तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० तर्कभाषा [ दिगात्ममनो द्रव्याणि
वस्तुनस्तादवस्थ्यात् । सा चैकापि सवितुस्तत्तद्देशसंयोगोपाधिवशात्
प्राच्यादिसंज्ञां लभते ।
आत्मत्वाभिसम्बन्धवान् आत्मा । सुखदुःखादिवैचित्र्यात् प्रतिशरीरं
भिन्नः । स चोक्त एव । तस्य सामान्यगुणाः संख्यादयः पञ्च, बुद्ध्यादयो
नव विशेषगुणाः । नित्यत्व-विभुत्वे पूर्ववत् ।
मनस्त्वाभिसम्बन्धवन्मनः । अणु, आत्मसंयोगि, अन्तरिन्द्रियम्
सुखाद्युपलब्धिकारणं नित्यञ्च । संख्याद्यष्टगुणवत् । तत्संयोगेन बाह्येन्द्रिय-
मर्थग्राहकम् । अतएव सर्वोपलब्धिसाधनम् । तच्च न प्रत्यक्षम्, अपि त्वनु-
मानगम्यम् । तथाहि सुखाद्युपलब्धयश्चक्षुराद्यतिरिक्तकरणसाध्याः,
[ पर भी यह पूर्व में रखी है या पश्चिम में इस प्रकार का व्यवहार-भेद होने का
दिक् के अतिरिक्त और कोई कारण न होने ] से । और वह एक होने पर भी
सूर्य के उस उस देश के साथ संयोग रूप उपाधि के वश पूर्व [ पश्चिम ] आदि
[ नाना ] संज्ञा को प्राप्त होती है ।
'आत्मा' का निरूपण—
आत्मत्व [ जाति ] के सम्बन्ध वाला आत्मा है । [ प्रत्येक व्यक्ति के ] सुख-
दुःखादि के वैचित्र्य होने से [ वह ] प्रत्येक शरीर में भिन्न भिन्न है । और उसका
वर्णन कर ही चुके हैं । उसके संख्या आदि पांच [ १ संख्या, २ परिमाण,
३ पृथक्त्व, ४ संयोग, ५ विभाग ] सामान्य गुण, और बुद्धि आदि नौ [ १ बुद्धि,
२ सुख, ३ दुःख, ४ इच्छा, ५ द्वेष, ६ प्रयत्न, ७ धर्म, ८ अधर्म, और ९ संस्कार]
विशेष गुण [ सब मिला कर १४ गुण ] हैं । नित्यत्व और विभुत्व पूर्ववत्
[ अर्थात् आकाश के समान ] है ।
'मन' का निरूपण—
मनस्त्व [ जाति ] के सम्बन्ध वाला मन अणु [ परिमाण वाला ] आत्म-
संयोगी और अन्तः इन्द्रिय है। सुखादि की उपलब्धि में कारण, नित्य, संख्या आदि
आठ [१ संख्या, २ परिमाण, ३ पृथक्त्व ४ संयोग, ५ विभाग, ६ परत्व, ७ अपरत्व,
८ संस्कार] गुणों से युक्त है । उसके संयोग से [ ही ] बाह्येन्द्रिय [अपने २] अर्थ
की ग्राहक होती है। इस लिए [ सब इन्द्रियों के अपने २ अर्थ के ग्रहण में
सहायक होने से ] सब [ विषयों ] की उपलब्धि का साधन है। वह प्रत्यक्ष
नहीं अपितु अनुमानगम्य है । जैसे कि [ अनुमान वाक्य का प्रयोग इस प्रकार
है ] सुखादि का ज्ञान चक्षु आदि से अतिरिक्त करण से साध्य है चक्षु आदि के
[ व्यापार के अथवा इन्द्रियों के ] न होने पर भी [ सुखादि के ] उत्पन्न होने से ।