तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्तिक्रमः ] प्रमेयनिरूपणम् १८१
कार्यद्रव्याणामुत्पत्तिविनाशक्रमः
तत्र पृथिव्यादीनां चतुर्णां कार्यद्रव्याणामुत्पत्तिविनाशक्रमः कथ्यते
द्वयोः परमाण्वोः क्रियया संयोगे सति द्व्यणुकमुत्पद्यते। तस्य परमाणू
समवायिकारणं, तत्संयोगोऽसमवायिकारणम्, अदृष्टादि निमित्तकारणम् ।
ततो द्व्यणुकानां त्रयाणां क्रियया संयोगे सति त्र्यणुकमुत्पद्यते । तस्य
द्व्यणुकानि समवायिकारणं, शेषं पूर्ववत् । एवं त्र्यणुकैश्चतुर्भिश्चतुरणुकम् ।
चतुरणुकैरपरं स्थूलतरं, स्थूलतरैरपरं स्थूलतमम् । एवं क्रमेण महापृथिवी,
महत्य आपो, महत् तेजो, महांश्च वायुरुत्पद्यते । कार्यगता रूपादयः
स्वाश्रयसमवायिकारणगतेभ्यो रूपादिभ्यो जायन्ते । 'कारणगुणा हि कार्य-
गुणानारभन्ते' इति न्यायात् ।
इन परमाणुओं से ही सारे जगत् की उत्पत्ति होती है। इसलिए पहिले इन
परमाणुओं से इस स्थूल जगत् की उत्पत्ति किस क्रम से होती है यह
दिखलाते हैं ।
उनमें पृथिवी आदि चार कार्यरूप द्रव्यों के उत्पत्ति और विनाश का क्रम
वर्णन करते हैं । दो परमाणुओ में [ परमात्मा के संकल्प और प्राणियों के अदृष्ट
के कारण होने वाली ] क्रिया से संयोग होने पर [ दोनों परमाणुओं से मिल कर
एक ] द्व्यणुक उत्पन्न होता है। दोनों परमाणु उस [ द्व्यणुक ] के समवायि-
कारण [ होते हैं ], उन [ दोनों परमाणुओं ] का संयोग असमवायि कारण, और
अदृष्टादि निमित्त कारण होता है । उसके बाद तीन द्व्यणुकों का [ईश्वर के संकल्प
तथा अदृष्ट आदि से जन्य] क्रिया से संयोग होने पर [ तीन द्व्यणुकों से मिलकर
एक] त्र्यणुक की उत्पत्ति होती है। तीनों द्व्यणुक उस [त्र्यणुक] के समवायिकारण
होते हैं और शेष पूर्ववत् [ अर्थात् तीनों द्व्यणुकों का संयोग त्र्यणुक का असम-
वायिकारण तथा अदृष्टादि निमित्त कारणं होता ] है। इसी प्रकार चार त्र्यणुकों
से चतुरणुक, चतुरणुकों से अन्य स्थूलतर, और स्थूलतरों से अन्य स्थूलतम
[ पदार्थ ] उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार [ महा ] स्थूल पृथिवी, [महत्] स्थूल जल,
[ महत् ] स्थूल तेज, और [ महान् ] स्थूल वायु उत्पन्न होता है । कार्य [ पृथिवी
आदि ] में रहने वाले रूप आदि [ गुण ] अपने [ रूपादि के ] आश्रय [ भूत
द्व्यणुकादि ] के समवायिकारण [परमाणु आदि] में रहने वाले रूप आदि [गुणों]
से उत्पन्न होते हैं। 'कारण के गुण कार्य के गुणों को उत्पन्न करते हैं' इस नियम
के होने से ।
कार्य द्रव्यों के विनाश का क्रम—
आगे विनाश का क्रम कहते हैं । कार्य के विनाश के दो प्रकार हैं ।