तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ तर्कभाषा [ परिमाणगुणः
६-परिमाणं मानव्यवहारासाधारणं कारणम् । तच्चतुर्विधम्, अणु,
महद्, दीर्घं, ह्रस्वञ्चेति । तत्र कार्यगतं परिमाणं संख्या-परिमाण-प्रचय-
योनि । तद्यथा द्वयणुकपरिमाणमीश्वरापेक्षाबुद्धिजन्यपरमाणुद्वित्वज-
नित्वात् संख्यायोनि, संख्याकारणकमित्यर्थः । त्र्यणुकपरिमाणञ्च
स्वाश्रयसमवायिकारणगतबहुत्वसंख्यायोनि । चतुरणुकादिपरिमाणन्तु
स्वाश्रयसमवायिकारणपरिमाणजन्यम् । तूलपिण्डपरिमाणन्तु स्वाश्रय-
नाश हो जायगा तब सप्तम क्षण में द्वित्व के न होने से 'द्वे द्रव्ये' यह
ज्ञान कैसे होगा ? यह शङ्का का आशय है । इसका उत्तर यह है कि 'अपेक्षा-
बुद्धि' से संस्कार नहीं बनता है । क्योंकि 'अपेक्षा-बुद्धि' समूहालम्बनात्मक
ज्ञान नहीं है । संस्कार केवल समूहालम्बनात्मक ज्ञान से उत्पन्न होता है ।
अतः 'अपेक्षा-बुद्धि' से संस्कार के उत्पन्न न होने से 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश
संस्कार से नहीं अपितु पञ्चम क्षण में उत्पन्न होने वाले 'द्वित्वसामान्यज्ञान' से
ही होता है । इसलिए 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश षष्ठ क्षण में और उससे द्वित्व
का नाश सप्तम क्षण में होता है । उसी के साथ 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान उत्पन्न हो
जाता है । अतएव उसमें कोई बाधा नहीं है ।
६-परिमाण-निरूपण—
मानव्यवहार का असाधारण कारण 'परिमाण' है । वह १ अणु, २
महद्, ३ दीर्घ और ४ ह्रस्व, भेद से चार प्रकार का है । कार्यगत चारो प्रकार
का [ परिमाण प्रकारान्तर से ] १ संख्यायोनि, २ परिमाणयोनि और ३ प्रचय-
योनि [ तीन प्रकार का ] होता है । जैसे द्वयणुक का [ जन्य ] अणु परिमाण
[ संख्यायोनि अर्थात् संख्याकारणक है क्योंकि वह ] ईश्वर की 'अपेक्षा-बुद्धि'
से जन्य परमाणुगत द्वित्व [ संख्या ] से जन्य होने के कारण 'संख्या-योनि'
अर्थात् संख्याकारणक है । और त्र्यणुक का [ महत् ] परिमाण अपने [ अर्थात्
त्र्यणुकगत परिमाण के ] आश्रय [ अर्थात् त्र्यणुक ] के समवायिकारण [ अर्थात्
द्वयणुक ] गत बहुत्व [ संख्याजन्य होने से ] 'संख्या-योनि' है । चतुरणुक आदि
का परिमाण तो अपने परिमाण के ] आश्रय [ चतुरणुक आदि ] के समवायि
कारण [ त्र्यणुक आदि ] के परिमाण से उत्पन्न होता है [ अत एव वह चतुरणुकादि
का परिमाण 'परिमाण-योनि' परिमाण है] । रूई के पिण्ड का परिमाण तो अपने
आश्रय [ तूल-पिण्ड ] के समवायिकारण रूप अवयवों के प्रशिथिल संयोगसे जन्य
है । [इसलिए वह रूई के पिण्ड का परिमाण 'प्रचय-योनि' कहलाता है। प्रचय का