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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 330 में से

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पृष्ठ 266

संयोगगुणः ] प्रमेय‌निरूपणम् २०१
८-संयोगः संयुक्तव्यवहारहेतुर्गुणः । स च द्व्याश्रयोऽव्याप्यवृत्तिश्च ।
स च त्रिविधः । अन्यतरकर्मजः, उभयकर्मजः, संयोगजश्चेति ।
तत्रान्यतरकर्मजो यथा क्रियावता श्येनेन सह निष्क्रियस्य स्थाणोः
संयोगः । अस्य हि श्येनक्रिया असमवायिकारणम् । उभयकर्मजो यथा
सक्रिययोर्मल्लयोः संयोगः । संयोगजो यथा कारणाकारणसंयोगात्
कार्याकार्यसंयोगः । यथा हस्ततरुसंयोगेन कायतरुसंयोगः ।
१एतावांस्तु विशेषः । एकत्वादिवदेकपृथक्त्वादिष्वपरसामान्याभावः संख्यया
तु विशिष्यते । तद्विशिष्टव्यवहारदर्शनादिति ।
८ संयोग-निरूपण—
[ यह इससे संयुक्त है इस प्रकार के ] संयुक्त व्यवहार का हेतु-भूत गुण
'संयोग' है । वह द्विष्ट [ दो पदार्थों में रहने वाला ] और अव्याप्यवृत्ति [ रूपादि
के समान सारे पदार्थ में व्याप्त न होकर उसके केवल एक देश में रहनेवाला ]
होता है । और वह [ प्रकारान्तर से ] तीन प्रकार का होता है १ अन्यतरकर्मज,
२ उभयकर्मज, और ३ संयोगज-संयोग । उनमें अन्यतर-कर्मज [ अर्थात् संयुक्त
होने वाले दोनों पदार्थों में से किसी एक के कर्म से उत्पन्न हुए संयोग का
उदाहरण ] जैसे क्रियावान् [ अर्थात् उड़कर आए हुए श्येन ] बाज के साथ
निष्क्रिय स्थाणु [ वृक्ष के ठूंठ ] का संयोग । इस [ स्थाणु तथा श्येन के संयोग
का समवायिकारण तो वह दोनों ही हैं परन्तु इस ] का असमवायिकारण श्येन
की क्रिया है । उभयकर्मज [ संयोग का उदाहरण ] जैसे सक्रिय दो पहलवानों का
संयोग [ दोनों पहलवान इधर उधर से आकर भिड़ जाते हैं इसलिए उनका संयोग
दोनों के कर्म से होने के कारण 'उभयकर्मज' संयोग है ] संयोगज संयोग का
उदाहरण ] जैसे [ शरीर के ] कारण [ अवयव रूप हाथ ] और [ उस शरीर
के ] अकारण [ रूप वृक्ष ] के संयोग से [ हाथ के ] कार्य [ भूत शरीर ] और
अकार्य [ भूत वृक्ष ] का संयोग । जैसे हाथ और वृक्ष का संयोग होने से शरीर
का वृक्ष के साथ संयोग [ होता है वह संयोगज संयोग का उदाहरण है ] ।
इस प्रकार संयोग के तीन भेद किए । यह तीनों प्रकार का संयोग जन्य
है । अर्थात् नित्य संयोग नहीं होता है । परिमाण आदि तो नित्य में रहने वाले
नित्य भी होते हैं परन्तु संयोग नित्य पदार्थों का भी अनित्य ही होता है । जैसे
नित्य परमाणु का नित्य आकाश आदि के साथ संयोग है । परन्तु वह नित्य
१ वैशेषिक प्रशस्तपाद भाष्य ।