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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 268, कुल 330 में से

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पृष्ठ 268

परत्वापरत्वगुणौ ] प्रमेयनिरूपणम् २०३
१०-११-परत्वापरपरत्वे परापरव्यवहारासाधारणकारणे। ते तु द्विविधे
दिक्कृते कालकृते च । तत्र दिक्कृतयोरुत्पत्तिः कथ्यते । एकस्यां
दिश्यवस्थितयोः पिण्डयोरिदमस्मात् सन्निकृष्टमिति बुद्ध्याऽनुगृहीतेन
'संयोगज-संयोग' और 'विभागज-विभाग' की व्याख्या करते समय 'कार-
णाकारणसंयोगात् कार्याकार्यसंयोगः' । और 'कारणाकारणविभागात् कार्याकार्य-
विभागः' । इस प्रकार की व्याख्या की गई है । इस पर शङ्का यह हो सकती
है कि यदि हस्त-तरु-संयोग से भिन्न काय-तरु-संयोग को माना जाय अथवा
हस्ततरु-विभाग से भिन्न कायतरु-विभाग को माना जाय तो हाथ और शरीर
जो अवयव और अवयवी होने से 'अयुत-सिद्ध' हैं उनमें 'युत-सिद्धि' प्राप्त होने
लगेगी । उन दोनों के 'अयुत-सिद्ध' होने से हाथ का तरु के साथ जो विभाग है
उसी को शरीर के साथ विभाग मानना चाहिए । इसी प्रकार हाथ का वृक्ष के
साथ जो संयोग है उसको ही शरीर और वृक्ष का संयोग मानना चाहिए ।
अन्यथा हस्त और शरीर का 'अयुतसिद्धत्व' नहीं बनेगा । इसलिए 'संयोगज-
संयोग' अथवा 'विभागज-विभाग' मानना उचित नहीं है ।
इसका उत्तर यह दिया गया है कि 'युत-सिद्धि' का लक्षण पहले किया जा
चुका है । 'सा पुनर्द्वयोरन्यतरस्य वा पृथग्गतिमत्त्वं युतेषु आश्रयेष्वाश्रयित्वं वा' ।
अर्थात् दोनों में किसी एक की पृथग्गतिमत्ता अथवा भिन्न-भिन्न आश्रयों में रहने
को ही 'युत-सिद्धि' कहते हैं । इनमें से पहिला लक्षण नित्य पदार्थों में और
दूसरा लक्षण अनित्य पदार्थों में पाया जाता है । इस प्रकार की 'युत-सिद्धि'
हस्त और देहादि में नहीं घट सकती है । इसलिए यह दोष नहीं है ।
ऊपर पृथक्त्व और विभाग दो गुण माने गए हैं । इनमें से विभाग
क्षणिक और अस्थिर है । पृथक्त्व स्थिर । जिस पदार्थ का दूसरे
से विभाग होता है उस विभक्त पदार्थ का पूर्वसंयोग-नाश और उत्तर देश-
संयोग हो जाने के बाद विभाग नष्ट हो जाता है । विभाग की सीमा उत्तरदेश- .
संयोग के साथ समाप्त हो जाती है और उसके बाद पृथक्त्व की सीमा प्रारम्भ
होती है । अर्थात् जहाँ पहुँच कर विभाग समाप्त हो जाता है वहाँ से पृथक्त्व
प्रारम्भ होता है ।
१०-११ परत्व और अपरत्व का निरूपण—
'पर' और 'अपर' व्यवहार के असाधारण कारण [ क्रमशः ] 'परत्व' और
'अपरत्व' [ नामक गुण ] हैं । वे [ दोनों ] दो प्रकार के होते हैं दिक्कृत और
कालकृत [ परत्व तथा अपरत्व ] । दिक्कृत [ परत्व और अपरत्व ] की उत्पत्ति
कहते हैं । एक दिशा में रखे हुए दो पिण्डों में यह इसकी अपेक्षा समीप है इस