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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 330 में से

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पृष्ठ 289

२६४ तर्कभाषा [ विज्ञानवादनिरासः
तदेवमर्था व्याख्याताः ।
विज्ञानवादनिरासः
ननु ज्ञानाद् ब्रह्मणो वा अर्था व्यतिरिक्ता न सन्ति । मैवम् । अर्था-
नामपि प्रत्यक्षादिसिद्धत्वेनाशक्यापलापत्वात् ।
'अत्यन्ताभाव' और 'अन्योन्याभाव' का भेद 'प्रतियोगितावच्छेदक-सम्बन्ध'
के आधार पर ही होता है । 'अन्योन्याभाव' में 'प्रतियोगितावच्छेदक-धर्म'
'तादात्म्य' होता है और 'अत्यन्ताभाव' में 'प्रतियोगितावच्छेदक-सम्बन्ध'
'तादात्म्य' से भिन्न 'संयोग' या 'समवाय' आदि संसर्ग होता है । 'प्रागभाव,'
'प्रध्वंसाभाव' और 'अत्यन्ताभाव' इन तीनों में 'प्रतियोगितावच्छेदक-सम्बन्ध'
तादात्म्य से भिन्न संयोगादि संसर्ग ही होता है । इसलिए यह तीनों अभाव
'संसर्गावच्छिन्नप्रतियोगिताक अभाव' होने से 'संसर्गाभाव' कहलाते हैं। इसके
विपरीत 'अन्योन्याभाव' में 'प्रतियोगितावच्छेदक-धर्म' 'तादात्म्य' के होने से
'तादात्म्य-प्रतियोगिताक अभाव' को 'अन्योन्याभाव' कहते हैं ।
इस प्रकार [ वैशेषिकाभिमत द्रव्य आदि षट् पदार्थ रूप ] अर्थों की व्याख्या
हो गई ।
विज्ञानवाद का निराकरण—
[ प्रश्न ] ज्ञान अथवा ब्रह्म से अतिरिक्त [ द्रव्य आदि ] अर्थों की सत्ता
[ ही ] नहीं है । [ तब आप उनका वर्णन कैसे करते हैं ] ।
[ उत्तर ] यह कहना ठीक नहीं है । [ द्रव्य आदि ] अर्थों के भी प्रत्यक्ष
सिद्ध होने से उनका निषेध नहीं किया जा सकता है ।
विज्ञानवादी बौद्ध मत—
अर्थों के निरूपण के बाद इस प्रश्न के उठाने का अभिप्राय यह है कि
वेदान्त तथा बौद्ध मत जो अर्थों का अलग अस्तित्व नहीं मानते हैं उनके
मत का संक्षेप में निराकरण किया जाय । बौद्धों के चार मुख्य दार्शनिक
सम्प्रदाय हैं । १ माध्यमिक, २ योगाचार, ३ सौत्रान्तिक और ४ वैभाषिक ।
इनमें से 'सौत्रान्तिक' और 'वैभाषिक' यह दोनों घट-पट आदि बाह्य पदार्थों
का अस्तित्व मानते हैं । उनमें परस्पर भेद यह है कि उन में से एक
[ सौत्रान्तिक ] बाह्य अर्थों को प्रत्यक्ष सिद्ध मानता है और दूसरा [वैभाषिक]
'साकारज्ञानवाद' को स्वीकार कर ज्ञान में घट-पटादि अर्थों का आकार मान
कर उससे अर्थ का अनुमान मानता है । अर्थ को प्रत्यक्ष नहीं मानता । शेष
दो सम्प्रदाय अर्थात् 'माध्यमिक' और 'योगाचार' बाह्य अर्थों का अस्तित्व ही