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तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

१७२ तर्कभाषा [ पृथिवीद्रव्यम्
पृथिव्यादि द्रव्याणि ।
तत्र पृथिवीत्वसामान्यवती पृथिवी काठिन्यकोमलत्वाद्यवयव-
संयोगविशेषेण युक्ता । घ्राण-शरीर-मृत्पिण्ड-पाषाण-वृक्षादिरूपा ।
रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-संयोग-विभाग-परत्व-अपर-
त्व-गुरुत्व-द्रवत्व-संस्कारवती । सा च द्विविधा, नित्याऽनित्या च । नित्या
परमाणुरूपा । अनित्या च कार्यरूपा । द्विविधायाः पृथिव्या रूप-
दर्शनों में हुई है। न्याय दर्शन में साध्यतम हेत्वाभास का निरूपण करते
हुए भाष्यकार ने लिखा है—
‘द्रव्यं छायेति साध्यं, गतिमत्त्वादिति हेतुः । साध्येनाविशिष्टः साधनी-
यत्वात् साध्यसमः । अयमप्यसिद्धत्वात् साध्यवत्प्रज्ञापयितव्यः । साध्यं तावदे-
तत् किं पुरुषवच्छायापि गच्छति, आहोस्वित्दावरकद्रव्ये संसर्पति, आवरणस-
न्तानादसन्निधिसन्तानोऽयं तेजसो गृह्यते इति । सर्पता खलु द्रव्येण यो यस्ते-
जोभाग आव्रियते तस्य तस्यासन्निधिरेव अविच्छिन्नो गृह्यते इति । आवरणन्तु
प्राप्तिप्रतिषेधः ।
यहां 'तम' शब्द का प्रयोग न करके 'छाया' शब्द का प्रयोग किया है ।
तेजोऽभाव का ही नाम तम या छाया है । उस छाया में गति नहीं रहती है
अपितु आवरक द्रव्य में गति होने से जहां जहां तेज का अभाव होता जाता है
वहां छाया चलती प्रतीत होती है यह सिद्ध किया है । इसी विषय की चर्चा
वैशेषिक दर्शन के पञ्चम अध्याय के द्वितीय आह्निक के निम्न दो सूत्रों में की
गई है—
द्रव्यगुणकर्मनिष्पत्तिवैधर्म्यादभावस्तमः ॥ १९ ॥
तेजसो द्रव्यान्तरेणावरणाच्च ॥ २० ॥
पृथिवी निरूपण—
उन [ पृथिवी आदि नौ द्रव्यों ] में [ से ] पृथिवीत्व जाति [ सामान्य ] से
युक्त पृथिवी [ कहलाती ] है । [ वह ] कठोर [ लोहा पत्थर आदि में ] और
कोमल [ रूई धूल आदि में ] आदि अवयव संयोग विशेष से युक्त [ होती ] है ।
[ वह शरीर, इन्द्रिय और विषय भेद से तीन प्रकार की होती है । ] घ्राण
[ इन्द्रिय ] शरीर [ मनुष्य आदि का ] और मिट्टी का पिण्ड पत्थर वृक्ष आदि
[ विषय ] रूप [ तीन भेद वाली ] है । १ रूप, २ रस, ३ गन्ध, ४ स्पर्श,
५ संख्या, ६ परिमाण, ७ पृथक्त्व, ८ संयोग, ९ विभाग, १० परत्व, ११
अपरत्व, १२ गुरुत्व, १३ द्रवत्व, १४ संस्कार [ इन चौदह गुणों से ] युक्त है ।
१ न्याय दर्शन वात्स्यायन भाष्य १, २, ४९ । २ वैशेषिक दर्शन ५, २, १९-२० ।

पाकजोत्पत्तिः ] प्रमेय निरूपणम् १७३
रस-गन्ध-स्पर्शा अनित्याः पाकजाश्च । पाकस्तु तेजः संयोगः, तेन
पृथिव्याः पूर्व रूपादयो नश्यन्त्यन्ये जन्यन्त इति पाकजाः ।
वह दो प्रकार की है नित्य और अनित्य । नित्य परमाणु रूप और अनित्य कार्यरूप
[ पृथिवी ] है । [ नित्य और अनित्य ] दोनों प्रकार की पृथिवी के रूप, रस,
गन्ध, स्पर्श, [ यह चारों गुण ] अनित्य और पाकज [ ही ] होते हैं ।
[ पाकज में ] पाक [ शब्द का अर्थ ] तो तेजःसामान्य [ अग्नि सामान्य ] का
संयोग है । उस [ तेज अर्थात् अग्नि ] के संयोग से पृथिवी [ पार्थिव घट आदि ]
के पूर्व [ श्याम ] रूप आदि [ कच्चे घड़े का श्याम रूप, विशेष प्रकार का
रस, गन्ध तथा स्पर्श ] नष्ट हो जाते हैं और [ उनके स्थान पर रक्त रूप, कठोर
स्पर्श, विशेष प्रकार का रस और गन्ध, आदि ] दूसरे [ गुण ] उत्पन्न हो जाते
हैं । [ इसीलिए पाक अर्थात् अग्नि संयोग से उत्पन्न होने के कारण वह 'पाकज'
गुण कहलाते हैं ] ।
यह जो द्रव्य आदि के निरूपण का प्रकरण चल रहा है वह वैशेषिक
सिद्धान्त के अनुसार लिखा जा रहा है यह बात पहिले कह चुके हैं। वैशेषिक
दर्शन में १ द्वित्व, २ पाकजोत्पत्ति, तथा ३ विभागजविभाग इन तीनों का
बड़ा विस्तृत विवेचन किया गया है। और उनके उत्पत्ति तथा विनाश की
बड़ी जटिल प्रक्रिया वैशेषिक के प्रशस्तपाद भाष्य में प्रदर्शित की गई है ।
इसलिए यह तीनों वैशेषिक दर्शन के मुख्य विषय समझे जाते हैं। और
वैशेषिक दर्शन के पाण्डित्य की परीक्षा उनके परिज्ञान के आधार पर ही होती
है । इसलिए यह श्लोक प्रसिद्ध है कि—
द्वित्वे १ च पाकजोत्पत्तौ विभागे च विभागजे ।
यस्य न स्खलिता बुद्धिस्तं वै वैशेषिकं विदुः ॥
पाकजोत्पत्ति—
इन तीन विषयों में से पाकजोत्पत्ति भी एक विषय है। इसलिए उसको
ठीक तरह से समझ लेना चाहिए । पृथ्वी में रहने वाले रूप, रस, गन्ध तथा
स्पर्श यह चार ही गुण 'पाकज' अर्थात् अग्नि संयोग से उत्पन्न माने जाते हैं ।
कच्चा फल हरा होता है पक कर वह पीला या लाल आदि हो जाता है । कच्चे
फल के रूप, रस, गन्ध तथा स्पर्श से पके फल के रूप, रस, गन्ध तथा स्पर्श
सब ही भिन्न होते हैं। फलों के पकने का कारण गर्मी अथवा तेजःसंयोग
ही है यह स्पष्ट है। अतएव पके फल में जो विशेष रूप, रस, गन्ध तथा स्पर्श
१ सर्वदर्शनसंग्रह पृ० २२० ।

