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तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

आकाशद्रव्यम् ] प्रमेयनिरूपणम् १८७
तथाहि शब्दस्तावद् विशेषगुणः सामान्यवत्त्वे सत्यस्मदादिबाह्ये-
न्द्रियग्राह्यत्वाद् रूपांदिवत् । गुणश्च गुण्याश्रित एव । न चास्य पृथि-
व्यादिचतुष्टयमात्मा च गुणी भवितुमर्हति, श्रोत्रग्राह्यत्वाच्छब्दस्य । ये
हि पृथिव्यादीनां गुणा न ते श्रोत्रेन्द्रियेण गृह्यन्ते, यथा रूपादयः,
शब्दस्तु श्रोत्रेण गृह्यते । न दिक्कालमनसां गुणो विशेषगुणत्वात् । अत
एभ्योऽष्टभ्योऽतिरिक्तः शब्दगुणी एषितव्यः, स एवाकाश इति ।
स चैको, भेदे प्रमाणाभावात् । एकत्वेनैवोपपत्तेः। एकत्वाच्चाकाशत्वं
नाम सामान्यमाकाशे न विद्यते सामान्यस्यानेकवृत्तित्वात्-विभु चाकाशम्

हो जाने पर अन्य [ किसी को प्राप्ति ] का प्रसङ्ग न होने से जो बच रहे उसको
स्वीकार कर लेना 'परिशेष' [ अनुमान कहलाता है इस प्रकार परिशेषानुमान
का लक्षण भाष्यकार ने किया ] है ।
[ यहां शब्द के विषय में परिशेषानुमान का यह लक्षण इस प्रकार घटता
है कि ] जैसे शब्द सामान्य [ जाति ] युक्त होकर हमारी बाह्य एक [ श्रोत्र ]
इन्द्रिय से ग्राह्य होने से रूपादि के समान 'विशेष गुण' है। और गुण, गुणी के
आश्रित ही होता है । [ आकाश को छोड़कर शेष आठ द्रव्यों में से [ पृथिवी
आदि चार [ पृथिवी, अप्, तेज, वायु ] और आत्मा [ यह पांच ] इस [ शब्द-
गुण ] के गुणी नहीं हो सकते हैं। शब्द के श्रोत्र-ग्राह्य होने से [ पृथिवी आदि
चार और आत्मा इन पांचों के विशेष गुणों में से कोई भी श्रोत्र-ग्राह्य नहीं है
अतएव श्रोत्रग्राह्य शब्द इन पाँचों में से किसी का गुण नहीं हो सकता है ] जो
पृथिवी आदि के गुण हैं वह श्रोत्र इन्द्रिय से गृहीत नहीं होते हैं। जैसे रूपादि ।
और शब्द तो श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत होता है । [ इसलिए शब्द पृथिवी आदि
चार तथा आत्मा इन पांच का गुण नहीं है ] और न दिक्, काल, तथा मन
[ इन तीन ] का गुण है विशेष गुण होने से । [ दिक्, काल, और मन इन
तीनों में रहने वाले गुण सामान्य गुण हैं विशेष गुण नहीं और शब्द विशेष
गुण है इसलिए वह इन तीनों का भी गुण नहीं है ] । इसलिए इन आठों से
अतिरिक्त शब्द [ गुण ] का गुणी मानना चाहिए । वह ही आकाश है ।
और वह एक है भेद में [ साधक ] प्रमाण न होने से एकत्व से ही कार
हो जाने से [ आकाश को अनेक मानने की आवश्यकता नहीं है ] । एक होने के
कारण ही 'आकाशत्व' नामक सामान्य [ जाति ] आकाश में नहीं रहता है ।
सामान्य के अनेक में रहने वाला होने से । और आकाश विभु अर्थात् 'परममहत्-

१८८ तर्कभाषा [ आकाशद्रव्यम्
परममहत्परिमाणवदित्यर्थः¹। सर्वत्र तत्कार्योपलब्धेः। अतएव विभु-
त्वान्नित्यमिति।
परिमाण' वाला है। सर्वत्र उसका कार्य [ शब्द ] उपलब्ध होने से [ आकाश
विभु है ] और विभु होने से नित्य है।
एक होने से आकाश में 'आकाशत्व' जाति नहीं है। इसके कहने का
अभिप्राय यह है कि 'नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वम् सामान्यम्' यह
'सामान्य' का लक्षण किया गया है। अर्थात् 'सामान्य' नित्य और अनेक में
रहने वाला धर्म होता है। जैसे 'घटत्व', 'पटत्व' आदि 'सामान्य' कहलाते हैं।
वह अनेक घट तथा अनेक पट व्यक्तियों में रहने से और उन अनेक व्यक्तियों में
घटः, घटः इस प्रकार की एकाकार, अनुगत-प्रतीति के जनक होने से ही
'सामान्य' कहलाते हैं। परन्तु आकाश अनेक नहीं हैं इसलिए उसमें 'आका-
शत्व' नाम का 'सामान्य' नहीं रहता है। यद्यपि घटत्व के समान आकाश शब्द
के आगे भी 'त्व' प्रत्यय जोड़ कर 'आकाशत्व' व्यवहार होता है। परन्तु
'आकाशत्व' 'सामान्य' नहीं अपितु 'उपाधि' है।
काल-निरूपण—
आगे काल का निरूपण करते हैं। काल की सिद्धि दिग्विपरीत परत्व
और अपरत्व, से तथा दिक् की सिद्धि कालविपरीत परत्वापरत्व से अनुमान
द्वारा होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जो आयु में बड़ा है जिसके
साथ काल का अधिक सम्बन्ध है वह 'कालिक-दृष्टि' से 'पर' कहा जाता है।
और जिसके साथ काल का अल्प सम्बन्ध है अर्थात् जो आयु में छोटा है
उसे 'कालिक-दृष्टि' से 'अपर' कहते हैं इसी प्रकार जिसके साथ अधिक
देश का सम्बन्ध है अर्थात् जो अधिक दूर बैठा है वह 'दैशिक-दृष्टि' से 'पर' है
और जिसके साथ देश का अल्प सम्बन्ध है अर्थात् जो समीप स्थित है वह
'दैशिक-दृष्टि' से 'अपर' है। इस दशा में वृद्ध पुरुष, युवक की अपेक्षा 'कालिक
दृष्टि' से 'पर' है परन्तु यदि वही वृद्ध पुरुष जो काल की दृष्टि से 'पर' है,
युवक की अपेक्षा समीप बैठा हो तो उस में 'अपर' व्यवहार होगा। यही
दिग्-विपरीत तथा काल-विपरीत परत्व और अपरत्व है। अत एव दिग्विप-
रीत परत्वापरत्व से काल का और कालविपरीत परत्वापरत्व से दिक् का
अनुमान होता है। यही आगे कहते हैं।
१ पूना के संस्करण में 'परममहत्परिमाणवानित्यर्थः' इस प्रकार पुल्लिंग पाठ है।

कालद्रव्यम् ] प्रमेयनिरूपणम् १८६
कालोऽपि दिग्-विपरीतपरत्वापरत्वानुमेयः । संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-
संयोग-विभागवान् । एको नित्यो विभुश्च । कथमस्य दिग्-विपरीत-
परत्वापरत्वानुमेयत्वम् । उच्यते । सन्निहिते वृद्धे सन्निधानादपरत्वार्हे
तद्विपरीतं परत्वं प्रतीयते । व्यवहिते यूनि व्यवधानात् परत्वार्हे तद्वि-
परीतमपरत्वम् । तदिदं तत्तद्विपरीतं परत्वमपरत्वञ्च कार्यं तत्कारणस्य
दिगादेरसम्भवात् कालमेव कारणमनुमापयति । स चैकोऽपि
वर्तमानातीतभविष्यत्क्रियोपाधिवशाद् वर्तमानादिव्यपदेशं लभते, ।
पुरुष इव पच्यादिक्रियोपाधिवशात् पाचक-पाठकादिव्यपदेशम् । नित्यत्व-
विभुत्वे चास्य पूर्ववत् ।
कालविपरीतपरत्वापरत्वानुमेया दिक् । एका नित्या विभ्वी च ।
संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-संयोग-विभागवती । पूर्वादिप्रत्ययैरनुमेया ।
तेषामन्यनिमित्तासम्भवात् । पूर्वस्मिन् पश्चिमे वा देशे स्थितस्य
काल भी दिग्-विपरीत परत्व, अपरत्व से अनुमेय है । १ संख्या, २ परिमाण,
३ पृथक्त्व, ४ संयोग, ५ विभाग, [ इन पांच गुणों ] से युक्त, एक नित्य और
विभु है ।
[ प्रश्न ] इस का दिग्विपरीत परत्वापरत्व से अनुमेयत्व कैसे है ?
[ उत्तर ] कहते हैं । पास में स्थित अतएव सन्निधान के कारण [ 'दैशिक
दृष्टि' से ] 'अपरत्व' [ व्यवहार ] के योग्य वृद्ध [ पुरुष ] में उस [ अपरत्व ] के
विपरीत [ 'कालिकदृष्टि' से ] 'परत्व' प्रतीत होता है । [ इसी प्रकार ] दूरस्थ
अतएव व्यवधान के कारण [ 'दैशिक-दृष्टि' से [ 'परत्व' [ व्यवहार ] के योग्य
युवक में उस [ दैशिक परत्व ] के विपरीत 'अपरत्व' प्रतीत होता है । यह उस
उस [ दैशिक अपरत्व और परत्व ] के विपरीत 'परत्व', 'अपरत्व' कार्य, उसका
कारण दिगादि सम्भव न होने से से काल को ही कारण रूप में अनुमित कराता
है । वह एक होने पर भी वर्तमान, अतीत, भविष्यत् क्रिया रूप उपाधि के
सम्बन्ध से वर्तमान आदि संज्ञा को प्राप्त होता है जैसे पचन [ पठन ] आदि
क्रिया रूप उपाधि के कारण पुरुष पाचक, पाठक आदि व्यवहार को प्राप्त होता
है । इसके विभुत्व और नित्यत्व पूर्ववत् [ आकाश के समान ] होते हैं ।
'दिक्' का निरूपण—
कालविपरीत परत्व, अपरत्व से अनुमेय दिक्, एक, नित्य और विभु है ।
१ संख्या, २ परिमाण, ३ पृथक्त्व, ४ संयोग, ५ विभाग, [ इन पांचो गुणों ]
से युक्त है । पूर्व [ पश्चिम ] आदि ज्ञान से [ भी ] अनुमेय है उनका अन्य
निमित्त न होने से । पूर्व में या पश्चिम देश में स्थित वस्तु के समानरूप होने

