सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 260, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 260

द्वित्वविनाशप्रक्रिया ] प्रमेयनिरूपणम् १६५
द्वित्व से विशिष्ट 'द्वे द्रव्ये' इस प्रकार का द्रव्य ज्ञान होता है। इस प्रकार
द्वित्व की उत्पत्ति-प्रक्रिया में अर्थात् 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की उत्पत्ति में
सात क्षण लगते हैं।
द्वित्वविनाश की प्रक्रिया—
इसी प्रकार द्वित्व के नाश की प्रक्रिया में नौ क्षण लगते हैं। द्वित्व के
नाश का एक कारण तो 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश है और दूसरा कारण 'आश्रय
द्रव्य' का नाश भी है। उसमें 'अपेक्षा-बुद्धि' के नाश से 'द्वित्व' का नाश किस
प्रकार होता है इसका संग्रह तीन श्लोकों में इस प्रकार किया गया है—
आदावपेक्षाबुद्ध्या हि नश्येदेकत्वजातिधीः ।
द्वित्वोदयसमं पश्चात् सा च तज्जातिबुद्धितः ॥ १ ॥
द्वित्वाख्यगुणधीकाले ततो द्वित्वं निवर्तते ।
अपेक्षाबुद्धिनाशेन द्रव्यधीजन्मकालतः ॥ २ ॥
गुणबुद्धिर्द्रव्यबुद्ध्या संस्कारोत्पत्तिकालत: ।
द्रव्यबुद्धिश्च संस्कारादिति नाशक्रमो मतः ॥ ३ ॥
ज्ञान क्षणिक है इसलिए एक समय में दो ज्ञान 'अविनश्यत्-अवस्था' में
नहीं रह सकते हैं। और न दो ज्ञानों की एक साथ उत्पत्ति हो सकती है।
इसलिए उत्पत्ति की प्रक्रिया में इन्द्रिय-सन्निकर्ष से द्वितीय क्षण में 'एकत्व-
सामान्य' ज्ञान की उत्पत्ति, तृतीय क्षण में 'अपेक्षा-बुद्धि' की उत्पत्ति, और
चतुर्थ क्षण में 'अपेक्षा-बुद्धि' से द्वित्व की उत्पत्ति दिखलाई थी। जिस चतुर्थ
क्षण में 'द्वित्व' की उत्पत्ति होगी उसी समय 'अपेक्षा-बुद्धि' से 'एकत्व सामान्य-
ज्ञान' का नाश होगा। उसके बाद पञ्चम क्षण में 'द्वित्व सामान्य-ज्ञान' उत्पन्न
होता है। उस 'द्वित्व-सामान्य-ज्ञान' से 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश होता है
जो अगले अर्थात् षष्ठ क्षण में होता है। उस षष्ठक्षण में 'द्वित्व-
गुणबुद्धि' उत्पन्न होती है। इस प्रकार 'द्वित्वगुणबुद्धि' के उत्पन्न
होने के समय अर्थात् षष्ठ क्षण में 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश होता है।
और अगले सप्तम क्षण में जब कि 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान उत्पन्न होता है
उसके पूर्व 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश हो चुकने से द्वित्व का नाश और 'द्वे द्रव्ये'
इस बुद्धि की उत्पत्ति, दोनों एक साथ सप्तम क्षण में होती हैं। और उसके
बाद अष्टम क्षण में संस्कार से 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान का भी नाश हो जाता है।
किस किस क्षण में किस किस की उत्पत्ति और विनाश होता है इसको इस
प्रकार दिखाया जा सकता है।