१७४ तर्कभाषा [ पीलूपाकपिठरपाकौ
होते हैं वे पाक अर्थात् तेजःसंयोग से ही उत्पन्न होते हैं। उनके पहिले रूप,
रस आदि नष्ट होकर पाक से उनमें नए रूप, रस आदि उत्पन्न होते हैं।
इसलिए वे सब 'पाकज' कहलाते हैं। यह 'पाकज' गुण केवल पृथ्वी में ही
रहते हैं अन्यत्र नहीं। यह 'पाकज' पद की साधारण व्याख्या हुई ।
'पीलूपाक' तथा 'पिठरपाक'—
कच्चा घड़ा जब 'अवाँ' में पकाया जाता है तब उसका श्याम रूप नष्ट
होकर अग्नि संयोग से उसमें रक्त रूप उत्पन्न हो जाता है। इसलिए घट के
रूप आदि चारों गुण 'पाकज' गुण हैं। परन्तु श्यामरूप नष्ट होकर रक्त रूप की
उत्पत्ति किस प्रकार होती है उसकी प्रक्रिया में न्याय तथा वैशेषिक दर्शन में
थोड़ा भेद पाया जाता है। और इस विषय में दोनों के सिद्धान्त अलग अलग
नाम से प्रसिद्ध हैं। पाकजोत्पत्ति के विषय में वैशेषिक दर्शन का सिद्धान्त
'पीलूपाक' कहलाता है। 'पीलू' शब्द का अर्थ परमाणु है। 'पीलूपाक' अर्थात्
परमाणुओं का पाक । वैशेषिक के मतानुसार परमाणुओं का पाक होता है।
'पाकज' रूप रस आदि गुण परमाणुओं में पैदा होते हैं। पिण्ड रूप घटादि में
नहीं। इसके विपरीत नैयायिकों के सिद्धान्त में पाकज गुणों की उत्पत्ति
परमाणुओं में नहीं अपितु घट के सम्पूर्ण 'पिण्ड' में होती है : इसलिए न्याय
का सिद्धान्त 'पिठरपाक' नाम से प्रसिद्ध है। 'पिठर' शब्द का अर्थ है पिण्ड
अर्थात् न्याय के मत में पाक परमाणुओं का नहीं किन्तु सम्पूर्ण घट पिण्ड का
होता है। इसलिए न्याय के सिद्धान्त को 'पिठरपाक' कहते हैं।
वैशेषिक का पीलुपाक—
वैशेषिक दर्शन के पीलुपाक' सिद्धान्त के अनुसार 'पाकज' गुण परमाणुओं
में उत्पन्न होते हैं अविभक्त पूर्ण घट में नहीं। घड़े के परमाणुओं में श्याम
रूप का नाश होकर रक्त रूप की उत्पत्ति हो सके इसके लिए प्रत्येक परमाणु
के बीच अग्नि का प्रवेश आवश्यक है। अतएव वैशेषिक की प्रक्रिया में
पकते समय घड़े के परमाणुओं के घटारम्भक संयोग का नाश होकर
उसके परमाणु अलग अलग हो जाते हैं। तब उन विभक्त परमाणुओं में
श्याम रूप का नाश होकर नए रक्त रूप की उत्पत्ति होती है। और
फिर वह रक्त परमाणु मिलकर घट को पुनः निर्मित करते हैं। इस प्रक्रिया के
अनुसार घड़े के पकते समय 'आँवाँ' के भीतर एक बार कच्चे घड़े के सब
परमाणु अलग अलग हो जाते हैं। अर्थात् घट का नाश हो जाता है। फिर
उन विभक्त परमाणुओं में 'पाकज' रक्त रूप की उत्पत्ति हो जानेके बाद, प्राणियों

पीलुपाकः ] प्रमेयनिरूपणम् १७५
के अदृष्ट के द्वारा फिर उन रक्त परमाणुओं के संयोग से रक्त घट की उत्पत्ति
होती है। इसी का नाम 'पीलुपाक' अर्थात् परमाणुओं का पाक है। इस
सिद्धान्त में जो घड़े का नाश और उत्पत्ति मानी है उसका अर्थ केवल इतना
ही है कि जब घड़ा अग्नि में रखा जाता है तब उसके परमाणुओं के बीच किसी
प्रकार का अन्तर नहीं होता है, वह एक दूसरे से बिल्कुल संयुक्त होते हैं।
परन्तु जब उनके बीच अग्नि का प्रवेश होता है, तो उनमें कुछ थोड़ा सा
अन्तर हो जाता है जिसके कारण उनके बीच अग्नि को प्रवेश करने का अवसर
मिल जाता है। इसी अन्तर या विभाग को घट का नाश कहा जा सकता है।
और रक्त रूप उत्पन्न होने के बाद घड़े के ठण्डे होते समय जैसे जैसे अग्नि
उनके बीच से निकलता जाता है वह परमाणु फिर पूर्ववत् मिलते जाते हैं।
इसी पुनः संयोग के द्वारा घट का पुनर्निर्माण होता है। यही वैशेषिक दर्शन की
'पीलुपाक' की प्रक्रिया है। इस 'पीलुपाक' सिद्धान्त का उपपादन वैशेषिक
दर्शन के प्रशस्तपाद भाष्य में इस प्रकार किया गया है—
पार्थिवपरमाणुरूपादीनां पाकजोत्पत्तिविधानम् । घटादेरामद्रव्यस्याग्निना
सम्बद्धस्याग्न्यभिघातान्नोदनाद्वा तदारम्भकेष्वणुषु कर्माण्युत्पद्यन्ते । तेभ्यो विभागाः,
विभागेभ्यः संयोगविनाशाः, संयोगविनाशेभ्यश्च कार्यद्रव्यं विनश्यति । तस्मिन्
विनष्टे स्वतन्त्रेषु अग्निसंयोगादौष्ण्यापेक्षाच्छ्यामादीनां विनाशः । पुनरन्यस्मा-
दग्निसंयोगादौष्ण्यापेक्षात् पाकजा जायन्ते । तदनन्तरं भोगिनामदृष्टापेक्षादात्मा-
णूसंयोगात् पाकजेष्वणुषु कर्मोत्पत्तौ तेषां परस्परसंयोगात् द्व्यणुकादिक्रमेण
कार्यद्रव्यमुत्पद्यते । तत्र च कारणगुणक्रमेण रूपाद्युत्पत्तिः ।
न च कार्यद्रव्य एव रूपाद्युत्पत्तिर्विनाशो वा सम्भवति, सर्वावयवेषु अन्त-
र्बहिश्च वर्तमानस्याग्निना व्याप्त्यभावात् । अनुप्रवेशादपि च व्याप्तिर्न
सम्भवति, कार्यद्रव्यविनाशादिति¹ ।
इन दोनों अनुच्छेदों में से पहिले अनुच्छेद में 'पीलुपाक' के अनुसार
पाकजोत्पत्ति की प्रक्रिया दिखाई है और दूसरे अनुच्छेद में न्याय दर्शन के
'पिठरपाकवाद' का खण्डन किया है। कार्यद्रव्य अर्थात् घट के पिण्ड में ही पाकज
रूप आदि गुणों का उत्पत्ति और विनाश सम्भव नहीं है। क्योंकि यदि घट का
पिण्ड अग्नि में ज्यों का त्यों बना रहे, तो उसके भीतर के अवयवों में अग्नि का
प्रवेश नहीं हो सकेगा इसलिए भीतर के अवयव रक्त नहीं होने चाहिए। परन्तु
घड़े के खप्पड़ को तोड़ने पर उसके भीतर के अवयव भी लाल दिखाई देते
१ वैशेषिक दर्शन, प्रशस्तपाद भाष्य पृ०-४६-४७ ।

१७६ तर्कभाषा [ आपो द्रव्यम्
अप्त्वामान्ययुक्ता आपः । रसनेन्द्रियशरीरसरित्समुद्रहिमकरका-
दिरूपाः। गन्धवर्जस्नेहयुक्तपूर्वोक्तगुणवत्यः। नित्या अनित्याश्च। नित्यानां
रूपादयो नित्या एव । अनित्यानां रूपादयोऽनित्या एव ।
हैं । घड़े के अविकल रूप में बने रहने से भीतर के अवयवों में अग्नि का
सम्बन्ध नहीं हो सकता है । इसलिए उसमें श्याम रूप का नाश और रक्त रूप
की उत्पत्ति भी नहीं हो सकती है । यदि यह कहा जाय कि परमाणुओं के
भीतर अग्नि का प्रवेश हो जाने से घट में ही पाकज गुणों की उत्पत्ति हो सकती
है, तो ‘पीलूपाकवादी’ इसी को घटादि कार्य द्रव्य का नाश कहता है । क्योंकि
पहिले से घट के परमाणुओं में तनिक भी अन्तर या अवकाश नहीं है । बाद में
अग्नि का संयोग होने पर अग्नि के ताप से प्रत्येक वस्तु फैलती है, विज्ञान के
इस सिद्धान्त के अनुसार घटादि के अवयवों में भी फैलाव होता है अर्थात् उसके
संयुक्त परमाणुओं में थोड़ा सा विभाग हो जाता है । ‘पीलूपाकवादी’ वैशेषिक
इस से ही द्रव्यारम्भक संयोग का नाश, और उसके कारण, घट आदि द्रव्य का
नाश मान लेता है ।
न्याय का पिठरपाक—
पाक के पूर्व, घट के परमाणुओं में इतना अन्तर नहीं रहता है कि उनके
भीतर अग्नि प्रवेश कर सके । जब अग्नि के संयोग से वह परमाणु इतने
विभक्त हो जाते हैं कि उनमें अग्नि को प्रवेश करने का अवसर मिल जाता है
तो वैशेषिक मत में घट के अवयवों का यह विभाग ही घट का विनाश कहलाता
है । इसलिए ‘पिठर’ अर्थात् पिण्ड में नहीं, अपितु ‘पीलू’ अर्थात् परमाणु में ही
पाक होता है । यही वैशेषिक का ‘पीलूपाक’ सिद्धान्त हुआ ।
परन्तु ‘पिठरपाकवादी’ नैयायिक परमाणुओंके बीच अग्नि का प्रवेश मानने
पर भी उसे द्रव्य का नाश नहीं कहता है । उसे द्रव्यनाश कहने से उत्पत्ति
और विनाश की प्रक्रिया का गौरव व्यर्थ ही मानना होता है । अतः वह ‘पिठर’
अर्थात् ‘पिण्ड’ में ही पाक मानता है । यही इन दोनों का भेद है ।
आपो निरूपण—
अप्त्व जाति से युक्त आप् [ जल ] है । रसनेन्द्रिय, [ वरुणलोक में प्रसिद्ध
जलीय ] शरीर, और सरित्, समुद्र, हिम [ बर्फ ] और ओला आदि रूप
[ विषय ] है । [ पृथिवी के जो १४ गुण गिनाए थे उनमें से गन्ध को हटा कर
उसके स्थान पर स्नेह को रख देने से ] गन्ध रहित और स्नेह युक्त पूर्वोक्त
चौदह गुणों [ अर्थात् १ रूप २ रस, ३ स्नेह, ४ स्पर्श, ५ संख्या, ६ परिमाण,
७ पृथक्त्व, ८ संयोग, ९ विभाग, १० परत्व, ११ अपरत्व, १२ गुरुत्व, १३ द्रवत्व