१६० तर्कभाषा [ दिगात्ममनो द्रव्याणि
वस्तुनस्तादवस्थ्यात् । सा चैकापि सवितुस्तत्तद्देशसंयोगोपाधिवशात्
प्राच्यादिसंज्ञां लभते ।
आत्मत्वाभिसम्बन्धवान् आत्मा । सुखदुःखादिवैचित्र्यात् प्रतिशरीरं
भिन्नः । स चोक्त एव । तस्य सामान्यगुणाः संख्यादयः पञ्च, बुद्ध्यादयो
नव विशेषगुणाः । नित्यत्व-विभुत्वे पूर्ववत् ।
मनस्त्वाभिसम्बन्धवन्मनः । अणु, आत्मसंयोगि, अन्तरिन्द्रियम्
सुखाद्युपलब्धिकारणं नित्यञ्च । संख्याद्यष्टगुणवत् । तत्संयोगेन बाह्येन्द्रिय-
मर्थग्राहकम् । अतएव सर्वोपलब्धिसाधनम् । तच्च न प्रत्यक्षम्, अपि त्वनु-
मानगम्यम् । तथाहि सुखाद्युपलब्धयश्चक्षुराद्यतिरिक्तकरणसाध्याः,
[ पर भी यह पूर्व में रखी है या पश्चिम में इस प्रकार का व्यवहार-भेद होने का
दिक् के अतिरिक्त और कोई कारण न होने ] से । और वह एक होने पर भी
सूर्य के उस उस देश के साथ संयोग रूप उपाधि के वश पूर्व [ पश्चिम ] आदि
[ नाना ] संज्ञा को प्राप्त होती है ।
'आत्मा' का निरूपण—
आत्मत्व [ जाति ] के सम्बन्ध वाला आत्मा है । [ प्रत्येक व्यक्ति के ] सुख-
दुःखादि के वैचित्र्य होने से [ वह ] प्रत्येक शरीर में भिन्न भिन्न है । और उसका
वर्णन कर ही चुके हैं । उसके संख्या आदि पांच [ १ संख्या, २ परिमाण,
३ पृथक्त्व, ४ संयोग, ५ विभाग ] सामान्य गुण, और बुद्धि आदि नौ [ १ बुद्धि,
२ सुख, ३ दुःख, ४ इच्छा, ५ द्वेष, ६ प्रयत्न, ७ धर्म, ८ अधर्म, और ९ संस्कार]
विशेष गुण [ सब मिला कर १४ गुण ] हैं । नित्यत्व और विभुत्व पूर्ववत्
[ अर्थात् आकाश के समान ] है ।
'मन' का निरूपण—
मनस्त्व [ जाति ] के सम्बन्ध वाला मन अणु [ परिमाण वाला ] आत्म-
संयोगी और अन्तः इन्द्रिय है। सुखादि की उपलब्धि में कारण, नित्य, संख्या आदि
आठ [१ संख्या, २ परिमाण, ३ पृथक्त्व ४ संयोग, ५ विभाग, ६ परत्व, ७ अपरत्व,
८ संस्कार] गुणों से युक्त है । उसके संयोग से [ ही ] बाह्येन्द्रिय [अपने २] अर्थ
की ग्राहक होती है। इस लिए [ सब इन्द्रियों के अपने २ अर्थ के ग्रहण में
सहायक होने से ] सब [ विषयों ] की उपलब्धि का साधन है। वह प्रत्यक्ष
नहीं अपितु अनुमानगम्य है । जैसे कि [ अनुमान वाक्य का प्रयोग इस प्रकार
है ] सुखादि का ज्ञान चक्षु आदि से अतिरिक्त करण से साध्य है चक्षु आदि के
[ व्यापार के अथवा इन्द्रियों के ] न होने पर भी [ सुखादि के ] उत्पन्न होने से ।

गुणाः ] प्रमेयनिरूपणम् १६१
असत्स्वपि चक्षुरादिषु जायमानत्वात् । यद्वस्तु यद्विनैवोत्पद्यते तत्
तदतिरिक्तकरणसाध्यं, यथा कुठारं विनोत्पद्यमाना पचनक्रिया तद्-
तिरिक्तवह्न्यादिकरणसाध्या । यच्च करणं तन्मनः तच्च चक्षुराद्यतिरिक्तम् ।
तच्चाणुपरिमाणम् ।
द्रव्याण्युक्तानि ।
गुणाः
अथ गुणा उच्यन्ते । सामान्यवान् असमवायिकारणं स्पन्दात्मा
गुणः । स च द्रव्याश्रित एव । रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-संख्या-परिमाण-
पृथक्त्व-संयोग-विभाग-परत्व-अपरत्व-गुरुत्व-द्रवत्व-स्नेह-शब्द-बुद्धि-सुख-
दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्म-अधर्म-संस्कार-भेदाच्चतुर्विंशतिधा ।
१–तत्र रूपं चक्षुर्मात्रग्राह्यो विशेषगुणः । पृथिव्यादित्रयवृत्ति । तच्च
जो वस्तु जिस के बिना ही उत्पन्न होती है वह उससे भिन्न करण से उत्पन्न
होती है जैसे कुठार के बिना उत्पन्न होने वाली पचन क्रिया उससे भिन्न वह्नि
आदि करण से साध्य होती है । जो [ उसका ] करण है वह मन है और वह
चक्षु आदि [ बाह्येन्द्रियों ] से भिन्न है । और वह अणु परिमाण वाला है ।
द्रव्यों का वर्णन हो गया । [ इन नौ द्रव्यों में से किस में कितने गुण
रहते हैं । उसका संग्रह निम्न प्रकार किया है । ]
वायोर्नवैकादश तेजसो गुणा,-
जलक्षितिप्राणभृतां चतुर्दश ॥
दिक्कालयोः पञ्च षडेव चाम्बरे,
महेश्वरेऽष्टौ मनसस्तथैव च ॥
गुण-निरूपण—
अब गुणों का वर्णन करते हैं । सामान्यवान्, असमवायिकारण, कर्मभिन्न
गुण है । [ यह गुण का लक्षण है ] । और वह [गुण] द्रव्याश्रित ही [ रहता ]
है । १ रूप, २ रस, ३ गन्ध, ४ स्पर्श, ५ संख्या, ६ परिमाण, ७ पृथक्त्व,
८ संयोग, ९ विभाग, १० परत्व, ११ अपरत्व, १२ गुरुत्व, १३ द्रवत्व, १४
स्नेह, १५ शब्द, १६ बुद्धि, १७ सुख, १८ दुःख, १९ इच्छा, २० द्वेष, २१
प्रयत्न, २२ धर्म, २३ अधर्म और २४ संस्कार भेद से चौबीस प्रकार के हैं ।
१–रूप-निरूपण—
उनमें से चक्षुर्मात्रग्राह्य विशेष गुण 'रूप' है । [ संख्या, परिमाण आदि में
अतिव्याप्ति-वारण के लिए 'मात्र' तथा 'विशेष' पद का प्रयोग किया है । वह
१ न्याय-सिद्धान्त-मुक्तावली ।

