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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 330 में से

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पृष्ठ 258

स्पर्श-संख्यागुणौ ] प्रमेयनिरूपणम् १६३
४-स्पर्शस्त्वगिन्द्रियग्राह्यो विशेषगुणः। पृथिव्यादिचतुष्टयवृत्तिः।
स च त्रिविधः शीत-उष्ण-अनुष्णाशीतभेदात्। शीतः पयसि, उष्णस्तेज-
सि, अनुष्णाशीतः पृथिवीवाय्वोः। पृथिवीमात्रे ह्यनित्यः। आप्य-तैजस-
वायवीयपरमाणुषु नित्यः, आप्यादिकार्येष्वनित्यः। एते च रूपादयश्च-
त्वारो महत्त्वैकार्थसमवेतत्वे सत्युद्भूता एव प्रत्यक्षाः।
५-संख्या एकत्वादिव्यवहारहेतुः सामान्यगुणः। एकत्वादिपरार्द्ध-
पर्यन्ता। तत्रैकत्वं द्विविधं नित्यानित्यभेदात्। नित्यगतं नित्यमनि-
त्यगतमनित्यम्। स्वाश्रयसमवायिकारणगतैकत्वजन्यञ्च। द्वित्वञ्चानित्य-
४-स्पर्श-निरूपण—
त्वगिन्द्रिय से, ग्राह्य विशेष गुण 'स्पर्श' है। पृथिवी आदि चार [१ पृथिवी,
२ जल, ३ वायु ४ अग्नि] में रहता है। और वह १ शीत, २ उष्ण, ३ अनुष्णा-
शीत, भेद से तीन प्रकार का है। शीत [स्पर्श] जल में, उष्ण [स्पर्श] अग्नि
में, और अनुष्णाशीत [स्पर्श] पृथिवी तथा वायु में [रहता] है। पृथिवी मात्र
में अनित्य होता है। जल, वायु और तेज के परमाणुओं में नित्य तथा जल आदि
कार्यों में अनित्य है। यह रूपादि चारो [गुण], महत् [परिमाण] के साथ
एक अर्थ में समवेत और उद्भूत होने पर ही प्रत्यक्ष होते हैं। [अन्यथा नहीं
जैसे परमाणु तथा द्व्यणुक में महत् परिमाण न होने से उनमें रहने वाले रूपादि
गुणों का प्रत्यक्ष नहीं होता है। और उष्ण जल में अग्नि के भास्वर शुक्ल रूप के
'उद्भूत' न होने से उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है। इसलिए रूपादि चारों गुणों के
प्रत्यक्ष होने के लिए उनका 'उद्भूत' होना और महत्परिमाण वाले द्रव्य में
समवेत होना यह दोनों बातें आवश्यक हैं]।
५-संख्या-निरूपण
५-एकत्वादि व्यवहार का हेतुभूत सामान्य गुण 'संख्या' [कहलाता] है।
वह एकत्व से लेकर परार्द्ध [शंख, दश शंख, महा शंख से भी आगे की संख्या]
पर्यन्त [होती] है। उनमें से नित्य और अनित्य के भेद से 'एकत्व' दो प्रकार
का होता है। नित्य [आकाशादि] में रहने वाला [एकत्व] नित्य, और
अनित्य [घटादि] में रहने वाला [एकत्व] अनित्य होता है। [अनित्य एकत्व]
अपने आश्रय [घटादि] के समवायिकारण [कपालादि] में रहने वाले एकत्व
से उत्पन्न होता है। और 'द्वित्व' तो [सर्वत्र] अनित्य ही होता है। और वह
दो पिण्डों [घटादि वस्तुओं] की, 'यह एक है' और 'यह एक है', इस [प्रकार
के ज्ञान, जिसको] 'अपेक्षा-बुद्धि' [कहते हैं] से उत्पन्न होता है। उस
१३ त० भा०