सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 241

१७६ तर्कभाषा [ आपो द्रव्यम्
अप्त्वामान्ययुक्ता आपः । रसनेन्द्रियशरीरसरित्समुद्रहिमकरका-
दिरूपाः। गन्धवर्जस्नेहयुक्तपूर्वोक्तगुणवत्यः। नित्या अनित्याश्च। नित्यानां
रूपादयो नित्या एव । अनित्यानां रूपादयोऽनित्या एव ।
हैं । घड़े के अविकल रूप में बने रहने से भीतर के अवयवों में अग्नि का
सम्बन्ध नहीं हो सकता है । इसलिए उसमें श्याम रूप का नाश और रक्त रूप
की उत्पत्ति भी नहीं हो सकती है । यदि यह कहा जाय कि परमाणुओं के
भीतर अग्नि का प्रवेश हो जाने से घट में ही पाकज गुणों की उत्पत्ति हो सकती
है, तो ‘पीलूपाकवादी’ इसी को घटादि कार्य द्रव्य का नाश कहता है । क्योंकि
पहिले से घट के परमाणुओं में तनिक भी अन्तर या अवकाश नहीं है । बाद में
अग्नि का संयोग होने पर अग्नि के ताप से प्रत्येक वस्तु फैलती है, विज्ञान के
इस सिद्धान्त के अनुसार घटादि के अवयवों में भी फैलाव होता है अर्थात् उसके
संयुक्त परमाणुओं में थोड़ा सा विभाग हो जाता है । ‘पीलूपाकवादी’ वैशेषिक
इस से ही द्रव्यारम्भक संयोग का नाश, और उसके कारण, घट आदि द्रव्य का
नाश मान लेता है ।
न्याय का पिठरपाक—
पाक के पूर्व, घट के परमाणुओं में इतना अन्तर नहीं रहता है कि उनके
भीतर अग्नि प्रवेश कर सके । जब अग्नि के संयोग से वह परमाणु इतने
विभक्त हो जाते हैं कि उनमें अग्नि को प्रवेश करने का अवसर मिल जाता है
तो वैशेषिक मत में घट के अवयवों का यह विभाग ही घट का विनाश कहलाता
है । इसलिए ‘पिठर’ अर्थात् पिण्ड में नहीं, अपितु ‘पीलू’ अर्थात् परमाणु में ही
पाक होता है । यही वैशेषिक का ‘पीलूपाक’ सिद्धान्त हुआ ।
परन्तु ‘पिठरपाकवादी’ नैयायिक परमाणुओंके बीच अग्नि का प्रवेश मानने
पर भी उसे द्रव्य का नाश नहीं कहता है । उसे द्रव्यनाश कहने से उत्पत्ति
और विनाश की प्रक्रिया का गौरव व्यर्थ ही मानना होता है । अतः वह ‘पिठर’
अर्थात् ‘पिण्ड’ में ही पाक मानता है । यही इन दोनों का भेद है ।
आपो निरूपण—
अप्त्व जाति से युक्त आप् [ जल ] है । रसनेन्द्रिय, [ वरुणलोक में प्रसिद्ध
जलीय ] शरीर, और सरित्, समुद्र, हिम [ बर्फ ] और ओला आदि रूप
[ विषय ] है । [ पृथिवी के जो १४ गुण गिनाए थे उनमें से गन्ध को हटा कर
उसके स्थान पर स्नेह को रख देने से ] गन्ध रहित और स्नेह युक्त पूर्वोक्त
चौदह गुणों [ अर्थात् १ रूप २ रस, ३ स्नेह, ४ स्पर्श, ५ संख्या, ६ परिमाण,
७ पृथक्त्व, ८ संयोग, ९ विभाग, १० परत्व, ११ अपरत्व, १२ गुरुत्व, १३ द्रवत्व