१६२ तर्कभाषा [ रूप-रस-गन्ध-स्पर्शाः
शुक्लाद्यनेकप्रकारकम्। पाकजञ्च पृथिव्याम्। तच्चाऽनित्यं पृथिवीमात्रे।
आप्यतैजसपरमाण्वोर्नित्यम्। आप्यतैजसकार्येष्वनित्यम्। शुक्लभास्वर-
मपाकजं तेजसि। तदेवाभास्वरमप्सु।
२-रसो रसनेन्द्रियग्राह्यो विशेषगुणः पृथिवीजलवृत्तिः। तत्र पृथिव्यां
मधुरादिषट्प्रकारो मधुर-अम्ल-लवण-कटु-कषाय-तिक्त-भेदात्, पाकजश्च
अप्सु मधुरोऽपाकजो नित्योऽनित्यश्च। नित्यः परमाणुभूतास्वप्सु
कार्यभूतास्वनित्यः।
३-गन्धो घ्राणग्राह्यो विशेषगुणः। पृथिवीमात्रवृत्तिः। अनित्य एव।
स द्विविधः सुरभिरसुरभिश्च। जलादौ गन्धप्रतिभानं तु संयुक्तसमवायेन
द्रष्टव्यम्।
सामान्य गुण हैं और उनका ग्रहण केवल चक्षु से नहीं अपितु चक्षु और त्वक्
दोनों से होता है। अतः मात्र पद तथा विशेष पद जोड़ देने से उसमें अतिव्याप्ति .
नहीं होती।] पृथिवी आदि [१ पृथिवी, २ जल, ३ तेज] तीन में रहनेवाला
और वह शुक्ल आदि [१ शुक्ल, २ लोहित, ३ पीत, ४ कृष्ण, ५ हरित,
६ कपिश और ७ चित्र भेद से सात] अनेक प्रकार का है। पृथिवी में पाकज
है। और वह पृथिवी मात्र में अनित्य और आप्य तथा तैजस परमाणुओं में
नित्य एवं आप्य तथा तैजस कार्यों में अनित्य होता है। तेज में भास्वर शुक्ल
और अपाकज तथा वही [रूप] जल में अभास्वर शुक्ल [और अपाकज]
होता है।
२-रस-निरूपण-
रसना इन्द्रिय से ग्राह्य विशेष गुण 'रस' है। पृथिवी और जल में रहता
है। उसमें से पृथिवी में मधुर आदि छः प्रकार का, १ मधुर, २ अम्ल, ३ लवण,
४ कटु, ५ कषाय, ६ तिक्त, भेद से [६ प्रकार का] और पाकज है। जल में
मधुर अपाकज होता है। [वह] नित्य और अनित्य [दो प्रकार का] है।
परमाणु रूप जल में नित्य, और कार्य भूत [जल] में अनित्य होता है।
३-गन्ध-निरूपण-
घ्राणेन्द्रिय-ग्राह्य विशेष गुण 'गन्ध' है [जो] केवल पृथिवी में रहता है।
और अनित्य ही है। वह सुगन्ध और दुर्गन्ध दो प्रकार का होता है। जल
आदि में [होने वाली] गन्ध की प्रतीति संयुक्त समवाय [जल में संयुक्त
पार्थिव अंश में समवाय सम्बन्ध से रहने वाली गन्ध का जल में भान संयुक्त
समवाय] से समझना चाहिए। [उस गन्ध को जलका गुण न मानना चाहिए]।

स्पर्श-संख्यागुणौ ] प्रमेयनिरूपणम् १६३
४-स्पर्शस्त्वगिन्द्रियग्राह्यो विशेषगुणः। पृथिव्यादिचतुष्टयवृत्तिः।
स च त्रिविधः शीत-उष्ण-अनुष्णाशीतभेदात्। शीतः पयसि, उष्णस्तेज-
सि, अनुष्णाशीतः पृथिवीवाय्वोः। पृथिवीमात्रे ह्यनित्यः। आप्य-तैजस-
वायवीयपरमाणुषु नित्यः, आप्यादिकार्येष्वनित्यः। एते च रूपादयश्च-
त्वारो महत्त्वैकार्थसमवेतत्वे सत्युद्भूता एव प्रत्यक्षाः।
५-संख्या एकत्वादिव्यवहारहेतुः सामान्यगुणः। एकत्वादिपरार्द्ध-
पर्यन्ता। तत्रैकत्वं द्विविधं नित्यानित्यभेदात्। नित्यगतं नित्यमनि-
त्यगतमनित्यम्। स्वाश्रयसमवायिकारणगतैकत्वजन्यञ्च। द्वित्वञ्चानित्य-
४-स्पर्श-निरूपण—
त्वगिन्द्रिय से, ग्राह्य विशेष गुण 'स्पर्श' है। पृथिवी आदि चार [१ पृथिवी,
२ जल, ३ वायु ४ अग्नि] में रहता है। और वह १ शीत, २ उष्ण, ३ अनुष्णा-
शीत, भेद से तीन प्रकार का है। शीत [स्पर्श] जल में, उष्ण [स्पर्श] अग्नि
में, और अनुष्णाशीत [स्पर्श] पृथिवी तथा वायु में [रहता] है। पृथिवी मात्र
में अनित्य होता है। जल, वायु और तेज के परमाणुओं में नित्य तथा जल आदि
कार्यों में अनित्य है। यह रूपादि चारो [गुण], महत् [परिमाण] के साथ
एक अर्थ में समवेत और उद्भूत होने पर ही प्रत्यक्ष होते हैं। [अन्यथा नहीं
जैसे परमाणु तथा द्व्यणुक में महत् परिमाण न होने से उनमें रहने वाले रूपादि
गुणों का प्रत्यक्ष नहीं होता है। और उष्ण जल में अग्नि के भास्वर शुक्ल रूप के
'उद्भूत' न होने से उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है। इसलिए रूपादि चारों गुणों के
प्रत्यक्ष होने के लिए उनका 'उद्भूत' होना और महत्परिमाण वाले द्रव्य में
समवेत होना यह दोनों बातें आवश्यक हैं]।
५-संख्या-निरूपण
५-एकत्वादि व्यवहार का हेतुभूत सामान्य गुण 'संख्या' [कहलाता] है।
वह एकत्व से लेकर परार्द्ध [शंख, दश शंख, महा शंख से भी आगे की संख्या]
पर्यन्त [होती] है। उनमें से नित्य और अनित्य के भेद से 'एकत्व' दो प्रकार
का होता है। नित्य [आकाशादि] में रहने वाला [एकत्व] नित्य, और
अनित्य [घटादि] में रहने वाला [एकत्व] अनित्य होता है। [अनित्य एकत्व]
अपने आश्रय [घटादि] के समवायिकारण [कपालादि] में रहने वाले एकत्व
से उत्पन्न होता है। और 'द्वित्व' तो [सर्वत्र] अनित्य ही होता है। और वह
दो पिण्डों [घटादि वस्तुओं] की, 'यह एक है' और 'यह एक है', इस [प्रकार
के ज्ञान, जिसको] 'अपेक्षा-बुद्धि' [कहते हैं] से उत्पन्न होता है। उस
१३ त० भा०

