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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 330 में से

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पृष्ठ 253

१८८ तर्कभाषा [ आकाशद्रव्यम्
परममहत्परिमाणवदित्यर्थः¹। सर्वत्र तत्कार्योपलब्धेः। अतएव विभु-
त्वान्नित्यमिति।
परिमाण' वाला है। सर्वत्र उसका कार्य [ शब्द ] उपलब्ध होने से [ आकाश
विभु है ] और विभु होने से नित्य है।
एक होने से आकाश में 'आकाशत्व' जाति नहीं है। इसके कहने का
अभिप्राय यह है कि 'नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वम् सामान्यम्' यह
'सामान्य' का लक्षण किया गया है। अर्थात् 'सामान्य' नित्य और अनेक में
रहने वाला धर्म होता है। जैसे 'घटत्व', 'पटत्व' आदि 'सामान्य' कहलाते हैं।
वह अनेक घट तथा अनेक पट व्यक्तियों में रहने से और उन अनेक व्यक्तियों में
घटः, घटः इस प्रकार की एकाकार, अनुगत-प्रतीति के जनक होने से ही
'सामान्य' कहलाते हैं। परन्तु आकाश अनेक नहीं हैं इसलिए उसमें 'आका-
शत्व' नाम का 'सामान्य' नहीं रहता है। यद्यपि घटत्व के समान आकाश शब्द
के आगे भी 'त्व' प्रत्यय जोड़ कर 'आकाशत्व' व्यवहार होता है। परन्तु
'आकाशत्व' 'सामान्य' नहीं अपितु 'उपाधि' है।
काल-निरूपण—
आगे काल का निरूपण करते हैं। काल की सिद्धि दिग्विपरीत परत्व
और अपरत्व, से तथा दिक् की सिद्धि कालविपरीत परत्वापरत्व से अनुमान
द्वारा होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जो आयु में बड़ा है जिसके
साथ काल का अधिक सम्बन्ध है वह 'कालिक-दृष्टि' से 'पर' कहा जाता है।
और जिसके साथ काल का अल्प सम्बन्ध है अर्थात् जो आयु में छोटा है
उसे 'कालिक-दृष्टि' से 'अपर' कहते हैं इसी प्रकार जिसके साथ अधिक
देश का सम्बन्ध है अर्थात् जो अधिक दूर बैठा है वह 'दैशिक-दृष्टि' से 'पर' है
और जिसके साथ देश का अल्प सम्बन्ध है अर्थात् जो समीप स्थित है वह
'दैशिक-दृष्टि' से 'अपर' है। इस दशा में वृद्ध पुरुष, युवक की अपेक्षा 'कालिक
दृष्टि' से 'पर' है परन्तु यदि वही वृद्ध पुरुष जो काल की दृष्टि से 'पर' है,
युवक की अपेक्षा समीप बैठा हो तो उस में 'अपर' व्यवहार होगा। यही
दिग्-विपरीत तथा काल-विपरीत परत्व और अपरत्व है। अत एव दिग्विप-
रीत परत्वापरत्व से काल का और कालविपरीत परत्वापरत्व से दिक् का
अनुमान होता है। यही आगे कहते हैं।
१ पूना के संस्करण में 'परममहत्परिमाणवानित्यर्थः' इस प्रकार पुल्लिंग पाठ है।