] में जो अभाव वह 'प्रध्वंसाभाव'
[ कहलाता ] है । प्रध्वंस का अर्थ विनाश है । जैसे घड़े के फूट जाने पर कपाल
माला में [ वर्तमान ] घटाभाव । और वह [ प्रध्वंसाभाव ] मुद्गर-प्रहार आदि
से उत्पन्न हुआ है । वह उत्पत्तिमान् होने पर भी अविनाशी हैं [ क्योंकि ] नष्ट
हुए कार्य की पुनः उत्पत्ति नहीं हो सकती है । [ उस मिट्टी से अथवा उन
कपालों से यदि दुबारा घड़ा बनाया भी जाय तो वह दूसरा ही घट होगा ।
पूर्व विनष्ट घट दुबारा कभी उत्पन्न नहीं हो सकता है । इसलिए प्रध्वंसाभाव
सादि होने पर भी अनन्त होता है ] ।
त्रैकालिक [ और संसर्गावच्छिन्न प्रतियोगिक ] अभाव अत्यन्ताभाव
[ कहलाता ] है । जैसे वायु में रूप का अभाव है [ त्रैकालिक अभाव है, और
संसर्गावच्छिन्न प्रतियोगिताक अभाव होने 'अत्यन्ताभाव' है ] 'अन्योन्याभाव' तो
'तादात्म्य-प्रतियोगिताक' अभाव होता है । जैसे 'घट पट नहीं होता है' यह
[ 'अन्योन्याभाव' का उदाहरण है ] ।