१६४ तर्कभाषा [ द्वित्वोत्पत्तिः
मेव। तच्च द्वयोः पिण्डयोः 'इदमेकम्' इत्यपेक्षाबुद्ध्या जन्यते ।
तत्र द्वौ पिण्डौ समवायिकारणे। पिण्डयोरेकत्वे असमवायिकारणे,
अपेक्षाबुद्धिर्निमित्तकारणम् । अपेक्षाबुद्धिनाशादेव द्वित्वविनाशः।
एवं त्रित्वायुत्पत्तिर्विज्ञेया ।
[ द्वित्व ] के दोनों पिण्ड 'समवायि-कारण' [ होते हैं ] दोनों पिण्डों में रहने वाले
एकत्व 'असमवायि-कारण' और 'अपेक्षा-बुद्धि' के विनाश से ही 'द्वित्व' का
विनाश होता है । इसी प्रकार त्रित्वादि की उत्पत्ति [ और विनाश ] भी समझनी
चाहिए ।
यहाँ द्वित्व की उत्पत्ति और विनाश की प्रक्रिया संक्षेप से दिखाई है ।
यह प्रक्रिया वैशेषिक दर्शन का एक मुख्य भाग है और प्रशस्तपाद भाष्य
आदि में बहुत विस्तार के साथ उसका विवेचन हुआ है। इसी से द्वित्व के
ज्ञान को वैशेषिक दर्शन के ज्ञान की कसौटी माना गया है—
'द्वित्वे च पाकजोत्पत्तौ विभागे च विभागजे ।
यस्य न स्खलिता बुद्धिस्तं वै वैशेषिकं विदुः ॥
प्रशस्तपाद में प्रदर्शित द्वित्वोत्पत्ति की प्रक्रिया में सात क्षण और उसके
विनाश की प्रक्रिया में नौ क्षण लगते हैं । द्वित्व की उत्पत्ति 'अपेक्षा-बुद्धि' से
और उसका विनाश 'अपेक्षा बुद्धि' के विनाश से होता है ।
द्वित्वोत्पत्ति की प्रक्रिया—
इसकी उत्पत्ति की प्रक्रिया का संग्रह एक श्लोक में इस प्रकार किया
गया है—
आदाविन्द्रियसन्निकर्षघटनादेकत्वसामान्यधी—
रैकत्वोभयगोचरा मतिरतो, द्वित्वं ततो जायते ।
द्वित्वत्वप्रमितिस्ततो नु, परतो द्वित्वप्रमाऽनन्तरं
द्वे द्रव्ये इति धीरियं निगदिता द्वित्वोदयप्रक्रिया ॥
अर्थात् प्रथम क्षण में इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष होता है । द्वितीय
क्षण में दोनों घटों में रहने वाले 'एकत्व-सामान्य' का ज्ञान होता है । तृतीय
क्षण में उन दोनों को ग्रहण करने वाली 'अयम् एकः अयम् एकः' इस प्रकार
की 'अपेक्षा-बुद्धि' उत्पन्न होती है । चतुर्थ क्षण में इस अपेक्षा-बुद्धि से द्वित्व
की उत्पत्ति होती है । पञ्चम में उस द्वित्व में रहने वाली 'द्वित्वत्व' जाति का
ग्रहण होता है । छठे क्षण में द्वित्व का ज्ञान होता है और सातवें क्षण में
१, २ सर्वदर्शनसंग्रह ।

द्वित्वविनाशप्रक्रिया ] प्रमेयनिरूपणम् १६५
द्वित्व से विशिष्ट 'द्वे द्रव्ये' इस प्रकार का द्रव्य ज्ञान होता है। इस प्रकार
द्वित्व की उत्पत्ति-प्रक्रिया में अर्थात् 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की उत्पत्ति में
सात क्षण लगते हैं।
द्वित्वविनाश की प्रक्रिया—
इसी प्रकार द्वित्व के नाश की प्रक्रिया में नौ क्षण लगते हैं। द्वित्व के
नाश का एक कारण तो 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश है और दूसरा कारण 'आश्रय
द्रव्य' का नाश भी है। उसमें 'अपेक्षा-बुद्धि' के नाश से 'द्वित्व' का नाश किस
प्रकार होता है इसका संग्रह तीन श्लोकों में इस प्रकार किया गया है—
आदावपेक्षाबुद्ध्या हि नश्येदेकत्वजातिधीः ।
द्वित्वोदयसमं पश्चात् सा च तज्जातिबुद्धितः ॥ १ ॥
द्वित्वाख्यगुणधीकाले ततो द्वित्वं निवर्तते ।
अपेक्षाबुद्धिनाशेन द्रव्यधीजन्मकालतः ॥ २ ॥
गुणबुद्धिर्द्रव्यबुद्ध्या संस्कारोत्पत्तिकालत: ।
द्रव्यबुद्धिश्च संस्कारादिति नाशक्रमो मतः ॥ ३ ॥
ज्ञान क्षणिक है इसलिए एक समय में दो ज्ञान 'अविनश्यत्-अवस्था' में
नहीं रह सकते हैं। और न दो ज्ञानों की एक साथ उत्पत्ति हो सकती है।
इसलिए उत्पत्ति की प्रक्रिया में इन्द्रिय-सन्निकर्ष से द्वितीय क्षण में 'एकत्व-
सामान्य' ज्ञान की उत्पत्ति, तृतीय क्षण में 'अपेक्षा-बुद्धि' की उत्पत्ति, और
चतुर्थ क्षण में 'अपेक्षा-बुद्धि' से द्वित्व की उत्पत्ति दिखलाई थी। जिस चतुर्थ
क्षण में 'द्वित्व' की उत्पत्ति होगी उसी समय 'अपेक्षा-बुद्धि' से 'एकत्व सामान्य-
ज्ञान' का नाश होगा। उसके बाद पञ्चम क्षण में 'द्वित्व सामान्य-ज्ञान' उत्पन्न
होता है। उस 'द्वित्व-सामान्य-ज्ञान' से 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश होता है
जो अगले अर्थात् षष्ठ क्षण में होता है। उस षष्ठक्षण में 'द्वित्व-
गुणबुद्धि' उत्पन्न होती है। इस प्रकार 'द्वित्वगुणबुद्धि' के उत्पन्न
होने के समय अर्थात् षष्ठ क्षण में 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश होता है।
और अगले सप्तम क्षण में जब कि 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान उत्पन्न होता है
उसके पूर्व 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश हो चुकने से द्वित्व का नाश और 'द्वे द्रव्ये'
इस बुद्धि की उत्पत्ति, दोनों एक साथ सप्तम क्षण में होती हैं। और उसके
बाद अष्टम क्षण में संस्कार से 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान का भी नाश हो जाता है।
किस किस क्षण में किस किस की उत्पत्ति और विनाश होता है इसको इस
प्रकार दिखाया जा सकता है।

१६६ तर्कभाषा [ द्वित्वविनाशप्रक्रिया
प्रथमक्षण में—इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष होता है ।
द्वितीयक्षण में—'एकत्व-सामान्य-ज्ञान' उत्पन्न होता है ।
तृतीयक्षण में—एकत्वोभयगोचरा मतिः, अर्थात् 'अयमेकः, अयमेकः' इस
प्रकार की 'अपेक्षा-बुद्धि' उत्पन्न होती है ।
चतुर्थ क्षण में—१ द्वित्वोत्पत्तिः । २ एकत्वसामान्यज्ञान का नाश ।
३ द्वित्वसामान्यज्ञान की उत्पद्यमानता यह तीनों बातें एक साथ होती हैं ।
पञ्चम क्षण में—१ द्वित्वसामान्य ज्ञान की उत्पत्ति । २ 'अपेक्षा-बुद्धि' की
विनश्यमानता ३ द्वित्वगुण-बुद्धि की उत्पद्यमानता ये तीनों बातें एक साथ होती हैं ।
षष्ठ क्षण में— १ द्वित्वगुणबुद्धि की उत्पत्ति । २ अपेक्षा-बुद्धि का नाश,
३ 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की उत्पद्यमानता ये तीनों बातें एक साथ होती हैं ।
सप्तम क्षण में—१ 'द्वे द्रव्ये' ज्ञान की उत्पत्ति । २ द्वित्व का विनाश ।
३ द्वित्वगुण बुद्धि की विनश्यमानता ये तीनों बातें एक साथ होती हैं ।
अष्टम क्षण में—१ संस्कार की उत्पत्ति । २ द्वित्वगुणबुद्धि का विनाश,
३ 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की विनश्यमानता ये तीनों बातें एक साथ होती हैं ।
नवम क्षण में—'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान का संस्कार से विनाश हो जाता है ।
इस प्रकार अपेक्षा बुद्धि के नाश से जहाँ द्वित्व का विनाश होता है उसकी
यह नौ क्षण की प्रक्रिया दिखाई है । इसके अतिरिक्त कहीं आश्रय-नाश से भी
द्वित्व का नाश होता है उस की क्षणानुसारिणी प्रक्रिया निम्न प्रकार है ।}
आश्रय के नाश से द्वित्वका नाश—
प्रथम क्षण में—१ एकत्वाधार घटादि के अवयवों में कर्म की उत्पत्ति होती
है । २ उसी समय एकत्व सामान्य ज्ञान की उत्पत्ति होती है ।
द्वितीय क्षण में—१ कर्म से अवयवों के विभाग की उत्पत्ति । २ और
उसी समय एकत्व सामान्य ज्ञान से 'अपेक्षा-बुद्धि' की उत्पत्ति होती है ।
तृतीय क्षण में—१ विभाग से द्रव्यारम्भक संयोग का नाश । २ और
उसी समय 'अपेक्षा-बुद्धि' से द्वित्व की उत्पत्ति होती है ।
चतुर्थ क्षण में—१ द्रव्यारम्भक संयोग के नाश से द्रव्य का नाश । २ और
उसी समय द्वित्व सामान्य ज्ञान की उत्पत्ति होती है ।
पञ्चम क्षण में—१ आश्रयद्रव्य के ज्ञान से द्वित्व का नाश । २ और
द्वित्वसामान्यज्ञान से 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश होता है ।
इस प्रक्रिया से पञ्चम क्षण में एक ओर आश्रय द्रव्य के नाश से

