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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 330 में से

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पृष्ठ 249

१८४ तर्कभाषा [ परमाणुसिद्धिः
ननु कार्यद्रव्यारम्भकस्य कार्यद्रव्यत्वाभिचारात् तस्य कथमनारब्ध-
त्वम् ? उच्यते, अनन्तकार्यपरम्परादोषप्रसङ्गात् । तथा च सत्यनन्त-
द्रव्यारब्धत्वाविशेषेण मेरुसर्षपयोरपि तुल्यपरिमाणत्वप्रसङ्गः । तस्माद्-
नारब्ध एव परमाणुः ।
परमाणु है । और वह अनारब्ध [ नित्य ] ही [ होता ] है ।
[ प्रश्न ] कार्य [ अनित्य ] द्रव्य के आरम्भक [ कारण ] का अवश्य
[ अनित्य ] कार्य द्रव्य होने का नियम होने से [ अनित्य द्वयणुक के उत्पादक ]
उस [ परमाणु ] का अनारब्धत्व [ नित्यत्व ] कैसे [ हो सकता ] है ?
[ उत्तर ] कहते हैं । [ परमाणु को अनित्य कार्य द्रव्य मानने पर ] अनन्त
कार्य-परम्परा का दोष आ जाने से । [ अर्थात् यदि परमाणु का भी कारण
माना जाय तो फिर उसके कारण का भी कारण, फिर उसका भी कारण, इस
प्रकार अनन्त कारण और अनन्त कार्य-परम्परा माननी होगी जिसकी कहीं
विश्रान्ति नहीं होगी ] और वैसा होनेपर [मेरु पर्वत और सरसों के दाना दोनों के]
अनन्त अवयवों से निर्मित होने में समानता होने से मेरु [पर्वत] और सरसों [ के
दाने ] का समान परिमाण होने लगेगा । [ क्योंकि मेरु के भी अनन्त अवयव
हैं और सर्षप के अनन्त अवयव हैं । इस लिये जब दोनों ही अनन्त अवयवों
से बने हैं तो दोनों का परिमाण भी समान मानना चाहिए । परन्तु ऐसा मानना
युक्ति विरुद्ध है ] इसलिए परमाणु अनारब्ध [ नित्य ] ही है ।
परमाणु को नित्य, अनारब्ध, या अवयवरहित मानने पर तो यह कहा
जा सकता है कि सरसों का दाना १०० पचास या किसी परिमित संख्या के
परमाणुओं से बना है और मेरु पर्वत उससे अरबों गुना अधिक परमाणुओं से
बना होने से उनके परिमाण में साम्य प्राप्त नहीं होता है। परन्तु परमाणु के
भी अवयव माने तो फिर सर्षप तथा सुमेरु दोनों के अवयवों की धारा कहीं
समाप्ति न हो सकेगी । अर्थात् दोनों के ही अनन्त अवयव होंगे इसलिए
दोनों के अनन्त अवयवों से निर्मित होने के कारण दोनों का आकार या
परिमाण समान मानना होगा । जो कि युक्तिसङ्गत नहीं है ।
द्वयणुक तथा त्र्यणुक के अवयवों का नियम —
इस प्रकार परमाणु की सत्ता और उसकी नित्यता सिद्ध की । अब यह
बतलाते हैं कि दो परमाणुओं से ही द्वयणुक की, और तीन द्वयणुकों से ही
एक त्र्यणुक की उत्पत्ति होती है ऐसा क्यों मानते हैं ? एक परमाणु से अथवा
तीन परमाणुओं से द्वयणुक की उत्पत्ति क्यों नहीं मानते ? इसी प्रकार