चतुर्विधम् ।->तच्चतुर्विधम् । १ उद्भूतरूपस्पर्शम् । २ अनुद्भूतरूपस्पर्शम् । ३ अनुद्भूतरूप- और १४ संस्कार ] से युक्त हैं । [ वह ] नित्य और अनित्य [ दो प्रकार के ] है । [ नित्य परमाणु रूप और अनित्य कार्य रूप होते हैं ] । नित्य [ अर्थात् परमाणु रूप ] के रूपादि गुण नित्य ही [ होते ] हैं और अनित्य [ कार्य रूप जलों ] के रूपादि गुण [ भी ] अनित्य ही होते हैं । तेजोनिरूपण— तेजस्त्व [ अग्नित्व ] सामान्य से युक्त तेज [ होता ] है । [ वह भी शरीर, इन्द्रिय और विषय भेद से ती प्रकार का होता है । ] चक्षु [ इन्द्रिय ], शरीर [ सूर्यलोक-वासियों के शरीर तैजस शरीर होते हैं ] और सूर्य, सुवर्ण, अग्नि, विद्युत् आदि [ विषय रूप ] भेदों से युक्त होता है । १ रूप, २ स्पर्श, ३ संख्या, ४ परिमाण, ५ पृथक्त्व, ६ संयोग, ७ विभाग, ८ परत्व, ९ अपरत्व, १० द्रवत्व,

१७८ तर्कभाषा [ तेजोद्रव्यम्
मुद्भूतस्पर्शम् । ४ उद्भूतरूपमनुद्भूतस्पर्शञ्चेति ।
उद्भूतरूपस्पर्शं यथा सौरादितेजः पिण्डीभूतं तेजो वह्न्यादिकम् ।
४ उद्भूतरूप और अनुद्भूतस्पर्श [जैसे प्रदीपप्रभामण्डल । प्रदीप का प्रकाश
तो बहुत दूर से दिखाई देता है अतएव उसका भास्वर शुक्ल रूप तो उद्भूत है
परन्तु उष्ण स्पर्श अनुभव में न आने से अनुद्भूत है । ]
[ आगे ग्रन्थकार इन चारों भेदों के उदाहरण देते हैं । ]
१ उद्भूतरूपस्पर्श [ तेज का उदाहरण ] जैसे सूर्य आदि का तेज अथवा
पुञ्जीकृत अग्नि आदि । [ इनका भास्वरशुक्ल रूप और उष्ण स्पर्श दोनों उद्भूत
अर्थात् अनुभव योग्य हैं ]
सुवर्ण का तेजस्त्व—
तेज के विषय-रूप में 'सवितृसुवर्णवह्निविद्युदादिप्रभेदम्' कह कर तेज
या अग्नि के जो चार भेद दिखलाए हैं उनमें 'सुवर्ण' भी एक है । मीमांसक
लोग सुवर्ण को पृथिवी आदि नौ द्रव्यों से भिन्न अलग द्रव्य मानते हैं ।
आधुनिक वैज्ञानिक भी सुवर्ण को एक अलग तत्त्व स्वीकार करते हैं । परन्तु
न्याय और वैशेषिक में सुवर्ण को तेज के अन्तर्गत माना है । अर्थात् वह तेज
का विशेष भेद है । सुवर्ण को तैजस पदार्थ मानने में उनकी युक्ति यह है कि
शुद्ध सुवर्ण को किसी ताप मान तक गरम किया जाय वह जल आदि के समान
बाष्प आदि के रूप में उड़ेगा नहीं बना ही रहेगा । इसलिए वह तेजोरूप
अथवा तैजस पदार्थ है । उनका अनुमान वाक्य इस प्रकार बनता है । 'सुवर्णं
तैजसम् असति प्रतिबन्धके अत्यन्तानलसंयोगे सत्यप्यनुच्छिद्यमानजन्यद्र-
वत्वात् यन्नैवं तन्नैवं यथा पृथिवी' । अर्थात् प्रतिबन्धक के अभाव में अत्यन्ता-
नल संयोग होने पर भी अनुच्छिद्यमानजन्य द्रवत्व युक्त होने से सुवर्ण तैजस
है । आयुर्वेद में सुवर्ण को भस्म करने की विधियां दी हैं परन्तु वह औषधादि
प्रतिबन्धक का योग होता ही है । द्रवत्व प्रतिबन्धक किसी औषधादि के प्रयोग
के बिना शुद्ध सुवर्ण का द्रवत्व किसी भी तापमान पर नष्ट नहीं होता ।
इसलिए सुवर्ण तैजस द्रव्य है । यह नैयायिकों का मत है ।
सुवर्ण का पञ्चम प्रकारत्व—
अब प्रश्न यह होता है कि सुवर्ण यदि तैजस द्रव्य है तो उसमें तेज का
भास्वर शुक्ल रूप और उष्णस्पर्श अनुभव क्यों नहीं होता ! सुवर्ण का रूप,
भास्वर शुक्ल के स्थान पर पीत, और उसका स्पर्श उष्णके स्थान पर अनुष्णाशीत
क्यों उपलब्ध होता है ? इसलिए नैयायिकों ने सुवर्ण को 'उद्भूताभिभूतरूपस्पर्श'

सुवर्णं तैजसम् ] प्रमेयनिरूपणम् १७६
सुवर्णन्तु उद्भूताभिभूतरूपस्पर्शम् । तदनुद्भूतरूपत्वेऽचाक्षुषं
स्यात्, अनुद्भूतस्पर्शत्वे त्वचा न गृह्येत । अभिभवस्तु बलवत्सजाती-
येन पार्थिवरूपेण स्पर्शेन च कृतः ।
अनुद्भूतरूपस्पर्शं तेजो यथा चक्षुरिन्द्रियम् । अनुद्भूतरूप-
मुद्भूतस्पर्शं यथा तप्तवारिस्थं तेजः । उद्भूतरूपमनुद्भूतस्पर्शं यथा
प्रदीपप्रभामण्डलम् ।
माना है । अर्थात् उसके उष्णस्पर्श और भास्वर शुक्ल रूप को विजातीय और
बलवद् पार्थिव रूप तथा स्पर्श ने अभिभूत कर दिया है । इसलिये उसमें
पीतरूप और अनुष्णाशीतस्पर्श प्रतीत होता है । उसमें रूप अथवा स्पर्श में से
किसी को भी अनुद्भूत नहीं मान सकते हैं क्योंकि रूप के अनुद्भूत होने पर
उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष न होगा और स्पर्श के अनुद्भूत होने पर त्वचा से उसका
ग्रहण सम्भव नहीं होगा । इसलिए रूप तथा स्पर्श के अनुद्भूतत्व के आधार
पर तेज के जो चार भेद ऊपर दिखाए हैं उन चारों से भिन्न सुवर्ण एक अलग
ही पांचवां भेद 'उद्भूताभिभूतरूपस्पर्श' है। यही बात आगे कहते हैं ।
सुवर्णं तो [ पूर्वोक्त चारो भेदों में से भिन्न ] 'उद्भूताभिभूतरूपस्पर्श' [पांचवां
भेद ] है । [ क्योंकि ] अनुद्भूतरूप होने पर वह अचाक्षुष हो जायगा और
अनुद्भूतस्पर्श होने पर त्वचा से गृहीत नहीं होगा । [ इसलिए उसके रूप और
स्पर्श दोनों को उद्भूत मानना होगा । परन्तु उसमें अग्नि के भास्वर शुक्ल रूप
तथा उष्णस्पर्श के स्थान पर पीत रूप और अनुष्णाशीत स्पर्श उपलब्ध होता है
इस कारण उसको 'उद्भूताभिभूतरूपस्पर्श' पांचवां भेद मानना चाहिए । उसके
रूप और स्पर्श का ] अभिभव तो बलवान् सजातीय पार्थिव रूप तथा स्पर्श ने
कर दिया है । [ इसलिए पार्थिव रूप और स्पर्श से अभिभूत होने से पीत रूप
और अनुष्णाशीतस्पर्श सुवर्ण में उपलब्ध होता है ] ।
२ अनुद्भूतरूपस्पर्श तेज [ का उदाहरण ] जैसे चक्षुः इन्द्रिय । [ चक्षुः
तैजस इन्द्रिय है । परन्तु उस में तेज का भास्वरशुक्ल रूप तथा उष्णस्पर्श दोनों
अनुभव नहीं होते हैं ] ।
३ अनुद्भूतरूप और उद्भूतस्पर्श [ वाले तेज का उदाहरण ] जैसे गरम
पानी में स्थित तेज [ उस में उष्णस्पर्श तो अनुभव होता है परन्तु भास्वर शुक्ल
रूप अनुभव नहीं होता है ] ।
४ उद्भूतरूप और अनुद्भूत स्पर्श [ वाले तेज का उदाहरण ] जैसे, दीपक
का प्रकाश-मण्डल । उसका भास्वर शुक्ल रूप तो दिखाई देता है परन्तु उष्ण-
स्पर्श अधिक दूर पर अनुभव नहीं होता है ] ।

