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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 330 में से

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पृष्ठ 267

२०२ तर्कभाषा [ विभागगुणः
६-विभागोऽपि विभक्तप्रत्ययहेतुः । संयोगपूर्वको द्व्याश्रयः । स च
त्रिविधोऽन्यतरकर्मजः, उभयकर्मजो विभागजश्चेति । तत्र प्रथमो यथा
श्येनक्रियया शैलश्येनयोर्विभागः । द्वितीयो यथा मल्लयोर्विभागः ।
तृतीयो यथा हस्ततरुविभागात् कायतरुविभागः !
द्वित्वे च पाकजोत्पत्तौ विभागे च विभागजे ।
यस्य न स्खलिता बुद्धिस्तं वै वैशेषिकं विदुः ॥
नहीं अपितु 'अन्यतरकर्मज' है। परमाणु में गति होती है। वह एक स्थान से
दूसरे स्थान पर जा कर उस देश के आकाश से मिलता है इसलिए इनका
संयोग 'अन्यतरकर्मज' संयोग होता है। नित्य संयोग नहीं । अब प्रश्न रह
जाता है आकाश और काल आदि नित्य तथा विभु पदार्थों के संयोग का । सो
उसके विषय में वैशेषिक दर्शन का सिद्धान्त यह है कि नित्य और विभु पदार्थों
का परस्पर संयोग होता ही नहीं है। क्योंकि संयोग सम्बन्ध 'युत सिद्ध-पृथक्'
पृथक् पदार्थों का ही होता है। 'युत-सिद्धि' का अर्थ यह है कि उन दोनों
पदार्थों में से दोनों अथवा कोई एक पृथक् गतिमान् हो । नित्य और विभु
पदार्थों में से किसी में भी पृथग्गतिमत्त्व नहीं रहता है, इसलिए उनका संयोग
होता ही नहीं है। इस विषय में वैशेषिक दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में
लिखा है—
नोऽन्त्यजः संयोगः । १••••••परमाणुभिराकाशादीनां प्रदेशवृत्तिरन्यतरकर्मजः
संयोगः विभूनां तु परस्परतः संयोगो नास्ति युतसिद्धयभावात् । सा पुनर्द्वयोर-
न्यतरस्य वा पृथग्गतिमत्त्वम्, पृथगाश्रयाश्रयित्वञ्चेति ।
संयोग के विनाश के दो कारण होते हैं या तो जिन का संयोग है उनमें ही
विभाग गुण उत्पन्न हो जाय तो पूर्व संयोग का नाश हो जाता है। अथवा
आश्रय के नाश से भी संयोग का नाश हो जाता है।
९ विभाग-निरूपण—
विभक्त प्रतीति का हेतु [ भूत गुण ] 'विभाग' है। वह संयोगपूर्वक और
दो में आश्रित रहने वाला है। और वह [ भी ] तीन प्रकार का है। १ अन्यतर-
कर्मज, २ उभयकर्मज, और ३ विभागजविभाग। उनमें प्रथम [ अर्थात् अन्यतर-
कर्मज विभाग का उदाहरण ] जैसे श्येन की [ उड़ जाने की ] क्रिया से श्येन
और पर्वत का विभाग । दूसरा [ उभयकर्मज विभाग का उदाहरण ] जैसे दो
पहलवानों का विभाग, तीसरा [ विभागज विभाग ] जैसे हाथ और वृक्ष के विभाग
से शरीर और वृक्ष का विभाग ।
१ सर्वदर्शनसंग्रह वै० द० । २ प्रशस्तपाद भाष्य संयोग प्र० ।