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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 330 में से

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पृष्ठ 264

परिमाणगुणः ] प्रमेयनिरूपणम् १६६
समवायिकारणावयवानां प्रशिथिलसंयोगजन्यम् । परमाणुपरिमाण-
ञ्चाकाशादिगतं नित्यमेव ।
अर्थ शिथिल-अवयव-संयोग है ] परमाणु का परिमाण [ जो कि 'पारिमा-
ण्डल्य' नाम से भी कहा जाता है ] और आकाशादि का 'परममहत्' परिमाण
नित्य ही होता है ।
अणु परिमाण केवल दो जगह रहता है एक परमाणु में और दूसरा
द्व्यणुक में । इनमें से परमाणुगत अणु परिमाण नित्य ही होता है और
उसका दूसरा नाम 'पारिमाण्डल्य' भी है। 'पारिमाण्डल्यभिन्नानां कारणत्व-
मुदाहृतम्' इत्यादि में 'पारिमाण्डल्य' शब्द से परमाणु के नित्य अणु परिमाण
का ही ग्रहण होता है। द्व्यणुक में भी अणु परिमाण रहता है। परमाणु
का अथवा द्व्यणुक का अणु परिमाण किसी परिमाण का आरम्भक या
कारण नहीं होता है। क्योंकि परिमाण के विषय में यह नियम है कि परिमाण
'स्वसमानजातीय उत्कृष्ट परिमाण' का आरम्भक होता है। जैसे तन्तु का
महत् परिमाण है। उससे जो पट का परिमाण उत्पन्न होता है। वह तन्तु के
परिमाण की अपेक्षा उत्कृष्ट अर्थात् 'महत्तर' परिमाण है। तन्तु के महत् परिमाण
से उसके समानजातीय और उत्कृष्ट अर्थात् 'महत्तर' परिमाण की उत्पत्ति होती
है। इसी प्रकार यदि परमाणु के अणु परिमाण को द्व्यणुक के परिमाण का
कारण माना जाय तो वह अणु परिमाण द्व्यणुक में अपने समानजातीय
उत्कृष्ट अर्थात् 'अणुतर' परिमाण को उत्पन्न करने लगेगा। परन्तु अणु परिमाण
तो कहते ही उसको हैं जिसके आगे और 'अणुतर' कोई न हो। इसलिए अणु
परिमाण को द्व्यणुक के परिमाण का कारण मानना युक्ति-सङ्गत नहीं है।
इसीलिए द्व्यणुक के अणु परिमाण को 'संख्यायोनि' परिमाण माना है। अर्थात्
दो परमाणुओं में रहने वाली द्वित्व संख्या से द्व्यणुक का अणु परिमाण उत्पन्न
होता है। द्वित्व संख्या भी अनित्य और 'अपेक्षा-बुद्धि' से जन्य है। परन्तु
परमाणुओं के विषय में अस्मदादि की 'अपेक्षा-बुद्धि' काम नहीं दे सकती है
क्योंकि परमाणु अस्मदादि के अनुभव के विषय नहीं हैं। इसलिए परमाणुओं में
जो द्वित्व संख्या उत्पन्न होती है वह ईश्वर की 'अपेक्षा-बुद्धि' से उत्पन्न होती
है। और उस द्वित्व संख्या से द्व्यणुक में 'संख्यायोनि' अणु परिमाण
उत्पन्न होता है।
इसी प्रकार त्र्यणुक का 'महत् परिमाण' भी 'संख्यायोनि' परिमाण माना
गया है। क्योंकि वह 'परिमाणयोनि' अथवा 'प्रचययोनि' नहीं हो सकता है,