१८० तर्कभाषा [ वायुद्रव्यम्
वायुत्वाभिसम्बन्धवान् वायुः । त्वगिन्द्रियप्राणवातादिप्रभेदः । स्पर्श-
संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-संयोग-विभाग-परत्व-अपरत्व-वेगवान् । स च
स्पर्शाद्यनुमेयः । तथाहि योऽयं वायौ वाति, अनुष्णाशीतस्पर्श उपलभ्यते
स गुणत्वाद् गुणिनमन्तरेणानुपपद्यमानो गुणिनमनुमापयति । गुणी च
वायुरेव । पृथिव्याद्यनुपलब्धेः । वायुपृथिवीव्यतिरेकेण अनुष्णाशीत-
स्पर्शाभावात् । स च द्विविधो नित्याऽनित्यभेदात् । नित्यः परमाणुरूपो
वायुः, अनित्यः कार्यरूप एव ।
वायु-निरूपण—
वायुत्व जाति के सम्बन्ध से युक्त वायु [ कहलाता ] है । त्वगिन्द्रिय, प्राण,
तथा वात आदि [ विषय ] भेद से युक्त है। १ स्पर्श, २ संख्या, ३ परिमाण,
४ पृथक्त्व, ५ संयोग, ६ विभाग, ७ परत्व, ८ अपरत्व और ९ वेग [ इन नौ
गुणों ] से युक्त है । और वह स्पर्शादि से अनुमेय है। जैसे कि वायु के चलने
पर जो यह अनुष्ण अशीत स्पर्श प्रतीत होता है वह गुण होने से गुणी के बिना
अनुपपद्यमान होकर गुणी का अनुमान कराता है । और [ वह ] गुणी वायु
ही है । [ अनुष्णाशीतस्पर्श के अनुभव के स्थल में ] पृथिवी आदि की उपलब्धि
न होने से । पृथिवी और वायु के बिना अनुष्णाशीत स्पर्श का अभाव होने से ।
[ हवा चलते समय जो स्पर्श का अनुभव होता है उसका आश्रय वायु ही है ] ।
और वह नित्य तथा अनित्य भेद से दो प्रकार का होता है । परमाणु रूप वायु
नित्य है और कार्यरूप वायु अनित्य है ।
अर्थात् नौ द्रव्यों में से १ आकाश, २ काल, ३ दिक्, ४ आत्मा, और
५ मन इन पांच द्रव्यों में तो स्पर्श रहता ही नहीं है । इसलिए १ पृथ्वी,
२ जल, ३ वायु और ४ अग्नि इन चार द्रव्यों में ही स्पर्श रहता है । उन में
भी अग्नि का स्पर्श उष्ण और जल का स्पर्श शीत होता है । पृथ्वी और वायु
इन दोनों का अनुष्ण-अशीत स्पर्श होता है । वायु के चलने पर जो अनुष्णा-
शीत स्पर्श अनुभव होता है वह अनुमान होता है। इस प्रकार परिशेषानुमान
से वायु की सिद्धि होती है ।
स्थूल भूतों की उत्पत्ति का क्रम—
इस प्रकार १ पृथ्वी, २ अप्, ३ तेज और ४ वायु इन चार द्रव्यों का निरू-
पण हो गया । आगे उनकी उत्पत्ति तथा विनाश का क्रम कहते हैं । न्याय
और वैशेषिक के मत में सबसे सूक्ष्म और नित्य प्राकृतिक तत्त्व परमाणु है ।

संशय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रहस्थान व उपसंहार

उत्पत्तिक्रमः ] प्रमेयनिरूपणम् १८१
कार्यद्रव्याणामुत्पत्तिविनाशक्रमः
तत्र पृथिव्यादीनां चतुर्णां कार्यद्रव्याणामुत्पत्तिविनाशक्रमः कथ्यते
द्वयोः परमाण्वोः क्रियया संयोगे सति द्व्यणुकमुत्पद्यते। तस्य परमाणू
समवायिकारणं, तत्संयोगोऽसमवायिकारणम्, अदृष्टादि निमित्तकारणम् ।
ततो द्व्यणुकानां त्रयाणां क्रियया संयोगे सति त्र्यणुकमुत्पद्यते । तस्य
द्व्यणुकानि समवायिकारणं, शेषं पूर्ववत् । एवं त्र्यणुकैश्चतुर्भिश्चतुरणुकम् ।
चतुरणुकैरपरं स्थूलतरं, स्थूलतरैरपरं स्थूलतमम् । एवं क्रमेण महापृथिवी,
महत्य आपो, महत् तेजो, महांश्च वायुरुत्पद्यते । कार्यगता रूपादयः
स्वाश्रयसमवायिकारणगतेभ्यो रूपादिभ्यो जायन्ते । 'कारणगुणा हि कार्य-
गुणानारभन्ते' इति न्यायात् ।
इन परमाणुओं से ही सारे जगत् की उत्पत्ति होती है। इसलिए पहिले इन
परमाणुओं से इस स्थूल जगत् की उत्पत्ति किस क्रम से होती है यह
दिखलाते हैं ।
उनमें पृथिवी आदि चार कार्यरूप द्रव्यों के उत्पत्ति और विनाश का क्रम
वर्णन करते हैं । दो परमाणुओ में [ परमात्मा के संकल्प और प्राणियों के अदृष्ट
के कारण होने वाली ] क्रिया से संयोग होने पर [ दोनों परमाणुओं से मिल कर
एक ] द्व्यणुक उत्पन्न होता है। दोनों परमाणु उस [ द्व्यणुक ] के समवायि-
कारण [ होते हैं ], उन [ दोनों परमाणुओं ] का संयोग असमवायि कारण, और
अदृष्टादि निमित्त कारण होता है । उसके बाद तीन द्व्यणुकों का [ईश्वर के संकल्प
तथा अदृष्ट आदि से जन्य] क्रिया से संयोग होने पर [ तीन द्व्यणुकों से मिलकर
एक] त्र्यणुक की उत्पत्ति होती है। तीनों द्व्यणुक उस [त्र्यणुक] के समवायिकारण
होते हैं और शेष पूर्ववत् [ अर्थात् तीनों द्व्यणुकों का संयोग त्र्यणुक का असम-
वायिकारण तथा अदृष्टादि निमित्त कारणं होता ] है। इसी प्रकार चार त्र्यणुकों
से चतुरणुक, चतुरणुकों से अन्य स्थूलतर, और स्थूलतरों से अन्य स्थूलतम
[ पदार्थ ] उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार [ महा ] स्थूल पृथिवी, [महत्] स्थूल जल,
[ महत् ] स्थूल तेज, और [ महान् ] स्थूल वायु उत्पन्न होता है । कार्य [ पृथिवी
आदि ] में रहने वाले रूप आदि [ गुण ] अपने [ रूपादि के ] आश्रय [ भूत
द्व्यणुकादि ] के समवायिकारण [परमाणु आदि] में रहने वाले रूप आदि [गुणों]
से उत्पन्न होते हैं। 'कारण के गुण कार्य के गुणों को उत्पन्न करते हैं' इस नियम
के होने से ।
कार्य द्रव्यों के विनाश का क्रम—
आगे विनाश का क्रम कहते हैं । कार्य के विनाश के दो प्रकार हैं ।

