तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ तर्कभाषा [ रूप-रस-गन्ध-स्पर्शाः
शुक्लाद्यनेकप्रकारकम्। पाकजञ्च पृथिव्याम्। तच्चाऽनित्यं पृथिवीमात्रे।
आप्यतैजसपरमाण्वोर्नित्यम्। आप्यतैजसकार्येष्वनित्यम्। शुक्लभास्वर-
मपाकजं तेजसि। तदेवाभास्वरमप्सु।
२-रसो रसनेन्द्रियग्राह्यो विशेषगुणः पृथिवीजलवृत्तिः। तत्र पृथिव्यां
मधुरादिषट्प्रकारो मधुर-अम्ल-लवण-कटु-कषाय-तिक्त-भेदात्, पाकजश्च
अप्सु मधुरोऽपाकजो नित्योऽनित्यश्च। नित्यः परमाणुभूतास्वप्सु
कार्यभूतास्वनित्यः।
३-गन्धो घ्राणग्राह्यो विशेषगुणः। पृथिवीमात्रवृत्तिः। अनित्य एव।
स द्विविधः सुरभिरसुरभिश्च। जलादौ गन्धप्रतिभानं तु संयुक्तसमवायेन
द्रष्टव्यम्।
सामान्य गुण हैं और उनका ग्रहण केवल चक्षु से नहीं अपितु चक्षु और त्वक्
दोनों से होता है। अतः मात्र पद तथा विशेष पद जोड़ देने से उसमें अतिव्याप्ति .
नहीं होती।] पृथिवी आदि [१ पृथिवी, २ जल, ३ तेज] तीन में रहनेवाला
और वह शुक्ल आदि [१ शुक्ल, २ लोहित, ३ पीत, ४ कृष्ण, ५ हरित,
६ कपिश और ७ चित्र भेद से सात] अनेक प्रकार का है। पृथिवी में पाकज
है। और वह पृथिवी मात्र में अनित्य और आप्य तथा तैजस परमाणुओं में
नित्य एवं आप्य तथा तैजस कार्यों में अनित्य होता है। तेज में भास्वर शुक्ल
और अपाकज तथा वही [रूप] जल में अभास्वर शुक्ल [और अपाकज]
होता है।
२-रस-निरूपण-
रसना इन्द्रिय से ग्राह्य विशेष गुण 'रस' है। पृथिवी और जल में रहता
है। उसमें से पृथिवी में मधुर आदि छः प्रकार का, १ मधुर, २ अम्ल, ३ लवण,
४ कटु, ५ कषाय, ६ तिक्त, भेद से [६ प्रकार का] और पाकज है। जल में
मधुर अपाकज होता है। [वह] नित्य और अनित्य [दो प्रकार का] है।
परमाणु रूप जल में नित्य, और कार्य भूत [जल] में अनित्य होता है।
३-गन्ध-निरूपण-
घ्राणेन्द्रिय-ग्राह्य विशेष गुण 'गन्ध' है [जो] केवल पृथिवी में रहता है।
और अनित्य ही है। वह सुगन्ध और दुर्गन्ध दो प्रकार का होता है। जल
आदि में [होने वाली] गन्ध की प्रतीति संयुक्त समवाय [जल में संयुक्त
पार्थिव अंश में समवाय सम्बन्ध से रहने वाली गन्ध का जल में भान संयुक्त
समवाय] से समझना चाहिए। [उस गन्ध को जलका गुण न मानना चाहिए]।