तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० तर्कभाषा [ पृथक्त्वगुणः
७-पृथक्त्वम् पृथग्व्यवहारासाधारणं कारणम् । तच्च द्विविधम् ।
एकपृथक्त्वं द्विपृथक्त्वादिकञ्च । तत्राद्यं नित्यगतं नित्यमनित्यगतमनित्यम् ।
द्विपृथक्त्वादिकञ्चानित्यमेव ।
त्र्यणुक के परिमाण को यदि 'संख्यायोनि' परिमाण मानें तो उसे 'परिमाण-
योनि' परिमाण मानना होगा । अर्थात् उसकी उत्पत्ति द्वयणुक के अणु
परिमाण से माननी होगी । परन्तु अभी दिखा चुके हैं कि परिमाण के 'स्वस-
मानजातीय उत्कृष्ट परिमाण के आरम्भक' होने का नियम होने से द्वयणुक का
अणु परिमाण यदि त्र्यणुक में किसी परिमाण को उत्पन्न कर सकता है तो
केवल 'स्वसमानजातीय उत्कृष्ट' अर्थात् 'अणुतर' परिमाण को ही उत्पन्न कर
सकता है परन्तु 'अणुतर' परिमाण की उत्पत्ति सम्भव नहीं है। और त्र्यणुक
में महत् परिमाण रहता है । इसलिए त्र्यणुक का 'महत्' परिमाण 'परिमाण-
योनि' नहीं अपितु द्वयणुकनिष्ठ बहुत्व-संख्याजन्य होने से 'संख्यायोनि'
परिमाण है । शेष जन्य महत् परिमाण 'परिमाणयोनि' परिमाण होते हैं। जन्य
महत् परिमाण के अतिरिक्त नित्य महत् परिमाण भी होता है जिसे 'परम
महत्' परिमाण कहते हैं और वह आकाशादि विभु पदार्थों में रहता है।
यहाँ 'अणु' और 'महत्' दो प्रकार के परिमाणों का वर्णन किया है और
उन दोनों के नित्य तथा अनित्य दो दो भेद किए हैं। इनके अतिरिक्त 'दीर्घ'
और 'ह्रस्व' यह दो परिमाण और भी दिखाए हैं। यह 'दीर्घ' और 'ह्रस्व'
परिमाण जन्य 'महत्' तथा 'अणु' परिमाण के साथ ही रहते हैं। अर्थात्
जहाँ जन्य 'अणु' परिमाण रहता वहाँ 'ह्रस्व' और जहाँ जन्य 'महत्' परिमाण
रहता है वहाँ 'दीर्घ' व्यवहार होने से यह दोनों परिमाण अलग कोई विशेष
महत्त्व नहीं रखते हैं। इसी से उनका विशेष वर्णन यहाँ नहीं किया गया है
केवल नाम गिना दिए हैं।
७ पृथक्त्व-निरूपण—
पृथक् व्यवहार का असाधारण कारण 'पृथक्त्व' [ गुण कहलाता ] है ।
वह दो प्रकार का है 'एक-पृथक्त्व' और 'द्विपृथक्त्व' आदि । उनमें से पहिला
[ एकपृथक्त्व ] नित्य [ परमाणु आदि ] में रहने वाला नित्य और अनित्य
[ घटादि में ] रहनेवाला अनित्य होता है । द्विपृथक्त्वादि अनित्य ही होता है ।
संख्या के प्रकरण में एकत्व, द्वित्व का वर्णन हुआ था। वहाँ एकत्व, द्वित्वत्व
जाति थीं परन्तु यहाँ 'एकपृथक्त्व' और 'द्विपृथक्त्व' आदि जातियां नहीं है ।
उनका भेद केवल संख्या के सम्बन्ध से होता है। इसी से प्रशस्तपाद भाष्य
में लिखा है—