तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआकाशद्रव्यम् ] प्रमेयनिरूपणम् १८७
तथाहि शब्दस्तावद् विशेषगुणः सामान्यवत्त्वे सत्यस्मदादिबाह्ये-
न्द्रियग्राह्यत्वाद् रूपांदिवत् । गुणश्च गुण्याश्रित एव । न चास्य पृथि-
व्यादिचतुष्टयमात्मा च गुणी भवितुमर्हति, श्रोत्रग्राह्यत्वाच्छब्दस्य । ये
हि पृथिव्यादीनां गुणा न ते श्रोत्रेन्द्रियेण गृह्यन्ते, यथा रूपादयः,
शब्दस्तु श्रोत्रेण गृह्यते । न दिक्कालमनसां गुणो विशेषगुणत्वात् । अत
एभ्योऽष्टभ्योऽतिरिक्तः शब्दगुणी एषितव्यः, स एवाकाश इति ।
स चैको, भेदे प्रमाणाभावात् । एकत्वेनैवोपपत्तेः। एकत्वाच्चाकाशत्वं
नाम सामान्यमाकाशे न विद्यते सामान्यस्यानेकवृत्तित्वात्-विभु चाकाशम्
हो जाने पर अन्य [ किसी को प्राप्ति ] का प्रसङ्ग न होने से जो बच रहे उसको
स्वीकार कर लेना 'परिशेष' [ अनुमान कहलाता है इस प्रकार परिशेषानुमान
का लक्षण भाष्यकार ने किया ] है ।
[ यहां शब्द के विषय में परिशेषानुमान का यह लक्षण इस प्रकार घटता
है कि ] जैसे शब्द सामान्य [ जाति ] युक्त होकर हमारी बाह्य एक [ श्रोत्र ]
इन्द्रिय से ग्राह्य होने से रूपादि के समान 'विशेष गुण' है। और गुण, गुणी के
आश्रित ही होता है । [ आकाश को छोड़कर शेष आठ द्रव्यों में से [ पृथिवी
आदि चार [ पृथिवी, अप्, तेज, वायु ] और आत्मा [ यह पांच ] इस [ शब्द-
गुण ] के गुणी नहीं हो सकते हैं। शब्द के श्रोत्र-ग्राह्य होने से [ पृथिवी आदि
चार और आत्मा इन पांचों के विशेष गुणों में से कोई भी श्रोत्र-ग्राह्य नहीं है
अतएव श्रोत्रग्राह्य शब्द इन पाँचों में से किसी का गुण नहीं हो सकता है ] जो
पृथिवी आदि के गुण हैं वह श्रोत्र इन्द्रिय से गृहीत नहीं होते हैं। जैसे रूपादि ।
और शब्द तो श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत होता है । [ इसलिए शब्द पृथिवी आदि
चार तथा आत्मा इन पांच का गुण नहीं है ] और न दिक्, काल, तथा मन
[ इन तीन ] का गुण है विशेष गुण होने से । [ दिक्, काल, और मन इन
तीनों में रहने वाले गुण सामान्य गुण हैं विशेष गुण नहीं और शब्द विशेष
गुण है इसलिए वह इन तीनों का भी गुण नहीं है ] । इसलिए इन आठों से
अतिरिक्त शब्द [ गुण ] का गुणी मानना चाहिए । वह ही आकाश है ।
और वह एक है भेद में [ साधक ] प्रमाण न होने से एकत्व से ही कार
हो जाने से [ आकाश को अनेक मानने की आवश्यकता नहीं है ] । एक होने के
कारण ही 'आकाशत्व' नामक सामान्य [ जाति ] आकाश में नहीं रहता है ।
सामान्य के अनेक में रहने वाला होने से । और आकाश विभु अर्थात् 'परममहत्-