तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 269, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंदिक्पिण्डसंयोगेनापरत्वं सन्निकृष्टे जन्यते । विप्रकृष्टबुद्ध्या तु परत्वं
विप्रकृष्टे जन्यते । सन्निकर्षस्तु पिण्डस्य द्रष्टुः शरीरापेक्षया संयुक्तसंयोगा-
ल्पीयस्त्वम् । तद्भूयस्त्वं विप्रकर्ष इति ।
कालकृतयोस्तु परत्वापरत्वयोरुत्पत्तिः कथ्यते । अनियतदिगव-
स्थितयोर्युवस्थविरपिण्डयोः 'अयमस्मादल्पतरकालसम्बद्धः' इत्यपेक्षाबु-
द्ध्यानुगृहीतेन कालपिण्डसंयोगेनासमवायिकारणेन यूनि, अपरत्वम् ।
'अयमस्माद् बहुतरकालेन सम्बद्धः' इति धिया स्थविरे परत्वम् ।
१२ गुरुत्वमाद्यपतनासमवायिकारणम् । पृथिवीजलवृत्ति । यथोक्तं-
ज्ञान से सहकृत दिक् और पिण्ड के संयोग से सन्निकृष्ट [पिण्ड] में 'अपरत्व'
उत्पन्न होता है । सन्निकर्ष [का अर्थ] तो देखने वाले के शरीर की अपेक्षा
से पिण्ड से संयुक्त [दिक्] के संयोग का न्यूनत्व है । और उस [संयुक्त संयोग]
का भूयस्त्व [आधिक्य का नाम] विप्रकर्ष है ।
कालकृत 'परत्व' और 'अपरत्व' की उत्पत्ति [का प्रकार] कहते हैं ।
अनियत दिशा में स्थित [दिक्-कृत में 'एकस्यां दिश्यवस्थितयोः पिण्डयोः' कहा
था उसके विपरीत यहां कालकृत में अनियत दिशा में स्थित कहा है] युवक
तथा वृद्ध [पुरुष] में यह [युवक] इस [वृद्ध] की अपेक्षा अल्पतर काल-
सम्बद्ध है इस 'अपेक्षा-बुद्धि' से अनुगृहीत काल और पिण्ड के संयोग रूप असम-
वायिकारण से युवक में 'अपरत्व' उत्पन्न होता है, और यह [वृद्ध] इस [युवक]
की अपेक्षा अधिकतर कालसम्बद्ध है इस 'अपेक्षा-बुद्धि' [से अनुगृहीत काल
पिण्ड संयोग] से वृद्ध पुरुष में 'परत्व' उत्पन्न होता है ।
परत्वापरत्व के विनाश के ६ कारण हैं । १ कहीं अपेक्षा बुद्धि के नाश
से । २ कहीं संयोग के नाश से ३ कहीं द्रव्य के नाश से, ४ कहीं द्रव्य-
बुद्धि के युगपद् विनाश से ५ कहीं द्रव्य और संयोग के नाश से, ६ कहीं संयोग
और अपेक्षाबुद्धि के नाश से, ७ और कहीं समवायिकारण, असमवायिकारण,
तथा निमित्त कारण तीनों के नाश से परत्वापरत्व का नाश हो सकता है । प्रशस्त
पादभाष्य में इन सबका सोदाहरणों से विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है ।
१३ गुरुत्व-निरूपण—
आद्य पतन का असमवायिकारण 'गुरुत्व' है [आद्य पद देने का अभिप्राय
यह है कि आगे द्वितीयादि क्षण में जो पतन होता है उसका कारण वेग संस्कार
होता है जिसका उल्लेख आगे किया जायगा । प्रथम बार जो पतन होता है केवल
उसका असमवायि कारण 'गुरुत्व' है] पृथिवी और जल में रहता है । जैसा कि