तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 248, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरमाणुसिद्धिः ] प्रमेयनिरूपणम् १८३
नष्टेषु स्वाश्रयनाशात् त्र्यणुकादिनाशः । एवं क्रमेण पृथिव्यादिनाशः ।
यथा वा तन्तूनां नाशे पटनाशः । तद्गतानां रूपादीनां स्वाश्रयनाशेनैव
नाशः । अन्यत्र तु सत्येवाश्रये विरोधिगुणप्रादुर्भावेण विनाशः । यथा
पाकेन घटादौ रूपादिनाश इति ।
परमाणुसिद्धिः
किं पुनः परमाणुसद्भावे प्रमाणम् ?
उच्यते, यदिदं जालं सूर्यमरीचिस्थं सर्वतः सूक्ष्मतमं रज उपलभ्यते
तत् स्वल्पपरिमाणद्रव्यारब्धं कार्यद्रव्यत्वाद् घटवत् । तच्च द्रव्यं कार्यमेव
महद्द्रव्यारम्भकस्य कार्यत्वनियमात् । तदेवं द्व्यणुकाख्यं द्रव्यं
सिद्धम् । तदपि स्वल्पपरिमाणसमवायिकारणारब्धं कार्यद्रव्यत्वाद्
घटवत् । यस्तु द्व्यणुकारम्भकः स एव परमाणुः । स चानारब्ध एव ।
का नाश होने पर द्व्यणुकों के नष्ट हो जाने पर, अपने आश्रय [ अर्थात् त्र्यणुक
के आश्रय द्व्यणुक ] के नाश होने से त्र्यणुक आदि का नाश हो जाता है । इस
प्रकार [ त्र्यणुक के नाश से चतुरणुक आदि के नाश ] क्रम से [ स्थूल ] पृथिवी
आदि का नाश होता है । अथवा जैसे तन्तुओं का नाश हो जानेपर [ होने वाला ]
पट का नाश । [ दोनों उदाहरण समवायिकारण के नाश से कार्य के नाश को
दिखलाने वाले उदाहरण हैं । इन दोनों में ] उन [ त्र्यणुकादि अथवा पट आदि ]
में रहने वाले रूपादि [ गुणों ] का अपने आश्रय [ समवायि कारण ] के नाश से
ही नाश होता है । और अन्यत्र [ घट आदि में ] तो आश्रय [ घटादि ] के विद्यमान
रहते हुए ही विरोधी गुण [ पाकज रक्त रूपादि ] के प्रादुर्भाव से ही [ पूर्ववर्ती
रूपादि का ] नाश होता है । जैसे पाक से घटादि में रूपादि का नाश होता है ।
परमाणुसिद्धि —
[ प्रश्न ] अच्छा फिर परमाणु की सत्ता में क्या प्रमाण है ?
[ उत्तर ] कहते हैं । यह जो [ बन्द कमरे में किवाड़ आदि के किसी छिद्र
में से आती हुई ] सूर्यकिरणों में चारों ओर सूक्ष्मतम धूलि [ के कण ]
उपलब्ध होते हैं [ वह त्रसरेणु या त्र्यणुक कहलाते हैं । उनका षष्ठ भाग परमाणु
होता है ] वह कार्य द्रव्य होने से स्वल्प परिमाण वाले द्रव्य [ तीन द्व्यणुकों ]
से बना है घट के समान [ इस अनुमान से उस त्रसरेणु या त्र्यणुक रूप धूलि-
कण के अवयव रूप द्व्यणुक की सिद्धि होती है ] और वह [ द्व्यणुक ] भी
कार्य [ द्रव्य ] ही है । महत् [ परिमाण वाले त्र्यणुक ] के आरम्भक के कार्य
द्रव्य होने का नियम होने से । इस प्रकार द्व्यणुक नामक [ कार्यभूत ] द्रव्य
सिद्ध हुआ । वह भी स्वल्प परिमाण वाले द्रव्य से बना हुआ है कार्य द्रव्य
होने से घट के समान । और जो [ उस ] द्व्यणुक का कारण है वह ही