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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 330 में से

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पृष्ठ 251

१८६ तर्कभाषा [ आकाशद्रव्यम्
एकस्यानाम्भकत्वात् । द्वाभ्यामारम्भे कार्यगुणमहत्त्वानुपपत्तिप्रसङ्गात् ।
कार्ये हि महत्त्वं कारणमहत्त्वाद्वा कारणबहुत्वाद्वा । तत्र प्रथमस्यासम्भ-
वाच्चरममेषितव्यम् । न च चतुरादिकल्पनायां प्रमाणमस्ति त्रिभिरेव
महत्त्वारम्भोपपत्तेरिति ।
शब्दगुणमाकाशम् । शब्द-संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-संयोग-विभागवत् ।
एकं विभु नित्यञ्च । शब्दलिङ्गकञ्च ।
शब्दलिङ्गकत्वमस्य कथं ?
परिशेषात् । 'प्रसक्तप्रतिषेधेऽन्यत्राप्रसङ्गात् परिशिष्यमाणे सम्प्रत्ययः
परिशेषः' ।
द्व्यणुक की उत्पत्ति होती है ] । और त्र्यणुक तो तीन द्व्यणुकों से ही उत्पन्न
होता है । एक [ द्व्यणुक ] के आरम्भक होने से । दो [ द्व्यणुकों ] से
[ त्र्यणुक का ] आरम्भ मानने पर कार्य [ त्र्यणुक ] के गुण, महत् [ परिमाण ]
की अनुपपत्ति होने से [ दो [ द्व्यणुकों को त्र्यणुक का उत्पादक नहीं मान सकते
हैं ] । कार्य में महत्त्व [ 'महत् परिमाण' के ] कारण के 'महत् परिमाण'
से अथवा कारण के बहुत्व [ इन दो ही कारणों ] से आता है । उसमें से
[ त्र्यणुक के महत्त्व के उपपादन के लिए ] प्रथम [ अर्थात् कारण-महत्त्व ]
के असम्भव होने से [ त्र्यणुक के कारण द्व्यणुक में 'महत्-परिमाण' है ही नहीं
क्योंकि उसका परिमाण 'अणु-परिमाण' माना गया है । इसलिये कारणमहत्त्वात्
त्र्यणुक से महत्त्व असम्भव होने से ] अन्तिम [ अर्थात् 'कारण-बहुत्व' को ही
त्र्यणुक में 'महत्-परिमाण' का उत्पादक ] मानना चाहिए । [और वह बहुत्व,
तीन संख्या में बन जाता है इसलिये उससे अधिक ] चार आदि [ को कारण
मानने ] की कल्पना में प्रमाण नहीं है । तीन द्व्यणुकों से ही [त्र्यणुक के] महत्त्व
की उपपत्ति हो जाने से [ तीन से अधिक अथवा कम द्व्यणुकों को त्र्यणुक का
कारण मानना उचित नहीं है अपितु तीन द्व्यणुकों के ही त्र्यणुक का कारण
मानना चाहिए ] ।
आकाश-निरूपण—
शब्द गुण वाला आकाश है । १ शब्द, २ संख्या, ३ परिमाण, ४ पृथक्त्व,
५ संयोग, और ६ विभाग [ इन ६ गुणों ] वाला है । [ वह ] एक, नित्य, और
विभु और शब्दलिङ्गक [ अर्थात् शब्द रूप लिङ्ग से अनुमान द्वारा सिद्ध होने
वाला ] है ।
[ प्रश्न ] इस [ आकाश ] का शब्दलिङ्गत्व कैसे है !
[ उत्तर ] परिशेष [अनुमान] से [ सिद्ध होने के कारण ] । 'प्राप्त' का निषेध