तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअभावयोर्भेदः ] प्रमेयनिरूपणम् २२३
'अत्यन्ताभाव' और 'अन्योन्याभाव' का भेद—
'अन्योन्याभाव' जैसे घट, पट नहीं है और 'अत्यन्ताभाव' जैसे वायु में
रूप नहीं है, यह दोनों ही अभाव त्रैकालिक अभाव होते हैं परन्तु उनमें भेद
यह है कि अत्यन्ताभाव तो 'संसर्गावच्छिन्न-प्रतियोगिताक' अभाव होता है और
'अन्योन्याभाव' तादात्म्यप्रतियोगिताक' अभाव होता है। जैसे घट पट नहीं है।
अर्थात् घट और पट का तादात्म्य या अभेद नहीं है। 'घटः पटो न' यहां घट
और पट के संयोग सम्बन्ध का निषेध नहीं किया जा रहा है। घट और पट
का संयोग होने पर भी 'घटः पटो न' यह व्यवहार हो सकता है। इसलिए
घट और पट के संयोग रूप संसर्ग का निषेध करना इसका प्रयोजन नहीं है
अपितु उन दोनों के अभेद, ऐक्य, या तादात्म्य का निषेध किया जा रहा है।
'घटः पटो न' का अर्थ 'घटपटयोस्तादात्म्यं न' यह है। अर्थात् तादात्म्य से जो
अभाव उसको 'अन्योन्याभाव' कहते हैं।
जिसका अभाव होता है उसको अभाव का 'प्रतियोगी' कहते हैं। 'यस्य
अभावः स तस्य प्रतियोगी' । जैसे घटाभाव का प्रतियोगी घट, और पटाभाव
का प्रतियोगी 'पट' होता है। 'प्रतियोगी' में उस अभाव की प्रतियोगिता रहती
है। और उस 'प्रतियोगिता' का नियामक कोई सम्बन्ध होता है। जहां अभाव
रहता है उसको अभावका अधिकरण या 'अनुयोगी' कहते हैं। और 'प्रतियोगी'
का अधिकरण या 'अनुयोगी' के साथ जो सम्बन्ध होता है वही उस अभाव का
प्रतियोगितानियामक अथवा 'प्रतियोगितावच्छेदक-सम्बन्ध' कहलाता है। जैसे
'भूतले घटाभावः' इस प्रतीति में भूतल अधिकरण या 'अनुयोगी' है घट
'प्रतियोगी' है। भूतल और घट का संयोग सम्बन्ध होता है इसलिए भूतल में
जो घटाभाव रहता है उसका नियामक अथवा अवच्छेदक सम्बन्ध भी संयोग
ही होगा। इसलिए 'भूतले घटाभावः' या 'भूतले घटो नास्ति' को न्याय की
भाषा में 'भूतलानुयोगिक-घटप्रतियोगिक-संयोगसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताक
अभाव' भी कह सकते हैं। यह संयोग एकप्रकारक सम्बन्ध या संसर्ग है इसलिए
यह अभाव 'संसर्गाभाव' कहलाता है।
'घटः पटो न' यह 'अन्योन्याभाव' का जो उदाहरण दिया है उसमें घट
और पट के तादात्म्य का निषेध किया गया है। अतएव यह अभाव
'तादात्म्यप्रतियोगिताक' अभाव है। यह अभाव भी त्रैकालिक अभाव ही है।
और 'अत्यन्ताभाव' का लक्षण ही 'त्रैकालिकोऽभावोऽत्यन्ताभावः' किया गया
है। अर्थात् त्रैकालिक अभाव को 'अत्यन्ताभाव' कहते हैं। इसलिए