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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 330 में से

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पृष्ठ 256

गुणाः ] प्रमेयनिरूपणम् १६१
असत्स्वपि चक्षुरादिषु जायमानत्वात् । यद्वस्तु यद्विनैवोत्पद्यते तत्
तदतिरिक्तकरणसाध्यं, यथा कुठारं विनोत्पद्यमाना पचनक्रिया तद्-
तिरिक्तवह्न्यादिकरणसाध्या । यच्च करणं तन्मनः तच्च चक्षुराद्यतिरिक्तम् ।
तच्चाणुपरिमाणम् ।
द्रव्याण्युक्तानि ।
गुणाः
अथ गुणा उच्यन्ते । सामान्यवान् असमवायिकारणं स्पन्दात्मा
गुणः । स च द्रव्याश्रित एव । रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-संख्या-परिमाण-
पृथक्त्व-संयोग-विभाग-परत्व-अपरत्व-गुरुत्व-द्रवत्व-स्नेह-शब्द-बुद्धि-सुख-
दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्म-अधर्म-संस्कार-भेदाच्चतुर्विंशतिधा ।
१–तत्र रूपं चक्षुर्मात्रग्राह्यो विशेषगुणः । पृथिव्यादित्रयवृत्ति । तच्च
जो वस्तु जिस के बिना ही उत्पन्न होती है वह उससे भिन्न करण से उत्पन्न
होती है जैसे कुठार के बिना उत्पन्न होने वाली पचन क्रिया उससे भिन्न वह्नि
आदि करण से साध्य होती है । जो [ उसका ] करण है वह मन है और वह
चक्षु आदि [ बाह्येन्द्रियों ] से भिन्न है । और वह अणु परिमाण वाला है ।
द्रव्यों का वर्णन हो गया । [ इन नौ द्रव्यों में से किस में कितने गुण
रहते हैं । उसका संग्रह निम्न प्रकार किया है । ]
वायोर्नवैकादश तेजसो गुणा,-
जलक्षितिप्राणभृतां चतुर्दश ॥
दिक्कालयोः पञ्च षडेव चाम्बरे,
महेश्वरेऽष्टौ मनसस्तथैव च ॥
गुण-निरूपण—
अब गुणों का वर्णन करते हैं । सामान्यवान्, असमवायिकारण, कर्मभिन्न
गुण है । [ यह गुण का लक्षण है ] । और वह [गुण] द्रव्याश्रित ही [ रहता ]
है । १ रूप, २ रस, ३ गन्ध, ४ स्पर्श, ५ संख्या, ६ परिमाण, ७ पृथक्त्व,
८ संयोग, ९ विभाग, १० परत्व, ११ अपरत्व, १२ गुरुत्व, १३ द्रवत्व, १४
स्नेह, १५ शब्द, १६ बुद्धि, १७ सुख, १८ दुःख, १९ इच्छा, २० द्वेष, २१
प्रयत्न, २२ धर्म, २३ अधर्म और २४ संस्कार भेद से चौबीस प्रकार के हैं ।
१–रूप-निरूपण—
उनमें से चक्षुर्मात्रग्राह्य विशेष गुण 'रूप' है । [ संख्या, परिमाण आदि में
अतिव्याप्ति-वारण के लिए 'मात्र' तथा 'विशेष' पद का प्रयोग किया है । वह
१ न्याय-सिद्धान्त-मुक्तावली ।