१८२ तर्कभाषा [ विनाशक्रमः
इत्थमुत्पन्नस्य रूपादिमतः कार्यद्रव्यस्य घटादेरवयवेषु कपालादिषु
नोदनादभिघाताद्वा क्रिया जायते । तया विभागस्तेनावयव्यारम्भक-
स्यासमवायिकारणीभूतस्य संयोगस्य नाशः क्रियते, ततः कार्यद्रव्यस्य
घटादेरवयविनो नाशः। एतेनावयव्यारम्भकासमवायिकारणनाशे द्रव्य-
नाशो दर्शितः ।
क्वचित् समवायिकारणनाशे द्रव्यनाशो यथा पूर्वोक्तस्यैव पृथिव्यादेः
संहारे सञ्जिहीर्षोर्महेश्वरस्य सञ्जिहीर्षा जायते । ततो द्व्यणुकारम्भकेषु
परमाणुषु क्रिया, तया विभागः, ततस्तयोः संयोगनाशे सति द्व्यणुकेषु
एक समवायिकारण के नाश से कार्य का नाश और दूसरा असमवायिकारण
के नाश से कार्य का नाश। साधारणतः घट आदि कार्यों का नाश उसके
असमवायिकारण अर्थात् अवयव-संयोग के विनाश से ही होता है। परन्तु
प्रलय काल में संसार का नाश प्रायः समवायिकारण के नाश से होता है। उस
समय परमात्मा की संहारेच्छा से विश्व के कारणभूत परमाणुओं में क्रिया
उत्पन्न होती है। उससे द्व्यणुकों के बनाने वाले संयुक्त परमाणुओं में विभाग,
और विभाग से द्व्यणुकारम्भक संयोग का नाश हो जाने से द्व्यणुकों का नाश
तो परमाणु-संयोग रूप असमवायिकारण के नाश से होता है। परन्तु द्व्यणुक
के बाद जो त्र्यणुक आदि का नाश होता है वह समवायिकारण रूप द्व्यणुक
आदि के नाश से होता है। इसलिए समवायिकारण और असमवायिकारण के
नाश से कार्य का नाश होने से कार्य का नाश की दो प्रकार की प्रक्रियाएँ
आगे दिखाते हैं। इनमें पहिले असमवायिकारण के नाश से कार्यनाश की
प्रक्रिया दिखलाते हैं।
इस प्रकार उत्पन्न हुए रूपादिमान् कार्यद्रव्य घट आदि के अवयव रूप कपाल
आदि में नोदन [ चेतन-प्रदत्त प्रेरणा ] अथवा अभिघात [ अचेतन पदार्थ के
साथ संघर्ष ] से क्रिया उत्पन्न होती है। उस से [ संयुक्त कपाल आदि अवयवों
में ] विभाग [ उत्पन्न होता है ] उस [ विभाग ] से अवयवी [ घट आदि ] के
आरम्भक [ असमवायि कारण ] संयोग का नाश होता है। उससे कार्यद्रव्य
घटादि अवयवी का नाश होता है। इस [ उदाहरण ] से अवयवी [ घट आदि ]
के आरम्भक [ कपाल आदि के संयोग रूप ] असमवायि कारण के नाश [ होने ]
से द्रव्य का नाश दिखलाया है।
कहीं समवायिकारण के नाश [ होने ] से भी द्रव्य का नाश [ होता है ]
जैसे पूर्वोक्त पृथिवी आदि के संहार में ही संहारेच्छुक परमात्मा में संहार की
इच्छा उत्पन्न होती है। उससे द्व्यणुकों के आरम्भक परमाणुओं में क्रिया, [ और ]
उससे विभाग [ उत्पन्न होता है ] उस के बाद उन दोनों [ परमाणुओं ] के संयोग

परमाणुसिद्धिः ] प्रमेयनिरूपणम् १८३
नष्टेषु स्वाश्रयनाशात् त्र्यणुकादिनाशः । एवं क्रमेण पृथिव्यादिनाशः ।
यथा वा तन्तूनां नाशे पटनाशः । तद्गतानां रूपादीनां स्वाश्रयनाशेनैव
नाशः । अन्यत्र तु सत्येवाश्रये विरोधिगुणप्रादुर्भावेण विनाशः । यथा
पाकेन घटादौ रूपादिनाश इति ।
परमाणुसिद्धिः
किं पुनः परमाणुसद्भावे प्रमाणम् ?
उच्यते, यदिदं जालं सूर्यमरीचिस्थं सर्वतः सूक्ष्मतमं रज उपलभ्यते
तत् स्वल्पपरिमाणद्रव्यारब्धं कार्यद्रव्यत्वाद् घटवत् । तच्च द्रव्यं कार्यमेव
महद्द्रव्यारम्भकस्य कार्यत्वनियमात् । तदेवं द्व्यणुकाख्यं द्रव्यं
सिद्धम् । तदपि स्वल्पपरिमाणसमवायिकारणारब्धं कार्यद्रव्यत्वाद्
घटवत् । यस्तु द्व्यणुकारम्भकः स एव परमाणुः । स चानारब्ध एव ।
का नाश होने पर द्व्यणुकों के नष्ट हो जाने पर, अपने आश्रय [ अर्थात् त्र्यणुक
के आश्रय द्व्यणुक ] के नाश होने से त्र्यणुक आदि का नाश हो जाता है । इस
प्रकार [ त्र्यणुक के नाश से चतुरणुक आदि के नाश ] क्रम से [ स्थूल ] पृथिवी
आदि का नाश होता है । अथवा जैसे तन्तुओं का नाश हो जानेपर [ होने वाला ]
पट का नाश । [ दोनों उदाहरण समवायिकारण के नाश से कार्य के नाश को
दिखलाने वाले उदाहरण हैं । इन दोनों में ] उन [ त्र्यणुकादि अथवा पट आदि ]
में रहने वाले रूपादि [ गुणों ] का अपने आश्रय [ समवायि कारण ] के नाश से
ही नाश होता है । और अन्यत्र [ घट आदि में ] तो आश्रय [ घटादि ] के विद्यमान
रहते हुए ही विरोधी गुण [ पाकज रक्त रूपादि ] के प्रादुर्भाव से ही [ पूर्ववर्ती
रूपादि का ] नाश होता है । जैसे पाक से घटादि में रूपादि का नाश होता है ।
परमाणुसिद्धि —
[ प्रश्न ] अच्छा फिर परमाणु की सत्ता में क्या प्रमाण है ?
[ उत्तर ] कहते हैं । यह जो [ बन्द कमरे में किवाड़ आदि के किसी छिद्र
में से आती हुई ] सूर्यकिरणों में चारों ओर सूक्ष्मतम धूलि [ के कण ]
उपलब्ध होते हैं [ वह त्रसरेणु या त्र्यणुक कहलाते हैं । उनका षष्ठ भाग परमाणु
होता है ] वह कार्य द्रव्य होने से स्वल्प परिमाण वाले द्रव्य [ तीन द्व्यणुकों ]
से बना है घट के समान [ इस अनुमान से उस त्रसरेणु या त्र्यणुक रूप धूलि-
कण के अवयव रूप द्व्यणुक की सिद्धि होती है ] और वह [ द्व्यणुक ] भी
कार्य [ द्रव्य ] ही है । महत् [ परिमाण वाले त्र्यणुक ] के आरम्भक के कार्य
द्रव्य होने का नियम होने से । इस प्रकार द्व्यणुक नामक [ कार्यभूत ] द्रव्य
सिद्ध हुआ । वह भी स्वल्प परिमाण वाले द्रव्य से बना हुआ है कार्य द्रव्य
होने से घट के समान । और जो [ उस ] द्व्यणुक का कारण है वह ही

१८४ तर्कभाषा [ परमाणुसिद्धिः
ननु कार्यद्रव्यारम्भकस्य कार्यद्रव्यत्वाभिचारात् तस्य कथमनारब्ध-
त्वम् ? उच्यते, अनन्तकार्यपरम्परादोषप्रसङ्गात् । तथा च सत्यनन्त-
द्रव्यारब्धत्वाविशेषेण मेरुसर्षपयोरपि तुल्यपरिमाणत्वप्रसङ्गः । तस्माद्-
नारब्ध एव परमाणुः ।
परमाणु है । और वह अनारब्ध [ नित्य ] ही [ होता ] है ।
[ प्रश्न ] कार्य [ अनित्य ] द्रव्य के आरम्भक [ कारण ] का अवश्य
[ अनित्य ] कार्य द्रव्य होने का नियम होने से [ अनित्य द्वयणुक के उत्पादक ]
उस [ परमाणु ] का अनारब्धत्व [ नित्यत्व ] कैसे [ हो सकता ] है ?
[ उत्तर ] कहते हैं । [ परमाणु को अनित्य कार्य द्रव्य मानने पर ] अनन्त
कार्य-परम्परा का दोष आ जाने से । [ अर्थात् यदि परमाणु का भी कारण
माना जाय तो फिर उसके कारण का भी कारण, फिर उसका भी कारण, इस
प्रकार अनन्त कारण और अनन्त कार्य-परम्परा माननी होगी जिसकी कहीं
विश्रान्ति नहीं होगी ] और वैसा होनेपर [मेरु पर्वत और सरसों के दाना दोनों के]
अनन्त अवयवों से निर्मित होने में समानता होने से मेरु [पर्वत] और सरसों [ के
दाने ] का समान परिमाण होने लगेगा । [ क्योंकि मेरु के भी अनन्त अवयव
हैं और सर्षप के अनन्त अवयव हैं । इस लिये जब दोनों ही अनन्त अवयवों
से बने हैं तो दोनों का परिमाण भी समान मानना चाहिए । परन्तु ऐसा मानना
युक्ति विरुद्ध है ] इसलिए परमाणु अनारब्ध [ नित्य ] ही है ।
परमाणु को नित्य, अनारब्ध, या अवयवरहित मानने पर तो यह कहा
जा सकता है कि सरसों का दाना १०० पचास या किसी परिमित संख्या के
परमाणुओं से बना है और मेरु पर्वत उससे अरबों गुना अधिक परमाणुओं से
बना होने से उनके परिमाण में साम्य प्राप्त नहीं होता है। परन्तु परमाणु के
भी अवयव माने तो फिर सर्षप तथा सुमेरु दोनों के अवयवों की धारा कहीं
समाप्ति न हो सकेगी । अर्थात् दोनों के ही अनन्त अवयव होंगे इसलिए
दोनों के अनन्त अवयवों से निर्मित होने के कारण दोनों का आकार या
परिमाण समान मानना होगा । जो कि युक्तिसङ्गत नहीं है ।
द्वयणुक तथा त्र्यणुक के अवयवों का नियम —
इस प्रकार परमाणु की सत्ता और उसकी नित्यता सिद्ध की । अब यह
बतलाते हैं कि दो परमाणुओं से ही द्वयणुक की, और तीन द्वयणुकों से ही
एक त्र्यणुक की उत्पत्ति होती है ऐसा क्यों मानते हैं ? एक परमाणु से अथवा
तीन परमाणुओं से द्वयणुक की उत्पत्ति क्यों नहीं मानते ? इसी प्रकार