विरोधपरिहारः ] प्रमेयनिरूपणम् १६७
द्वित्व का नाश हो जाता है और दूसरी ओर उसी क्षण में द्वित्व सामान्य ज्ञान
से 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश होता है। इस स्थिति में 'अपेक्षा-बुद्धि' तथा 'द्वित्व'
दोनों का नाश एक ही क्षण में होने से उन दोनों में कार्य-कारण-भाव नहीं
कहा जा सकता है। अर्थात् वह द्वित्व का नाश 'अपेक्षा-बुद्धि' के नाश से
नहीं अपितु आश्रय द्रव्य के नाश से होता है। यह आश्रय-नाश से द्वित्व-
नाश की प्रक्रिया हुई :
'सहानवस्थान' विरोध पक्ष में दोष और उसका परिहार—
वैशेषिक दर्शन में इस उत्पत्ति और विनाश की प्रक्रिया के प्रसङ्ग में
'वध्यघातक भाव' और 'सहानवस्थान' रूप दो प्रकार के विरोधों का उल्लेख
किया गया है। और दोनों पक्षों में 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की उत्पत्ति नहीं बनेगी
यह दोष देकर उसका समाधान करने का प्रयत्न किया गया है। 'सहानव-
स्थान' विरोध में विनाशक सामग्री की उत्पत्ति के क्षण में ही विनाश्य पदार्थ
का विनाश हो जाता है इसलिए द्वित्वगुणबुद्धि की उत्पत्ति के क्षण अर्थात्
छठे क्षण में द्वित्वगुणबुद्धि के उत्पन्न होते ही 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश उसी
क्षण में हो जाने से उसी समय द्वित्व का नाश हो जायगा। अतः जब छठे
क्षण में द्वित्व का नाश हो गया तब सातवें क्षण में द्वित्वगुण-विशिष्ट द्रव्य
अर्थात् 'द्वे द्रव्ये' इस प्रकार का ज्ञान कैसे उत्पन्न होगा। यह प्रश्न उत्पन्न
होता है। उसका समाधान 'आशूत्पत्ति' मान कर किया है। समाधान का
आशय यह है कि जैसे 'शब्दवदाकाशम्' यह विशिष्ट ज्ञान जब तक उत्पन्न
होता है उसके पूर्व ही क्षणिक शब्द का नाश हो चुकता है। परन्तु शब्द
का नाश हो जाने पर भी उसका ज्ञान बुद्धि में रहता है और उस ज्ञान के
कारण अत्यन्त शीघ्रता से शब्द-विशिष्ट आकाश का ज्ञान 'शब्दवदाकाशम्'
इस रूप में जैसे बन जाता है इसी प्रकार छठे क्षण में द्वित्व का नाश हो जाने
पर भी 'आशूत्पत्ति' के कारण 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान बन सकता है। इस प्रकार
'सहानवस्थान' पक्ष में आए हुए दोष का समाधान किया गया है।
विरोध का दूसरा भेद 'वध्य-घातक-भाव' है। इस 'वध्य-घातक-भाव'
विरोध में पहिले क्षण में घातक उत्पन्न होता है और अगले क्षण में 'वध्य' का
वध अर्थात् विनाश होता है। अर्थात् 'घातक' की उत्पत्ति के एक क्षण बाद
'वध्य' का नाश होता है। पूर्वपक्ष की ओर से यह शङ्का होती है कि इस
'वध्य-घातक विरोध' में भी 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान नहीं उत्पन्न हो सकेगा क्योंकि
तृतीयक्षण में 'अपेक्षा-बुद्धि' उत्पन्न होती है उससे चतुर्थ क्षण में संस्कार से
पञ्चम क्षण में 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश और उसके बाद छठे क्षण में द्वित्व का

१६८ तर्कभाषा [ परिमाणगुणः
६-परिमाणं मानव्यवहारासाधारणं कारणम् । तच्चतुर्विधम्, अणु,
महद्, दीर्घं, ह्रस्वञ्चेति । तत्र कार्यगतं परिमाणं संख्या-परिमाण-प्रचय-
योनि । तद्यथा द्वयणुकपरिमाणमीश्वरापेक्षाबुद्धिजन्यपरमाणुद्वित्वज-
नित्वात् संख्यायोनि, संख्याकारणकमित्यर्थः । त्र्यणुकपरिमाणञ्च
स्वाश्रयसमवायिकारणगतबहुत्वसंख्यायोनि । चतुरणुकादिपरिमाणन्तु
स्वाश्रयसमवायिकारणपरिमाणजन्यम् । तूलपिण्डपरिमाणन्तु स्वाश्रय-
नाश हो जायगा तब सप्तम क्षण में द्वित्व के न होने से 'द्वे द्रव्ये' यह
ज्ञान कैसे होगा ? यह शङ्का का आशय है । इसका उत्तर यह है कि 'अपेक्षा-
बुद्धि' से संस्कार नहीं बनता है । क्योंकि 'अपेक्षा-बुद्धि' समूहालम्बनात्मक
ज्ञान नहीं है । संस्कार केवल समूहालम्बनात्मक ज्ञान से उत्पन्न होता है ।
अतः 'अपेक्षा-बुद्धि' से संस्कार के उत्पन्न न होने से 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश
संस्कार से नहीं अपितु पञ्चम क्षण में उत्पन्न होने वाले 'द्वित्वसामान्यज्ञान' से
ही होता है । इसलिए 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश षष्ठ क्षण में और उससे द्वित्व
का नाश सप्तम क्षण में होता है । उसी के साथ 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान उत्पन्न हो
जाता है । अतएव उसमें कोई बाधा नहीं है ।
६-परिमाण-निरूपण—
मानव्यवहार का असाधारण कारण 'परिमाण' है । वह १ अणु, २
महद्, ३ दीर्घ और ४ ह्रस्व, भेद से चार प्रकार का है । कार्यगत चारो प्रकार
का [ परिमाण प्रकारान्तर से ] १ संख्यायोनि, २ परिमाणयोनि और ३ प्रचय-
योनि [ तीन प्रकार का ] होता है । जैसे द्वयणुक का [ जन्य ] अणु परिमाण
[ संख्यायोनि अर्थात् संख्याकारणक है क्योंकि वह ] ईश्वर की 'अपेक्षा-बुद्धि'
से जन्य परमाणुगत द्वित्व [ संख्या ] से जन्य होने के कारण 'संख्या-योनि'
अर्थात् संख्याकारणक है । और त्र्यणुक का [ महत् ] परिमाण अपने [ अर्थात्
त्र्यणुकगत परिमाण के ] आश्रय [ अर्थात् त्र्यणुक ] के समवायिकारण [ अर्थात्
द्वयणुक ] गत बहुत्व [ संख्याजन्य होने से ] 'संख्या-योनि' है । चतुरणुक आदि
का परिमाण तो अपने परिमाण के ] आश्रय [ चतुरणुक आदि ] के समवायि
कारण [ त्र्यणुक आदि ] के परिमाण से उत्पन्न होता है [ अत एव वह चतुरणुकादि
का परिमाण 'परिमाण-योनि' परिमाण है] । रूई के पिण्ड का परिमाण तो अपने
आश्रय [ तूल-पिण्ड ] के समवायिकारण रूप अवयवों के प्रशिथिल संयोगसे जन्य
है । [इसलिए वह रूई के पिण्ड का परिमाण 'प्रचय-योनि' कहलाता है। प्रचय का

