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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 330 में से

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पृष्ठ 281

२१६ तर्कभाषा [ जातिबाधकाः
बन जायगा और उस दशा में 'अनवस्था' दोष होगा। जाति में जाति
मानने से जैसे 'घटत्व' जाति में 'घटत्वत्व' सामान्य माना जाने लगेगा। इसी
प्रकार दस घटत्वत्वों में रहने वाला एक और सामान्य घटत्व-त्व-त्व बन जायगा।
और यह परम्परा अनन्त काल तक चलती रहेगी। उसकी कहीं समाप्ति नहीं
होगी। इसलिए 'अनवस्था' दोष होने से जाति में जाति रहने का सिद्धान्त
नहीं माना जा सकता है। अतएव सामान्य पदार्थ, जो जाति स्वरूप है दूसरी
जाति या 'सत्ता सामान्य' को नहीं माना जा सकता है। इसलिए 'अनवस्था-
भयात्' सामान्य' में 'सत्ता' जाति नहीं रहती है यह सिद्ध हुआ ।
इसी प्रकार 'विशेष' में भी 'सामान्य' नहीं माना जा सकता है। 'विशेष'
में यदि 'सामान्य' माना जाय तो उस विशेष का स्वरूप ही नष्ट हो जायगा।
विशेष को अन्तिम भेदक धर्म के रूप में माना गया है और उसका स्वरूप
ही 'स्वतः व्यावृत्त' है। 'नित्यद्रव्यवृत्तयोऽन्त्या विशेषाः'। नित्य द्रव्य परमाणु
आदि में रहने वाले अन्तिम भेदक धर्म को 'विशेष' कहते हैं। और प्रत्येक
परमाणु आदि में रहने वाला 'विशेष' बिल्कुल अलग अलग 'स्वतः व्यावृत्त'
होता है। अब यदि उन अलग अलग विशेषों में 'विशेषत्व' नाम का सामान्य
धर्म या जाति मान ली जाय तो फिर 'विशेष' का जो 'स्वतः व्यावृत्त' स्वरूप है
वही नष्ट हो जायगा। अतएव 'स्वरूपहानि-भयात्' 'विशेष' में 'सामान्य' नहीं
माना जाता है। इसलिए 'विशेष' पदार्थ में भी 'सत्ता' जाति नहीं रहती है।
इसी प्रकार 'समवाय' में भी 'सामान्य' नहीं रहता है। समवाय में 'सामान्य'
के अभाव मानने का कारण 'असम्बन्ध' है । अर्थात् यदि समवाय में 'समवा-
यत्व' जाति मानें तो जाति 'समवाय' सम्बन्धसे ही व्यक्ति में रहती है इसलिए
समवाय में भी 'समवाय' सम्बन्ध से ही जाति रहेगी। अतएव 'समवाय'
पदार्थ में उससे भिन्न 'समवायत्व' जाति की स्थिति का निर्वाह करने वाला
एक और 'समवाय' मानना होगा। जो कि सम्भव नहीं है। इसलिए समवाय
में समवायत्व जाति का नियामक कोई सम्बन्ध न बनने से 'समवाय' में जाति
नहीं रहती है । अतएव 'समबाय' में 'सत्ता' जाति नहीं रहती है । इस प्रकार
१ 'सामान्य' में जाति मानने में 'अनवस्था', २ 'विशेष' में जाति मानने में
'रूप-हानि', और ३ 'समवाय' में जाति मानने में 'असम्बन्ध' दोषों के बाधक
होने से इन तीनों पदार्थों में 'सत्ता' अथवा अन्य कोई भी जाति नहीं रहती ।
अतः यह तीनों 'सत्ता' जाति के सम्बन्ध से 'सत्' नहीं कहलाते अपितु 'स्वरूप