द्व्यणुकाद्यवयवनियमः ] प्रमेयनिरूपणम् १८५
द्व्यणुकादीनामवयवनियमः
द्व्यणुकं तु द्वाभ्यामेव परमाणुभ्यामारभ्यते। एकस्यानारम्भकत्वात्,
त्र्यादिकल्पनायां प्रमाणाभावात्। त्र्यणुकं तु त्रिभिरेव द्व्यणुकैरारभ्यते।

दो द्व्यणुकों अथवा चार द्व्यणुकों से एक त्र्यणुक की उत्पत्ति न मान कर तीन
ही द्व्यणुकों से एक त्र्यणुक की उत्पत्ति क्यों मानते हैं? इसका उत्तर यह है कि
एक परमाणु से कोई कार्य उत्पन्न नहीं हो सकता है। और जब दो परमाणुओं
से द्व्यणुक बन सकता है तब तीन तक क्यों बढ़ा जाय। इसी प्रकार त्र्यणुककी
उत्पत्ति तीन द्व्यणुकोंसे मानी है। उसमें भी एक द्व्यणुक से कार्यकी उत्पत्ति
नहीं हो सकती है। दो द्व्यणुकों से यदि त्र्यणुक की उत्पत्ति माने तो त्र्यणुक में पाया
जाने वाला 'महत्-परिमाण' उत्पन्न नहीं हो सकता है। क्योंकि 'महत्-परिमाण'
की उत्पत्ति के दो ही कारण हैं। एक 'कारण-महत्त्व', और दूसरा 'कारण-बहुत्व ।'
अर्थात् कार्य में जो 'महत्-परिमाण' उत्पन्न होता है वह या तो तब उत्पन्न हो
सकता है जब कि उसके कारण में 'महत्-परिमाण' हो। अथवा उसके कारण
में बहुत संख्या हो। इन दो के अतिरिक्त कार्य में 'महत्-परिमाण' की उत्पत्ति
का और कोई कारण नहीं है। त्र्यणुक का परिमाण 'महत्-परिमाण' है यह
'महत् परिमाण' तब ही उत्पन्न हो सकता है जब कि या तो त्र्यणुक के कारण
अर्थात् द्व्यणुक में 'महत्-परिमाण' हो अथवा उसमें बहुत्व संख्या हो।
सो त्र्यणुक के कारणभूत द्व्यणुक का परिमाण 'अणु-परिमाण' होने से उसमें
'महत्-परिमाण' तो रहता नहीं है। इसलिए त्र्यणुक के 'महत्-परिमाण' का
कारण, 'कारण-महत्त्व' तो बनता नहीं, इसलिए दूसरा कारण अर्थात् 'कारण-
बहुत्व' को ही द्व्यणुक के 'महत्-परिमाण' का कारण मानना चाहिए। और
बहुत संख्या कम से कम तीन की अपेक्षा रखती है। इसलिए दो द्व्यणुकों
से तो त्र्यणुक की उत्पत्ति नहीं हो सकती है। अतएव बहुत्व संख्या वाले तीन
द्व्यणुकों से ही त्र्यणुक की उत्पत्ति माननी चाहिए। और जब बहुत्व संख्या
तीन में बन जाती है तब आगे चार या पांच द्व्यणुकों को त्र्यणुक का कारण
मानने की आवश्यकता नहीं रहती। इसलिए तीन द्व्यणुकों से ही त्र्यणुक की
उत्पत्ति मानना उचित है। इसी बात को आगे कहते हैं।
द्व्यणुक तो दो परमाणुओं से ही बनता है। एक [ परमाणु ] के अनारम्भक
होने से और [ जब दो परमाणुओं से ही द्व्यणुक की उत्पत्ति बन जाती है तब ]
तीन आदि की कल्पना करने में कोई प्रमाण न होने से [ दो परमाणुओं से ही

१८६ तर्कभाषा [ आकाशद्रव्यम्
एकस्यानाम्भकत्वात् । द्वाभ्यामारम्भे कार्यगुणमहत्त्वानुपपत्तिप्रसङ्गात् ।
कार्ये हि महत्त्वं कारणमहत्त्वाद्वा कारणबहुत्वाद्वा । तत्र प्रथमस्यासम्भ-
वाच्चरममेषितव्यम् । न च चतुरादिकल्पनायां प्रमाणमस्ति त्रिभिरेव
महत्त्वारम्भोपपत्तेरिति ।
शब्दगुणमाकाशम् । शब्द-संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-संयोग-विभागवत् ।
एकं विभु नित्यञ्च । शब्दलिङ्गकञ्च ।
शब्दलिङ्गकत्वमस्य कथं ?
परिशेषात् । 'प्रसक्तप्रतिषेधेऽन्यत्राप्रसङ्गात् परिशिष्यमाणे सम्प्रत्ययः
परिशेषः' ।
द्व्यणुक की उत्पत्ति होती है ] । और त्र्यणुक तो तीन द्व्यणुकों से ही उत्पन्न
होता है । एक [ द्व्यणुक ] के आरम्भक होने से । दो [ द्व्यणुकों ] से
[ त्र्यणुक का ] आरम्भ मानने पर कार्य [ त्र्यणुक ] के गुण, महत् [ परिमाण ]
की अनुपपत्ति होने से [ दो [ द्व्यणुकों को त्र्यणुक का उत्पादक नहीं मान सकते
हैं ] । कार्य में महत्त्व [ 'महत् परिमाण' के ] कारण के 'महत् परिमाण'
से अथवा कारण के बहुत्व [ इन दो ही कारणों ] से आता है । उसमें से
[ त्र्यणुक के महत्त्व के उपपादन के लिए ] प्रथम [ अर्थात् कारण-महत्त्व ]
के असम्भव होने से [ त्र्यणुक के कारण द्व्यणुक में 'महत्-परिमाण' है ही नहीं
क्योंकि उसका परिमाण 'अणु-परिमाण' माना गया है । इसलिये कारणमहत्त्वात्
त्र्यणुक से महत्त्व असम्भव होने से ] अन्तिम [ अर्थात् 'कारण-बहुत्व' को ही
त्र्यणुक में 'महत्-परिमाण' का उत्पादक ] मानना चाहिए । [और वह बहुत्व,
तीन संख्या में बन जाता है इसलिये उससे अधिक ] चार आदि [ को कारण
मानने ] की कल्पना में प्रमाण नहीं है । तीन द्व्यणुकों से ही [त्र्यणुक के] महत्त्व
की उपपत्ति हो जाने से [ तीन से अधिक अथवा कम द्व्यणुकों को त्र्यणुक का
कारण मानना उचित नहीं है अपितु तीन द्व्यणुकों के ही त्र्यणुक का कारण
मानना चाहिए ] ।
आकाश-निरूपण—
शब्द गुण वाला आकाश है । १ शब्द, २ संख्या, ३ परिमाण, ४ पृथक्त्व,
५ संयोग, और ६ विभाग [ इन ६ गुणों ] वाला है । [ वह ] एक, नित्य, और
विभु और शब्दलिङ्गक [ अर्थात् शब्द रूप लिङ्ग से अनुमान द्वारा सिद्ध होने
वाला ] है ।
[ प्रश्न ] इस [ आकाश ] का शब्दलिङ्गत्व कैसे है !
[ उत्तर ] परिशेष [अनुमान] से [ सिद्ध होने के कारण ] । 'प्राप्त' का निषेध