परिमाणगुणः ] प्रमेयनिरूपणम् १६६
समवायिकारणावयवानां प्रशिथिलसंयोगजन्यम् । परमाणुपरिमाण-
ञ्चाकाशादिगतं नित्यमेव ।
अर्थ शिथिल-अवयव-संयोग है ] परमाणु का परिमाण [ जो कि 'पारिमा-
ण्डल्य' नाम से भी कहा जाता है ] और आकाशादि का 'परममहत्' परिमाण
नित्य ही होता है ।
अणु परिमाण केवल दो जगह रहता है एक परमाणु में और दूसरा
द्व्यणुक में । इनमें से परमाणुगत अणु परिमाण नित्य ही होता है और
उसका दूसरा नाम 'पारिमाण्डल्य' भी है। 'पारिमाण्डल्यभिन्नानां कारणत्व-
मुदाहृतम्' इत्यादि में 'पारिमाण्डल्य' शब्द से परमाणु के नित्य अणु परिमाण
का ही ग्रहण होता है। द्व्यणुक में भी अणु परिमाण रहता है। परमाणु
का अथवा द्व्यणुक का अणु परिमाण किसी परिमाण का आरम्भक या
कारण नहीं होता है। क्योंकि परिमाण के विषय में यह नियम है कि परिमाण
'स्वसमानजातीय उत्कृष्ट परिमाण' का आरम्भक होता है। जैसे तन्तु का
महत् परिमाण है। उससे जो पट का परिमाण उत्पन्न होता है। वह तन्तु के
परिमाण की अपेक्षा उत्कृष्ट अर्थात् 'महत्तर' परिमाण है। तन्तु के महत् परिमाण
से उसके समानजातीय और उत्कृष्ट अर्थात् 'महत्तर' परिमाण की उत्पत्ति होती
है। इसी प्रकार यदि परमाणु के अणु परिमाण को द्व्यणुक के परिमाण का
कारण माना जाय तो वह अणु परिमाण द्व्यणुक में अपने समानजातीय
उत्कृष्ट अर्थात् 'अणुतर' परिमाण को उत्पन्न करने लगेगा। परन्तु अणु परिमाण
तो कहते ही उसको हैं जिसके आगे और 'अणुतर' कोई न हो। इसलिए अणु
परिमाण को द्व्यणुक के परिमाण का कारण मानना युक्ति-सङ्गत नहीं है।
इसीलिए द्व्यणुक के अणु परिमाण को 'संख्यायोनि' परिमाण माना है। अर्थात्
दो परमाणुओं में रहने वाली द्वित्व संख्या से द्व्यणुक का अणु परिमाण उत्पन्न
होता है। द्वित्व संख्या भी अनित्य और 'अपेक्षा-बुद्धि' से जन्य है। परन्तु
परमाणुओं के विषय में अस्मदादि की 'अपेक्षा-बुद्धि' काम नहीं दे सकती है
क्योंकि परमाणु अस्मदादि के अनुभव के विषय नहीं हैं। इसलिए परमाणुओं में
जो द्वित्व संख्या उत्पन्न होती है वह ईश्वर की 'अपेक्षा-बुद्धि' से उत्पन्न होती
है। और उस द्वित्व संख्या से द्व्यणुक में 'संख्यायोनि' अणु परिमाण
उत्पन्न होता है।
इसी प्रकार त्र्यणुक का 'महत् परिमाण' भी 'संख्यायोनि' परिमाण माना
गया है। क्योंकि वह 'परिमाणयोनि' अथवा 'प्रचययोनि' नहीं हो सकता है,

२०० तर्कभाषा [ पृथक्त्वगुणः
७-पृथक्त्वम् पृथग्व्यवहारासाधारणं कारणम् । तच्च द्विविधम् ।
एकपृथक्त्वं द्विपृथक्त्वादिकञ्च । तत्राद्यं नित्यगतं नित्यमनित्यगतमनित्यम् ।
द्विपृथक्त्वादिकञ्चानित्यमेव ।
त्र्यणुक के परिमाण को यदि 'संख्यायोनि' परिमाण मानें तो उसे 'परिमाण-
योनि' परिमाण मानना होगा । अर्थात् उसकी उत्पत्ति द्वयणुक के अणु
परिमाण से माननी होगी । परन्तु अभी दिखा चुके हैं कि परिमाण के 'स्वस-
मानजातीय उत्कृष्ट परिमाण के आरम्भक' होने का नियम होने से द्वयणुक का
अणु परिमाण यदि त्र्यणुक में किसी परिमाण को उत्पन्न कर सकता है तो
केवल 'स्वसमानजातीय उत्कृष्ट' अर्थात् 'अणुतर' परिमाण को ही उत्पन्न कर
सकता है परन्तु 'अणुतर' परिमाण की उत्पत्ति सम्भव नहीं है। और त्र्यणुक
में महत् परिमाण रहता है । इसलिए त्र्यणुक का 'महत्' परिमाण 'परिमाण-
योनि' नहीं अपितु द्वयणुकनिष्ठ बहुत्व-संख्याजन्य होने से 'संख्यायोनि'
परिमाण है । शेष जन्य महत् परिमाण 'परिमाणयोनि' परिमाण होते हैं। जन्य
महत् परिमाण के अतिरिक्त नित्य महत् परिमाण भी होता है जिसे 'परम
महत्' परिमाण कहते हैं और वह आकाशादि विभु पदार्थों में रहता है।
यहाँ 'अणु' और 'महत्' दो प्रकार के परिमाणों का वर्णन किया है और
उन दोनों के नित्य तथा अनित्य दो दो भेद किए हैं। इनके अतिरिक्त 'दीर्घ'
और 'ह्रस्व' यह दो परिमाण और भी दिखाए हैं। यह 'दीर्घ' और 'ह्रस्व'
परिमाण जन्य 'महत्' तथा 'अणु' परिमाण के साथ ही रहते हैं। अर्थात्
जहाँ जन्य 'अणु' परिमाण रहता वहाँ 'ह्रस्व' और जहाँ जन्य 'महत्' परिमाण
रहता है वहाँ 'दीर्घ' व्यवहार होने से यह दोनों परिमाण अलग कोई विशेष
महत्त्व नहीं रखते हैं। इसी से उनका विशेष वर्णन यहाँ नहीं किया गया है
केवल नाम गिना दिए हैं।
७ पृथक्त्व-निरूपण—
पृथक् व्यवहार का असाधारण कारण 'पृथक्त्व' [ गुण कहलाता ] है ।
वह दो प्रकार का है 'एक-पृथक्त्व' और 'द्विपृथक्त्व' आदि । उनमें से पहिला
[ एकपृथक्त्व ] नित्य [ परमाणु आदि ] में रहने वाला नित्य और अनित्य
[ घटादि में ] रहनेवाला अनित्य होता है । द्विपृथक्त्वादि अनित्य ही होता है ।
संख्या के प्रकरण में एकत्व, द्वित्व का वर्णन हुआ था। वहाँ एकत्व, द्वित्वत्व
जाति थीं परन्तु यहाँ 'एकपृथक्त्व' और 'द्विपृथक्त्व' आदि जातियां नहीं है ।
उनका भेद केवल संख्या के सम्बन्ध से होता है। इसी से प्रशस्तपाद भाष्य
में लिखा है—

संयोगगुणः ] प्रमेय‌निरूपणम् २०१
८-संयोगः संयुक्तव्यवहारहेतुर्गुणः । स च द्व्याश्रयोऽव्याप्यवृत्तिश्च ।
स च त्रिविधः । अन्यतरकर्मजः, उभयकर्मजः, संयोगजश्चेति ।
तत्रान्यतरकर्मजो यथा क्रियावता श्येनेन सह निष्क्रियस्य स्थाणोः
संयोगः । अस्य हि श्येनक्रिया असमवायिकारणम् । उभयकर्मजो यथा
सक्रिययोर्मल्लयोः संयोगः । संयोगजो यथा कारणाकारणसंयोगात्
कार्याकार्यसंयोगः । यथा हस्ततरुसंयोगेन कायतरुसंयोगः ।
१एतावांस्तु विशेषः । एकत्वादिवदेकपृथक्त्वादिष्वपरसामान्याभावः संख्यया
तु विशिष्यते । तद्विशिष्टव्यवहारदर्शनादिति ।
८ संयोग-निरूपण—
[ यह इससे संयुक्त है इस प्रकार के ] संयुक्त व्यवहार का हेतु-भूत गुण
'संयोग' है । वह द्विष्ट [ दो पदार्थों में रहने वाला ] और अव्याप्यवृत्ति [ रूपादि
के समान सारे पदार्थ में व्याप्त न होकर उसके केवल एक देश में रहनेवाला ]
होता है । और वह [ प्रकारान्तर से ] तीन प्रकार का होता है १ अन्यतरकर्मज,
२ उभयकर्मज, और ३ संयोगज-संयोग । उनमें अन्यतर-कर्मज [ अर्थात् संयुक्त
होने वाले दोनों पदार्थों में से किसी एक के कर्म से उत्पन्न हुए संयोग का
उदाहरण ] जैसे क्रियावान् [ अर्थात् उड़कर आए हुए श्येन ] बाज के साथ
निष्क्रिय स्थाणु [ वृक्ष के ठूंठ ] का संयोग । इस [ स्थाणु तथा श्येन के संयोग
का समवायिकारण तो वह दोनों ही हैं परन्तु इस ] का असमवायिकारण श्येन
की क्रिया है । उभयकर्मज [ संयोग का उदाहरण ] जैसे सक्रिय दो पहलवानों का
संयोग [ दोनों पहलवान इधर उधर से आकर भिड़ जाते हैं इसलिए उनका संयोग
दोनों के कर्म से होने के कारण 'उभयकर्मज' संयोग है ] संयोगज संयोग का
उदाहरण ] जैसे [ शरीर के ] कारण [ अवयव रूप हाथ ] और [ उस शरीर
के ] अकारण [ रूप वृक्ष ] के संयोग से [ हाथ के ] कार्य [ भूत शरीर ] और
अकार्य [ भूत वृक्ष ] का संयोग । जैसे हाथ और वृक्ष का संयोग होने से शरीर
का वृक्ष के साथ संयोग [ होता है वह संयोगज संयोग का उदाहरण है ] ।
इस प्रकार संयोग के तीन भेद किए । यह तीनों प्रकार का संयोग जन्य
है । अर्थात् नित्य संयोग नहीं होता है । परिमाण आदि तो नित्य में रहने वाले
नित्य भी होते हैं परन्तु संयोग नित्य पदार्थों का भी अनित्य ही होता है । जैसे
नित्य परमाणु का नित्य आकाश आदि के साथ संयोग है । परन्तु वह नित्य
१ वैशेषिक प्रशस्तपाद भाष्य ।

