तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ तर्कभाषा [ पृथिवीद्रव्यम्
पृथिव्यादि द्रव्याणि ।
तत्र पृथिवीत्वसामान्यवती पृथिवी काठिन्यकोमलत्वाद्यवयव-
संयोगविशेषेण युक्ता । घ्राण-शरीर-मृत्पिण्ड-पाषाण-वृक्षादिरूपा ।
रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-संयोग-विभाग-परत्व-अपर-
त्व-गुरुत्व-द्रवत्व-संस्कारवती । सा च द्विविधा, नित्याऽनित्या च । नित्या
परमाणुरूपा । अनित्या च कार्यरूपा । द्विविधायाः पृथिव्या रूप-
दर्शनों में हुई है। न्याय दर्शन में साध्यतम हेत्वाभास का निरूपण करते
हुए भाष्यकार ने लिखा है—
‘द्रव्यं छायेति साध्यं, गतिमत्त्वादिति हेतुः । साध्येनाविशिष्टः साधनी-
यत्वात् साध्यसमः । अयमप्यसिद्धत्वात् साध्यवत्प्रज्ञापयितव्यः । साध्यं तावदे-
तत् किं पुरुषवच्छायापि गच्छति, आहोस्वित्दावरकद्रव्ये संसर्पति, आवरणस-
न्तानादसन्निधिसन्तानोऽयं तेजसो गृह्यते इति । सर्पता खलु द्रव्येण यो यस्ते-
जोभाग आव्रियते तस्य तस्यासन्निधिरेव अविच्छिन्नो गृह्यते इति । आवरणन्तु
प्राप्तिप्रतिषेधः ।
यहां 'तम' शब्द का प्रयोग न करके 'छाया' शब्द का प्रयोग किया है ।
तेजोऽभाव का ही नाम तम या छाया है । उस छाया में गति नहीं रहती है
अपितु आवरक द्रव्य में गति होने से जहां जहां तेज का अभाव होता जाता है
वहां छाया चलती प्रतीत होती है यह सिद्ध किया है । इसी विषय की चर्चा
वैशेषिक दर्शन के पञ्चम अध्याय के द्वितीय आह्निक के निम्न दो सूत्रों में की
गई है—
द्रव्यगुणकर्मनिष्पत्तिवैधर्म्यादभावस्तमः ॥ १९ ॥
तेजसो द्रव्यान्तरेणावरणाच्च ॥ २० ॥
पृथिवी निरूपण—
उन [ पृथिवी आदि नौ द्रव्यों ] में [ से ] पृथिवीत्व जाति [ सामान्य ] से
युक्त पृथिवी [ कहलाती ] है । [ वह ] कठोर [ लोहा पत्थर आदि में ] और
कोमल [ रूई धूल आदि में ] आदि अवयव संयोग विशेष से युक्त [ होती ] है ।
[ वह शरीर, इन्द्रिय और विषय भेद से तीन प्रकार की होती है । ] घ्राण
[ इन्द्रिय ] शरीर [ मनुष्य आदि का ] और मिट्टी का पिण्ड पत्थर वृक्ष आदि
[ विषय ] रूप [ तीन भेद वाली ] है । १ रूप, २ रस, ३ गन्ध, ४ स्पर्श,
५ संख्या, ६ परिमाण, ७ पृथक्त्व, ८ संयोग, ९ विभाग, १० परत्व, ११
अपरत्व, १२ गुरुत्व, १३ द्रवत्व, १४ संस्कार [ इन चौदह गुणों से ] युक्त है ।
१ न्याय दर्शन वात्स्यायन भाष्य १, २, ४९ । २ वैशेषिक दर्शन ५, २, १९-२० ।