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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 330 में से

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पृष्ठ 270

द्रवत्व-स्नेह-शब्दाः ] प्रमेयनिरूपणम् २०५
संयोग-वेग-प्रयत्नाभावे सति गुरुत्वात् पतनमिति ।
१३-द्रवत्वमाद्यस्यन्दनासमवायिकारणम् । भूतेजोजलवृत्ति । भूतेज-
सोर्घृतादिसुवर्णयोरग्निसंयोगेन द्रवत्वं नैमित्तिकम्। जले नैसर्गिकं द्रवत्वम्।
१४-स्नेहश्चिकणता । जलमात्रवृत्तिः, कारणगुणपूर्वको, गुरुत्वादिवद्
यावद्द्रव्यभावी ।
१५-शब्दः श्रोत्रग्राह्यो गुणः । आकाशस्य विशेषगुणः ।
ननु कथमस्य श्रोत्रेण ग्रहणं यतो भेर्यादिदेशे शब्दो जायते श्रोत्रन्तु
पुरुषदेशेऽस्ति ।
[ वैशेषिक सूत्रकार ने ] कहा है संयोग, वेग और प्रयत्न [ ये तीनों पतन के
प्रतिबन्धक हैं ] इनके अभाव में 'गुरुत्व' के कारण पतन होता है ।
१३ [ गुरुत्व के समान ही ] आद्य स्यन्दन [ बहना-प्रवाहित होना ] का
असमवायि कारण 'द्रवत्व' [ नामक गुण ] है । पृथिवी, तेज और जल में रहने
वाला है। [ इन में से ] पार्थिव घृतादि, और तैजस सुवर्णं में अग्निसंयोग से
[ उत्पन्न होने वाला ] 'नैमित्तिक द्रवत्व' रहता है और जल में नैसर्गिक द्रवत्व
है । [ जल के नैसर्गिक द्रवत्व का भी, भोक्ता आत्मविशेष, के अदृष्टादि सहकारी
कारणों के अभाव से प्रतिरोध हो सकता है । ]
१४ 'स्नेह' [ गुण ] चिकनापन [ का नाम ] है । केवल जल में रहता है ।
कारणगुणपूर्वक [ अर्थात् पहिले कारणरूप द्वयणुकादि में और फिर उसके
कार्यभूत त्र्यणुकादि में उत्पन्न होता है ] और गुरुत्वादि के समान यावद्द्रव्य-
भावी [ अर्थात् जब तक वह जल रहता है तब तक उसमें स्नेह गुण रहता ] है।
१५ श्रोत्रग्राह्य गुण 'शब्द' [कहलाता] है । वह आकाश का विशेष गुण है।
[ प्रश्न ] इसका श्रोत्र से कैसे ग्रहण होता है क्योंकि शब्द तो भेरी आदि
देश में उत्पन्न होता है और श्रोत्र पुरुष देश में है । [ अर्थात् दोनों के भिन्न देशमें
होने से श्रोत्र से शब्द का ग्रहण नहीं हो सकता है ]
दूर देश में उत्पन्न होने वाला शब्द हमको किस प्रकार सुनाई देता है
इसका उपपादन के लिये आधुनिक विज्ञान के समान प्राचीन दार्शनिकों ने
भी शब्दधारा मानी है । न्याय शब्द की गति या उत्पत्ति के दो प्रकार माने
हैं । एक को 'वीचीतरङ्गन्याय' और दूसरे को 'कदम्बमुकुलन्याय' कहते हैं ।
इन दोनों का अन्तर यह है कि 'वीचीतरङ्गन्याय' में चारो दिशाओं में फैलने
वाली शब्द की एक लहरसी होती है । और 'कदम्बमुकुलन्याय' में चारो