२०२ तर्कभाषा [ विभागगुणः
६-विभागोऽपि विभक्तप्रत्ययहेतुः । संयोगपूर्वको द्व्याश्रयः । स च
त्रिविधोऽन्यतरकर्मजः, उभयकर्मजो विभागजश्चेति । तत्र प्रथमो यथा
श्येनक्रियया शैलश्येनयोर्विभागः । द्वितीयो यथा मल्लयोर्विभागः ।
तृतीयो यथा हस्ततरुविभागात् कायतरुविभागः !
द्वित्वे च पाकजोत्पत्तौ विभागे च विभागजे ।
यस्य न स्खलिता बुद्धिस्तं वै वैशेषिकं विदुः ॥
नहीं अपितु 'अन्यतरकर्मज' है। परमाणु में गति होती है। वह एक स्थान से
दूसरे स्थान पर जा कर उस देश के आकाश से मिलता है इसलिए इनका
संयोग 'अन्यतरकर्मज' संयोग होता है। नित्य संयोग नहीं । अब प्रश्न रह
जाता है आकाश और काल आदि नित्य तथा विभु पदार्थों के संयोग का । सो
उसके विषय में वैशेषिक दर्शन का सिद्धान्त यह है कि नित्य और विभु पदार्थों
का परस्पर संयोग होता ही नहीं है। क्योंकि संयोग सम्बन्ध 'युत सिद्ध-पृथक्'
पृथक् पदार्थों का ही होता है। 'युत-सिद्धि' का अर्थ यह है कि उन दोनों
पदार्थों में से दोनों अथवा कोई एक पृथक् गतिमान् हो । नित्य और विभु
पदार्थों में से किसी में भी पृथग्गतिमत्त्व नहीं रहता है, इसलिए उनका संयोग
होता ही नहीं है। इस विषय में वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में
लिखा है—
नोऽन्त्यजः संयोगः । १••••••परमाणुभिराकाशादीनां प्रदेशवृत्तिरन्यतरकर्मजः
संयोगः विभूनां तु परस्परतः संयोगो नास्ति युतसिद्धयभावात् । सा पुनर्द्वयोर-
न्यतरस्य वा पृथग्गतिमत्त्वम्, पृथगाश्रयाश्रयित्वञ्चेति ।
संयोग के विनाश के दो कारण होते हैं या तो जिन का संयोग है उनमें ही
विभाग गुण उत्पन्न हो जाय तो पूर्व संयोग का नाश हो जाता है। अथवा
आश्रय के नाश से भी संयोग का नाश हो जाता है।
९ विभाग-निरूपण—
विभक्त प्रतीति का हेतु [ भूत गुण ] 'विभाग' है। वह संयोगपूर्वक और
दो में आश्रित रहने वाला है। और वह [ भी ] तीन प्रकार का है। १ अन्यतर-
कर्मज, २ उभयकर्मज, और ३ विभागजविभाग। उनमें प्रथम [ अर्थात् अन्यतर-
कर्मज विभाग का उदाहरण ] जैसे श्येन की [ उड़ जाने की ] क्रिया से श्येन
और पर्वत का विभाग । दूसरा [ उभयकर्मज विभाग का उदाहरण ] जैसे दो
पहलवानों का विभाग, तीसरा [ विभागज विभाग ] जैसे हाथ और वृक्ष के विभाग
से शरीर और वृक्ष का विभाग ।
१ सर्वदर्शनसंग्रह वै० द० । २ प्रशस्तपाद भाष्य संयोग प्र० ।

परत्वापरत्वगुणौ ] प्रमेयनिरूपणम् २०३
१०-११-परत्वापरपरत्वे परापरव्यवहारासाधारणकारणे। ते तु द्विविधे
दिक्कृते कालकृते च । तत्र दिक्कृतयोरुत्पत्तिः कथ्यते । एकस्यां
दिश्यवस्थितयोः पिण्डयोरिदमस्मात् सन्निकृष्टमिति बुद्ध्याऽनुगृहीतेन
'संयोगज-संयोग' और 'विभागज-विभाग' की व्याख्या करते समय 'कार-
णाकारणसंयोगात् कार्याकार्यसंयोगः' । और 'कारणाकारणविभागात् कार्याकार्य-
विभागः' । इस प्रकार की व्याख्या की गई है । इस पर शङ्का यह हो सकती
है कि यदि हस्त-तरु-संयोग से भिन्न काय-तरु-संयोग को माना जाय अथवा
हस्ततरु-विभाग से भिन्न कायतरु-विभाग को माना जाय तो हाथ और शरीर
जो अवयव और अवयवी होने से 'अयुत-सिद्ध' हैं उनमें 'युत-सिद्धि' प्राप्त होने
लगेगी । उन दोनों के 'अयुत-सिद्ध' होने से हाथ का तरु के साथ जो विभाग है
उसी को शरीर के साथ विभाग मानना चाहिए । इसी प्रकार हाथ का वृक्ष के
साथ जो संयोग है उसको ही शरीर और वृक्ष का संयोग मानना चाहिए ।
अन्यथा हस्त और शरीर का 'अयुतसिद्धत्व' नहीं बनेगा । इसलिए 'संयोगज-
संयोग' अथवा 'विभागज-विभाग' मानना उचित नहीं है ।
इसका उत्तर यह दिया गया है कि 'युत-सिद्धि' का लक्षण पहले किया जा
चुका है । 'सा पुनर्द्वयोरन्यतरस्य वा पृथग्गतिमत्त्वं युतेषु आश्रयेष्वाश्रयित्वं वा' ।
अर्थात् दोनों में किसी एक की पृथग्गतिमत्ता अथवा भिन्न-भिन्न आश्रयों में रहने
को ही 'युत-सिद्धि' कहते हैं । इनमें से पहिला लक्षण नित्य पदार्थों में और
दूसरा लक्षण अनित्य पदार्थों में पाया जाता है । इस प्रकार की 'युत-सिद्धि'
हस्त और देहादि में नहीं घट सकती है । इसलिए यह दोष नहीं है ।
ऊपर पृथक्त्व और विभाग दो गुण माने गए हैं । इनमें से विभाग
क्षणिक और अस्थिर है । पृथक्त्व स्थिर । जिस पदार्थ का दूसरे
से विभाग होता है उस विभक्त पदार्थ का पूर्वसंयोग-नाश और उत्तर देश-
संयोग हो जाने के बाद विभाग नष्ट हो जाता है । विभाग की सीमा उत्तरदेश- .
संयोग के साथ समाप्त हो जाती है और उसके बाद पृथक्त्व की सीमा प्रारम्भ
होती है । अर्थात् जहाँ पहुँच कर विभाग समाप्त हो जाता है वहाँ से पृथक्त्व
प्रारम्भ होता है ।
१०-११ परत्व और अपरत्व का निरूपण—
'पर' और 'अपर' व्यवहार के असाधारण कारण [ क्रमशः ] 'परत्व' और
'अपरत्व' [ नामक गुण ] हैं । वे [ दोनों ] दो प्रकार के होते हैं दिक्कृत और
कालकृत [ परत्व तथा अपरत्व ] । दिक्कृत [ परत्व और अपरत्व ] की उत्पत्ति
कहते हैं । एक दिशा में रखे हुए दो पिण्डों में यह इसकी अपेक्षा समीप है इस

