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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 330 में से

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पृष्ठ 262

विरोधपरिहारः ] प्रमेयनिरूपणम् १६७
द्वित्व का नाश हो जाता है और दूसरी ओर उसी क्षण में द्वित्व सामान्य ज्ञान
से 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश होता है। इस स्थिति में 'अपेक्षा-बुद्धि' तथा 'द्वित्व'
दोनों का नाश एक ही क्षण में होने से उन दोनों में कार्य-कारण-भाव नहीं
कहा जा सकता है। अर्थात् वह द्वित्व का नाश 'अपेक्षा-बुद्धि' के नाश से
नहीं अपितु आश्रय द्रव्य के नाश से होता है। यह आश्रय-नाश से द्वित्व-
नाश की प्रक्रिया हुई :
'सहानवस्थान' विरोध पक्ष में दोष और उसका परिहार—
वैशेषिक दर्शन में इस उत्पत्ति और विनाश की प्रक्रिया के प्रसङ्ग में
'वध्यघातक भाव' और 'सहानवस्थान' रूप दो प्रकार के विरोधों का उल्लेख
किया गया है। और दोनों पक्षों में 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की उत्पत्ति नहीं बनेगी
यह दोष देकर उसका समाधान करने का प्रयत्न किया गया है। 'सहानव-
स्थान' विरोध में विनाशक सामग्री की उत्पत्ति के क्षण में ही विनाश्य पदार्थ
का विनाश हो जाता है इसलिए द्वित्वगुणबुद्धि की उत्पत्ति के क्षण अर्थात्
छठे क्षण में द्वित्वगुणबुद्धि के उत्पन्न होते ही 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश उसी
क्षण में हो जाने से उसी समय द्वित्व का नाश हो जायगा। अतः जब छठे
क्षण में द्वित्व का नाश हो गया तब सातवें क्षण में द्वित्वगुण-विशिष्ट द्रव्य
अर्थात् 'द्वे द्रव्ये' इस प्रकार का ज्ञान कैसे उत्पन्न होगा। यह प्रश्न उत्पन्न
होता है। उसका समाधान 'आशूत्पत्ति' मान कर किया है। समाधान का
आशय यह है कि जैसे 'शब्दवदाकाशम्' यह विशिष्ट ज्ञान जब तक उत्पन्न
होता है उसके पूर्व ही क्षणिक शब्द का नाश हो चुकता है। परन्तु शब्द
का नाश हो जाने पर भी उसका ज्ञान बुद्धि में रहता है और उस ज्ञान के
कारण अत्यन्त शीघ्रता से शब्द-विशिष्ट आकाश का ज्ञान 'शब्दवदाकाशम्'
इस रूप में जैसे बन जाता है इसी प्रकार छठे क्षण में द्वित्व का नाश हो जाने
पर भी 'आशूत्पत्ति' के कारण 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान बन सकता है। इस प्रकार
'सहानवस्थान' पक्ष में आए हुए दोष का समाधान किया गया है।
विरोध का दूसरा भेद 'वध्य-घातक-भाव' है। इस 'वध्य-घातक-भाव'
विरोध में पहिले क्षण में घातक उत्पन्न होता है और अगले क्षण में 'वध्य' का
वध अर्थात् विनाश होता है। अर्थात् 'घातक' की उत्पत्ति के एक क्षण बाद
'वध्य' का नाश होता है। पूर्वपक्ष की ओर से यह शङ्का होती है कि इस
'वध्य-घातक विरोध' में भी 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान नहीं उत्पन्न हो सकेगा क्योंकि
तृतीयक्षण में 'अपेक्षा-बुद्धि' उत्पन्न होती है उससे चतुर्थ क्षण में संस्कार से
पञ्चम क्षण में 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश और उसके बाद छठे क्षण में द्वित्व का