आकाशद्रव्यम् ] प्रमेयनिरूपणम् १८७
तथाहि शब्दस्तावद् विशेषगुणः सामान्यवत्त्वे सत्यस्मदादिबाह्ये-
न्द्रियग्राह्यत्वाद् रूपांदिवत् । गुणश्च गुण्याश्रित एव । न चास्य पृथि-
व्यादिचतुष्टयमात्मा च गुणी भवितुमर्हति, श्रोत्रग्राह्यत्वाच्छब्दस्य । ये
हि पृथिव्यादीनां गुणा न ते श्रोत्रेन्द्रियेण गृह्यन्ते, यथा रूपादयः,
शब्दस्तु श्रोत्रेण गृह्यते । न दिक्कालमनसां गुणो विशेषगुणत्वात् । अत
एभ्योऽष्टभ्योऽतिरिक्तः शब्दगुणी एषितव्यः, स एवाकाश इति ।
स चैको, भेदे प्रमाणाभावात् । एकत्वेनैवोपपत्तेः। एकत्वाच्चाकाशत्वं
नाम सामान्यमाकाशे न विद्यते सामान्यस्यानेकवृत्तित्वात्-विभु चाकाशम्

हो जाने पर अन्य [ किसी को प्राप्ति ] का प्रसङ्ग न होने से जो बच रहे उसको
स्वीकार कर लेना 'परिशेष' [ अनुमान कहलाता है इस प्रकार परिशेषानुमान
का लक्षण भाष्यकार ने किया ] है ।
[ यहां शब्द के विषय में परिशेषानुमान का यह लक्षण इस प्रकार घटता
है कि ] जैसे शब्द सामान्य [ जाति ] युक्त होकर हमारी बाह्य एक [ श्रोत्र ]
इन्द्रिय से ग्राह्य होने से रूपादि के समान 'विशेष गुण' है। और गुण, गुणी के
आश्रित ही होता है । [ आकाश को छोड़कर शेष आठ द्रव्यों में से [ पृथिवी
आदि चार [ पृथिवी, अप्, तेज, वायु ] और आत्मा [ यह पांच ] इस [ शब्द-
गुण ] के गुणी नहीं हो सकते हैं। शब्द के श्रोत्र-ग्राह्य होने से [ पृथिवी आदि
चार और आत्मा इन पांचों के विशेष गुणों में से कोई भी श्रोत्र-ग्राह्य नहीं है
अतएव श्रोत्रग्राह्य शब्द इन पाँचों में से किसी का गुण नहीं हो सकता है ] जो
पृथिवी आदि के गुण हैं वह श्रोत्र इन्द्रिय से गृहीत नहीं होते हैं। जैसे रूपादि ।
और शब्द तो श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत होता है । [ इसलिए शब्द पृथिवी आदि
चार तथा आत्मा इन पांच का गुण नहीं है ] और न दिक्, काल, तथा मन
[ इन तीन ] का गुण है विशेष गुण होने से । [ दिक्, काल, और मन इन
तीनों में रहने वाले गुण सामान्य गुण हैं विशेष गुण नहीं और शब्द विशेष
गुण है इसलिए वह इन तीनों का भी गुण नहीं है ] । इसलिए इन आठों से
अतिरिक्त शब्द [ गुण ] का गुणी मानना चाहिए । वह ही आकाश है ।
और वह एक है भेद में [ साधक ] प्रमाण न होने से एकत्व से ही कार
हो जाने से [ आकाश को अनेक मानने की आवश्यकता नहीं है ] । एक होने के
कारण ही 'आकाशत्व' नामक सामान्य [ जाति ] आकाश में नहीं रहता है ।
सामान्य के अनेक में रहने वाला होने से । और आकाश विभु अर्थात् 'परममहत्-

१८८ तर्कभाषा [ आकाशद्रव्यम्
परममहत्परिमाणवदित्यर्थः¹। सर्वत्र तत्कार्योपलब्धेः। अतएव विभु-
त्वान्नित्यमिति।
परिमाण' वाला है। सर्वत्र उसका कार्य [ शब्द ] उपलब्ध होने से [ आकाश
विभु है ] और विभु होने से नित्य है।
एक होने से आकाश में 'आकाशत्व' जाति नहीं है। इसके कहने का
अभिप्राय यह है कि 'नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वम् सामान्यम्' यह
'सामान्य' का लक्षण किया गया है। अर्थात् 'सामान्य' नित्य और अनेक में
रहने वाला धर्म होता है। जैसे 'घटत्व', 'पटत्व' आदि 'सामान्य' कहलाते हैं।
वह अनेक घट तथा अनेक पट व्यक्तियों में रहने से और उन अनेक व्यक्तियों में
घटः, घटः इस प्रकार की एकाकार, अनुगत-प्रतीति के जनक होने से ही
'सामान्य' कहलाते हैं। परन्तु आकाश अनेक नहीं हैं इसलिए उसमें 'आका-
शत्व' नाम का 'सामान्य' नहीं रहता है। यद्यपि घटत्व के समान आकाश शब्द
के आगे भी 'त्व' प्रत्यय जोड़ कर 'आकाशत्व' व्यवहार होता है। परन्तु
'आकाशत्व' 'सामान्य' नहीं अपितु 'उपाधि' है।
काल-निरूपण—
आगे काल का निरूपण करते हैं। काल की सिद्धि दिग्विपरीत परत्व
और अपरत्व, से तथा दिक् की सिद्धि कालविपरीत परत्वापरत्व से अनुमान
द्वारा होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जो आयु में बड़ा है जिसके
साथ काल का अधिक सम्बन्ध है वह 'कालिक-दृष्टि' से 'पर' कहा जाता है।
और जिसके साथ काल का अल्प सम्बन्ध है अर्थात् जो आयु में छोटा है
उसे 'कालिक-दृष्टि' से 'अपर' कहते हैं इसी प्रकार जिसके साथ अधिक
देश का सम्बन्ध है अर्थात् जो अधिक दूर बैठा है वह 'दैशिक-दृष्टि' से 'पर' है
और जिसके साथ देश का अल्प सम्बन्ध है अर्थात् जो समीप स्थित है वह
'दैशिक-दृष्टि' से 'अपर' है। इस दशा में वृद्ध पुरुष, युवक की अपेक्षा 'कालिक
दृष्टि' से 'पर' है परन्तु यदि वही वृद्ध पुरुष जो काल की दृष्टि से 'पर' है,
युवक की अपेक्षा समीप बैठा हो तो उस में 'अपर' व्यवहार होगा। यही
दिग्-विपरीत तथा काल-विपरीत परत्व और अपरत्व है। अत एव दिग्विप-
रीत परत्वापरत्व से काल का और कालविपरीत परत्वापरत्व से दिक् का
अनुमान होता है। यही आगे कहते हैं।
१ पूना के संस्करण में 'परममहत्परिमाणवानित्यर्थः' इस प्रकार पुल्लिंग पाठ है।

कालद्रव्यम् ] प्रमेयनिरूपणम् १८६
कालोऽपि दिग्-विपरीतपरत्वापरत्वानुमेयः । संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-
संयोग-विभागवान् । एको नित्यो विभुश्च । कथमस्य दिग्-विपरीत-
परत्वापरत्वानुमेयत्वम् । उच्यते । सन्निहिते वृद्धे सन्निधानादपरत्वार्हे
तद्विपरीतं परत्वं प्रतीयते । व्यवहिते यूनि व्यवधानात् परत्वार्हे तद्वि-
परीतमपरत्वम् । तदिदं तत्तद्विपरीतं परत्वमपरत्वञ्च कार्यं तत्कारणस्य
दिगादेरसम्भवात् कालमेव कारणमनुमापयति । स चैकोऽपि
वर्तमानातीतभविष्यत्क्रियोपाधिवशाद् वर्तमानादिव्यपदेशं लभते, ।
पुरुष इव पच्यादिक्रियोपाधिवशात् पाचक-पाठकादिव्यपदेशम् । नित्यत्व-
विभुत्वे चास्य पूर्ववत् ।
कालविपरीतपरत्वापरत्वानुमेया दिक् । एका नित्या विभ्वी च ।
संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-संयोग-विभागवती । पूर्वादिप्रत्ययैरनुमेया ।
तेषामन्यनिमित्तासम्भवात् । पूर्वस्मिन् पश्चिमे वा देशे स्थितस्य
काल भी दिग्-विपरीत परत्व, अपरत्व से अनुमेय है । १ संख्या, २ परिमाण,
३ पृथक्त्व, ४ संयोग, ५ विभाग, [ इन पांच गुणों ] से युक्त, एक नित्य और
विभु है ।
[ प्रश्न ] इस का दिग्विपरीत परत्वापरत्व से अनुमेयत्व कैसे है ?
[ उत्तर ] कहते हैं । पास में स्थित अतएव सन्निधान के कारण [ 'दैशिक
दृष्टि' से ] 'अपरत्व' [ व्यवहार ] के योग्य वृद्ध [ पुरुष ] में उस [ अपरत्व ] के
विपरीत [ 'कालिकदृष्टि' से ] 'परत्व' प्रतीत होता है । [ इसी प्रकार ] दूरस्थ
अतएव व्यवधान के कारण [ 'दैशिक-दृष्टि' से [ 'परत्व' [ व्यवहार ] के योग्य
युवक में उस [ दैशिक परत्व ] के विपरीत 'अपरत्व' प्रतीत होता है । यह उस
उस [ दैशिक अपरत्व और परत्व ] के विपरीत 'परत्व', 'अपरत्व' कार्य, उसका
कारण दिगादि सम्भव न होने से से काल को ही कारण रूप में अनुमित कराता
है । वह एक होने पर भी वर्तमान, अतीत, भविष्यत् क्रिया रूप उपाधि के
सम्बन्ध से वर्तमान आदि संज्ञा को प्राप्त होता है जैसे पचन [ पठन ] आदि
क्रिया रूप उपाधि के कारण पुरुष पाचक, पाठक आदि व्यवहार को प्राप्त होता
है । इसके विभुत्व और नित्यत्व पूर्ववत् [ आकाश के समान ] होते हैं ।
'दिक्' का निरूपण—
कालविपरीत परत्व, अपरत्व से अनुमेय दिक्, एक, नित्य और विभु है ।
१ संख्या, २ परिमाण, ३ पृथक्त्व, ४ संयोग, ५ विभाग, [ इन पांचो गुणों ]
से युक्त है । पूर्व [ पश्चिम ] आदि ज्ञान से [ भी ] अनुमेय है उनका अन्य
निमित्त न होने से । पूर्व में या पश्चिम देश में स्थित वस्तु के समानरूप होने