दिक्पिण्डसंयोगेनापरत्वं सन्निकृष्टे जन्यते । विप्रकृष्टबुद्ध्या तु परत्वं
विप्रकृष्टे जन्यते । सन्निकर्षस्तु पिण्डस्य द्रष्टुः शरीरापेक्षया संयुक्तसंयोगा-
ल्पीयस्त्वम् । तद्भूयस्त्वं विप्रकर्ष इति ।
कालकृतयोस्तु परत्वापरत्वयोरुत्पत्तिः कथ्यते । अनियतदिगव-
स्थितयोर्युवस्थविरपिण्डयोः 'अयमस्मादल्पतरकालसम्बद्धः' इत्यपेक्षाबु-
द्ध्यानुगृहीतेन कालपिण्डसंयोगेनासमवायिकारणेन यूनि, अपरत्वम् ।
'अयमस्माद् बहुतरकालेन सम्बद्धः' इति धिया स्थविरे परत्वम् ।
१२ गुरुत्वमाद्यपतनासमवायिकारणम् । पृथिवीजलवृत्ति । यथोक्तं-
ज्ञान से सहकृत दिक् और पिण्ड के संयोग से सन्निकृष्ट [पिण्ड] में 'अपरत्व'
उत्पन्न होता है । सन्निकर्ष [का अर्थ] तो देखने वाले के शरीर की अपेक्षा
से पिण्ड से संयुक्त [दिक्] के संयोग का न्यूनत्व है । और उस [संयुक्त संयोग]
का भूयस्त्व [आधिक्य का नाम] विप्रकर्ष है ।
कालकृत 'परत्व' और 'अपरत्व' की उत्पत्ति [का प्रकार] कहते हैं ।
अनियत दिशा में स्थित [दिक्-कृत में 'एकस्यां दिश्यवस्थितयोः पिण्डयोः' कहा
था उसके विपरीत यहां कालकृत में अनियत दिशा में स्थित कहा है] युवक
तथा वृद्ध [पुरुष] में यह [युवक] इस [वृद्ध] की अपेक्षा अल्पतर काल-
सम्बद्ध है इस 'अपेक्षा-बुद्धि' से अनुगृहीत काल और पिण्ड के संयोग रूप असम-
वायिकारण से युवक में 'अपरत्व' उत्पन्न होता है, और यह [वृद्ध] इस [युवक]
की अपेक्षा अधिकतर कालसम्बद्ध है इस 'अपेक्षा-बुद्धि' [से अनुगृहीत काल
पिण्ड संयोग] से वृद्ध पुरुष में 'परत्व' उत्पन्न होता है ।
परत्वापरत्व के विनाश के ६ कारण हैं । १ कहीं अपेक्षा बुद्धि के नाश
से । २ कहीं संयोग के नाश से ३ कहीं द्रव्य के नाश से, ४ कहीं द्रव्य-
बुद्धि के युगपद् विनाश से ५ कहीं द्रव्य और संयोग के नाश से, ६ कहीं संयोग
और अपेक्षाबुद्धि के नाश से, ७ और कहीं समवायिकारण, असमवायिकारण,
तथा निमित्त कारण तीनों के नाश से परत्वापरत्व का नाश हो सकता है । प्रशस्त
पादभाष्य में इन सबका सोदाहरणों से विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है ।
१३ गुरुत्व-निरूपण—
आद्य पतन का असमवायिकारण 'गुरुत्व' है [आद्य पद देने का अभिप्राय
यह है कि आगे द्वितीयादि क्षण में जो पतन होता है उसका कारण वेग संस्कार
होता है जिसका उल्लेख आगे किया जायगा । प्रथम बार जो पतन होता है केवल
उसका असमवायि कारण 'गुरुत्व' है] पृथिवी और जल में रहता है । जैसा कि

द्रवत्व-स्नेह-शब्दाः ] प्रमेयनिरूपणम् २०५
संयोग-वेग-प्रयत्नाभावे सति गुरुत्वात् पतनमिति ।
१३-द्रवत्वमाद्यस्यन्दनासमवायिकारणम् । भूतेजोजलवृत्ति । भूतेज-
सोर्घृतादिसुवर्णयोरग्निसंयोगेन द्रवत्वं नैमित्तिकम्। जले नैसर्गिकं द्रवत्वम्।
१४-स्नेहश्चिकणता । जलमात्रवृत्तिः, कारणगुणपूर्वको, गुरुत्वादिवद्
यावद्द्रव्यभावी ।
१५-शब्दः श्रोत्रग्राह्यो गुणः । आकाशस्य विशेषगुणः ।
ननु कथमस्य श्रोत्रेण ग्रहणं यतो भेर्यादिदेशे शब्दो जायते श्रोत्रन्तु
पुरुषदेशेऽस्ति ।
[ वैशेषिक सूत्रकार ने ] कहा है संयोग, वेग और प्रयत्न [ ये तीनों पतन के
प्रतिबन्धक हैं ] इनके अभाव में 'गुरुत्व' के कारण पतन होता है ।
१३ [ गुरुत्व के समान ही ] आद्य स्यन्दन [ बहना-प्रवाहित होना ] का
असमवायि कारण 'द्रवत्व' [ नामक गुण ] है । पृथिवी, तेज और जल में रहने
वाला है। [ इन में से ] पार्थिव घृतादि, और तैजस सुवर्णं में अग्निसंयोग से
[ उत्पन्न होने वाला ] 'नैमित्तिक द्रवत्व' रहता है और जल में नैसर्गिक द्रवत्व
है । [ जल के नैसर्गिक द्रवत्व का भी, भोक्ता आत्मविशेष, के अदृष्टादि सहकारी
कारणों के अभाव से प्रतिरोध हो सकता है । ]
१४ 'स्नेह' [ गुण ] चिकनापन [ का नाम ] है । केवल जल में रहता है ।
कारणगुणपूर्वक [ अर्थात् पहिले कारणरूप द्वयणुकादि में और फिर उसके
कार्यभूत त्र्यणुकादि में उत्पन्न होता है ] और गुरुत्वादि के समान यावद्द्रव्य-
भावी [ अर्थात् जब तक वह जल रहता है तब तक उसमें स्नेह गुण रहता ] है।
१५ श्रोत्रग्राह्य गुण 'शब्द' [कहलाता] है । वह आकाश का विशेष गुण है।
[ प्रश्न ] इसका श्रोत्र से कैसे ग्रहण होता है क्योंकि शब्द तो भेरी आदि
देश में उत्पन्न होता है और श्रोत्र पुरुष देश में है । [ अर्थात् दोनों के भिन्न देशमें
होने से श्रोत्र से शब्द का ग्रहण नहीं हो सकता है ]
दूर देश में उत्पन्न होने वाला शब्द हमको किस प्रकार सुनाई देता है
इसका उपपादन के लिये आधुनिक विज्ञान के समान प्राचीन दार्शनिकों ने
भी शब्दधारा मानी है । न्याय शब्द की गति या उत्पत्ति के दो प्रकार माने
हैं । एक को 'वीचीतरङ्गन्याय' और दूसरे को 'कदम्बमुकुलन्याय' कहते हैं ।
इन दोनों का अन्तर यह है कि 'वीचीतरङ्गन्याय' में चारो दिशाओं में फैलने
वाली शब्द की एक लहरसी होती है । और 'कदम्बमुकुलन्याय' में चारो

२०६ तर्कभाषा [ 'शब्दगुणः
दिशाओं में उत्पन्न होने वाले शब्द अलग-अलग से होते हैं । जैसा कि नीचे
दिए चित्र में स्पष्ट हो रहा है—
कदम्बमुकुल न्याय से शब्दधारा की गति
ऊपर एक चित्र दिया हुआ है। यह चित्र भौतिक विज्ञान के ग्रन्थ से
लिया गया है । आधुनिक वैज्ञानिक जिस रूप में शब्द की गति मानते हैं
उसका प्रदर्शन इस चित्र में किया गया है । 'वीचीतरङ्गन्याय' तथा 'कदम्ब-
मुकुल न्याय' दोनों का स्पष्टीकरण इस चित्र से भली प्रकार हो जाता है । इस
चित्र में घण्टे के पास में बिन्दुओं का चक्र दिखाई देता है कुछ दूर चलने के
बाद वह एक तरङ्ग के रूप में दिखाई देता है। इस प्रकार शब्द की गति के
दो रूप यहाँ दिखाई दे रहे हैं। इनमें से पहले स्वरूप को प्राचीन आचार्यों ने
'कदम्बमुकुलन्याय' और दूसरे को 'वीचीतरङ्गन्याय' नाम से प्रकट किया है ।
'कदम्ब-मुकुल' का अर्थ कदम्ब का फूल या कली है । कदम्ब के फूल की बना-
वट ठीक इसी प्रकार की होती है जैसी कि घंटे के पास की शब्द धारा में
दिखाई पड़ रही है । कदम्ब के फूल के सिर पर केन्द्र में एक कील सी खड़ी
होती है। फिर उसके चारो ओर उसी प्रकार की कीलें सी खड़ी होती हैं ।
देखने में ठीक ऐसी ही होती है जैसी घण्टे के पास की शब्द-धारा दिखाई दे
रही है । इसीलिए इस प्रकार की शब्दधारा को सूचित करने के लिए 'कदम्ब-
मुकुलन्याय' इस शब्द का विशेषरूप से प्रयोग किया गया है। चित्र में
चारो ओर अलग अलग बिन्दु दिखाई दे रहे हैं । इसलिए चारो ओर उत्पन्न
होने वाले शब्दों को अलग अलग भी कहा जा सकता है ।
थोड़ी दूर चलने के बाद चित्र में अलग-अलग बिन्दुओं के स्थान पर
एक वीची या लहर का चक्र सा दिखाई देने लगता है । अर्थात्