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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 330 में से

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पृष्ठ 254

कालद्रव्यम् ] प्रमेयनिरूपणम् १८६
कालोऽपि दिग्-विपरीतपरत्वापरत्वानुमेयः । संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-
संयोग-विभागवान् । एको नित्यो विभुश्च । कथमस्य दिग्-विपरीत-
परत्वापरत्वानुमेयत्वम् । उच्यते । सन्निहिते वृद्धे सन्निधानादपरत्वार्हे
तद्विपरीतं परत्वं प्रतीयते । व्यवहिते यूनि व्यवधानात् परत्वार्हे तद्वि-
परीतमपरत्वम् । तदिदं तत्तद्विपरीतं परत्वमपरत्वञ्च कार्यं तत्कारणस्य
दिगादेरसम्भवात् कालमेव कारणमनुमापयति । स चैकोऽपि
वर्तमानातीतभविष्यत्क्रियोपाधिवशाद् वर्तमानादिव्यपदेशं लभते, ।
पुरुष इव पच्यादिक्रियोपाधिवशात् पाचक-पाठकादिव्यपदेशम् । नित्यत्व-
विभुत्वे चास्य पूर्ववत् ।
कालविपरीतपरत्वापरत्वानुमेया दिक् । एका नित्या विभ्वी च ।
संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-संयोग-विभागवती । पूर्वादिप्रत्ययैरनुमेया ।
तेषामन्यनिमित्तासम्भवात् । पूर्वस्मिन् पश्चिमे वा देशे स्थितस्य
काल भी दिग्-विपरीत परत्व, अपरत्व से अनुमेय है । १ संख्या, २ परिमाण,
३ पृथक्त्व, ४ संयोग, ५ विभाग, [ इन पांच गुणों ] से युक्त, एक नित्य और
विभु है ।
[ प्रश्न ] इस का दिग्विपरीत परत्वापरत्व से अनुमेयत्व कैसे है ?
[ उत्तर ] कहते हैं । पास में स्थित अतएव सन्निधान के कारण [ 'दैशिक
दृष्टि' से ] 'अपरत्व' [ व्यवहार ] के योग्य वृद्ध [ पुरुष ] में उस [ अपरत्व ] के
विपरीत [ 'कालिकदृष्टि' से ] 'परत्व' प्रतीत होता है । [ इसी प्रकार ] दूरस्थ
अतएव व्यवधान के कारण [ 'दैशिक-दृष्टि' से [ 'परत्व' [ व्यवहार ] के योग्य
युवक में उस [ दैशिक परत्व ] के विपरीत 'अपरत्व' प्रतीत होता है । यह उस
उस [ दैशिक अपरत्व और परत्व ] के विपरीत 'परत्व', 'अपरत्व' कार्य, उसका
कारण दिगादि सम्भव न होने से से काल को ही कारण रूप में अनुमित कराता
है । वह एक होने पर भी वर्तमान, अतीत, भविष्यत् क्रिया रूप उपाधि के
सम्बन्ध से वर्तमान आदि संज्ञा को प्राप्त होता है जैसे पचन [ पठन ] आदि
क्रिया रूप उपाधि के कारण पुरुष पाचक, पाठक आदि व्यवहार को प्राप्त होता
है । इसके विभुत्व और नित्यत्व पूर्ववत् [ आकाश के समान ] होते हैं ।
'दिक्' का निरूपण—
कालविपरीत परत्व, अपरत्व से अनुमेय दिक्, एक, नित्य और विभु है ।
१ संख्या, २ परिमाण, ३ पृथक्त्व, ४ संयोग, ५ विभाग, [ इन पांचो गुणों ]
से युक्त है । पूर्व [ पश्चिम ] आदि ज्ञान से [ भी ] अनुमेय है उनका अन्य
निमित्त न होने से । पूर्व में या पश्चिम देश में स्थित वस्तु के समानरूप होने