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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 330 में से

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पृष्ठ 259

१६४ तर्कभाषा [ द्वित्वोत्पत्तिः
मेव। तच्च द्वयोः पिण्डयोः 'इदमेकम्' इत्यपेक्षाबुद्ध्या जन्यते ।
तत्र द्वौ पिण्डौ समवायिकारणे। पिण्डयोरेकत्वे असमवायिकारणे,
अपेक्षाबुद्धिर्निमित्तकारणम् । अपेक्षाबुद्धिनाशादेव द्वित्वविनाशः।
एवं त्रित्वायुत्पत्तिर्विज्ञेया ।
[ द्वित्व ] के दोनों पिण्ड 'समवायि-कारण' [ होते हैं ] दोनों पिण्डों में रहने वाले
एकत्व 'असमवायि-कारण' और 'अपेक्षा-बुद्धि' के विनाश से ही 'द्वित्व' का
विनाश होता है । इसी प्रकार त्रित्वादि की उत्पत्ति [ और विनाश ] भी समझनी
चाहिए ।
यहाँ द्वित्व की उत्पत्ति और विनाश की प्रक्रिया संक्षेप से दिखाई है ।
यह प्रक्रिया वैशेषिक दर्शन का एक मुख्य भाग है और प्रशस्तपाद भाष्य
आदि में बहुत विस्तार के साथ उसका विवेचन हुआ है। इसी से द्वित्व के
ज्ञान को वैशेषिक दर्शन के ज्ञान की कसौटी माना गया है—
'द्वित्वे च पाकजोत्पत्तौ विभागे च विभागजे ।
यस्य न स्खलिता बुद्धिस्तं वै वैशेषिकं विदुः ॥
प्रशस्तपाद में प्रदर्शित द्वित्वोत्पत्ति की प्रक्रिया में सात क्षण और उसके
विनाश की प्रक्रिया में नौ क्षण लगते हैं । द्वित्व की उत्पत्ति 'अपेक्षा-बुद्धि' से
और उसका विनाश 'अपेक्षा बुद्धि' के विनाश से होता है ।
द्वित्वोत्पत्ति की प्रक्रिया—
इसकी उत्पत्ति की प्रक्रिया का संग्रह एक श्लोक में इस प्रकार किया
गया है—
आदाविन्द्रियसन्निकर्षघटनादेकत्वसामान्यधी—
रैकत्वोभयगोचरा मतिरतो, द्वित्वं ततो जायते ।
द्वित्वत्वप्रमितिस्ततो नु, परतो द्वित्वप्रमाऽनन्तरं
द्वे द्रव्ये इति धीरियं निगदिता द्वित्वोदयप्रक्रिया ॥
अर्थात् प्रथम क्षण में इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष होता है । द्वितीय
क्षण में दोनों घटों में रहने वाले 'एकत्व-सामान्य' का ज्ञान होता है । तृतीय
क्षण में उन दोनों को ग्रहण करने वाली 'अयम् एकः अयम् एकः' इस प्रकार
की 'अपेक्षा-बुद्धि' उत्पन्न होती है । चतुर्थ क्षण में इस अपेक्षा-बुद्धि से द्वित्व
की उत्पत्ति होती है । पञ्चम में उस द्वित्व में रहने वाली 'द्वित्वत्व' जाति का
ग्रहण होता है । छठे क्षण में द्वित्व का ज्ञान होता है और सातवें क्षण में
१, २ सर्वदर्शनसंग्रह ।