१६० तर्कभाषा [ दिगात्ममनो द्रव्याणि
वस्तुनस्तादवस्थ्यात् । सा चैकापि सवितुस्तत्तद्देशसंयोगोपाधिवशात्
प्राच्यादिसंज्ञां लभते ।
आत्मत्वाभिसम्बन्धवान् आत्मा । सुखदुःखादिवैचित्र्यात् प्रतिशरीरं
भिन्नः । स चोक्त एव । तस्य सामान्यगुणाः संख्यादयः पञ्च, बुद्ध्यादयो
नव विशेषगुणाः । नित्यत्व-विभुत्वे पूर्ववत् ।
मनस्त्वाभिसम्बन्धवन्मनः । अणु, आत्मसंयोगि, अन्तरिन्द्रियम्
सुखाद्युपलब्धिकारणं नित्यञ्च । संख्याद्यष्टगुणवत् । तत्संयोगेन बाह्येन्द्रिय-
मर्थग्राहकम् । अतएव सर्वोपलब्धिसाधनम् । तच्च न प्रत्यक्षम्, अपि त्वनु-
मानगम्यम् । तथाहि सुखाद्युपलब्धयश्चक्षुराद्यतिरिक्तकरणसाध्याः,
[ पर भी यह पूर्व में रखी है या पश्चिम में इस प्रकार का व्यवहार-भेद होने का
दिक् के अतिरिक्त और कोई कारण न होने ] से । और वह एक होने पर भी
सूर्य के उस उस देश के साथ संयोग रूप उपाधि के वश पूर्व [ पश्चिम ] आदि
[ नाना ] संज्ञा को प्राप्त होती है ।
'आत्मा' का निरूपण—
आत्मत्व [ जाति ] के सम्बन्ध वाला आत्मा है । [ प्रत्येक व्यक्ति के ] सुख-
दुःखादि के वैचित्र्य होने से [ वह ] प्रत्येक शरीर में भिन्न भिन्न है । और उसका
वर्णन कर ही चुके हैं । उसके संख्या आदि पांच [ १ संख्या, २ परिमाण,
३ पृथक्त्व, ४ संयोग, ५ विभाग ] सामान्य गुण, और बुद्धि आदि नौ [ १ बुद्धि,
२ सुख, ३ दुःख, ४ इच्छा, ५ द्वेष, ६ प्रयत्न, ७ धर्म, ८ अधर्म, और ९ संस्कार]
विशेष गुण [ सब मिला कर १४ गुण ] हैं । नित्यत्व और विभुत्व पूर्ववत्
[ अर्थात् आकाश के समान ] है ।
'मन' का निरूपण—
मनस्त्व [ जाति ] के सम्बन्ध वाला मन अणु [ परिमाण वाला ] आत्म-
संयोगी और अन्तः इन्द्रिय है। सुखादि की उपलब्धि में कारण, नित्य, संख्या आदि
आठ [१ संख्या, २ परिमाण, ३ पृथक्त्व ४ संयोग, ५ विभाग, ६ परत्व, ७ अपरत्व,
८ संस्कार] गुणों से युक्त है । उसके संयोग से [ ही ] बाह्येन्द्रिय [अपने २] अर्थ
की ग्राहक होती है। इस लिए [ सब इन्द्रियों के अपने २ अर्थ के ग्रहण में
सहायक होने से ] सब [ विषयों ] की उपलब्धि का साधन है। वह प्रत्यक्ष
नहीं अपितु अनुमानगम्य है । जैसे कि [ अनुमान वाक्य का प्रयोग इस प्रकार
है ] सुखादि का ज्ञान चक्षु आदि से अतिरिक्त करण से साध्य है चक्षु आदि के
[ व्यापार के अथवा इन्द्रियों के ] न होने पर भी [ सुखादि के ] उत्पन्न होने से ।

गुणाः ] प्रमेयनिरूपणम् १६१
असत्स्वपि चक्षुरादिषु जायमानत्वात् । यद्वस्तु यद्विनैवोत्पद्यते तत्
तदतिरिक्तकरणसाध्यं, यथा कुठारं विनोत्पद्यमाना पचनक्रिया तद्-
तिरिक्तवह्न्यादिकरणसाध्या । यच्च करणं तन्मनः तच्च चक्षुराद्यतिरिक्तम् ।
तच्चाणुपरिमाणम् ।
द्रव्याण्युक्तानि ।
गुणाः
अथ गुणा उच्यन्ते । सामान्यवान् असमवायिकारणं स्पन्दात्मा
गुणः । स च द्रव्याश्रित एव । रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-संख्या-परिमाण-
पृथक्त्व-संयोग-विभाग-परत्व-अपरत्व-गुरुत्व-द्रवत्व-स्नेह-शब्द-बुद्धि-सुख-
दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्म-अधर्म-संस्कार-भेदाच्चतुर्विंशतिधा ।
१–तत्र रूपं चक्षुर्मात्रग्राह्यो विशेषगुणः । पृथिव्यादित्रयवृत्ति । तच्च
जो वस्तु जिस के बिना ही उत्पन्न होती है वह उससे भिन्न करण से उत्पन्न
होती है जैसे कुठार के बिना उत्पन्न होने वाली पचन क्रिया उससे भिन्न वह्नि
आदि करण से साध्य होती है । जो [ उसका ] करण है वह मन है और वह
चक्षु आदि [ बाह्येन्द्रियों ] से भिन्न है । और वह अणु परिमाण वाला है ।
द्रव्यों का वर्णन हो गया । [ इन नौ द्रव्यों में से किस में कितने गुण
रहते हैं । उसका संग्रह निम्न प्रकार किया है । ]
वायोर्नवैकादश तेजसो गुणा,-
जलक्षितिप्राणभृतां चतुर्दश ॥
दिक्कालयोः पञ्च षडेव चाम्बरे,
महेश्वरेऽष्टौ मनसस्तथैव च ॥
गुण-निरूपण—
अब गुणों का वर्णन करते हैं । सामान्यवान्, असमवायिकारण, कर्मभिन्न
गुण है । [ यह गुण का लक्षण है ] । और वह [गुण] द्रव्याश्रित ही [ रहता ]
है । १ रूप, २ रस, ३ गन्ध, ४ स्पर्श, ५ संख्या, ६ परिमाण, ७ पृथक्त्व,
८ संयोग, ९ विभाग, १० परत्व, ११ अपरत्व, १२ गुरुत्व, १३ द्रवत्व, १४
स्नेह, १५ शब्द, १६ बुद्धि, १७ सुख, १८ दुःख, १९ इच्छा, २० द्वेष, २१
प्रयत्न, २२ धर्म, २३ अधर्म और २४ संस्कार भेद से चौबीस प्रकार के हैं ।
१–रूप-निरूपण—
उनमें से चक्षुर्मात्रग्राह्य विशेष गुण 'रूप' है । [ संख्या, परिमाण आदि में
अतिव्याप्ति-वारण के लिए 'मात्र' तथा 'विशेष' पद का प्रयोग किया है । वह
१ न्याय-सिद्धान्त-मुक्तावली ।