तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुवर्णं तैजसम् ] प्रमेयनिरूपणम् १७६
सुवर्णन्तु उद्भूताभिभूतरूपस्पर्शम् । तदनुद्भूतरूपत्वेऽचाक्षुषं
स्यात्, अनुद्भूतस्पर्शत्वे त्वचा न गृह्येत । अभिभवस्तु बलवत्सजाती-
येन पार्थिवरूपेण स्पर्शेन च कृतः ।
अनुद्भूतरूपस्पर्शं तेजो यथा चक्षुरिन्द्रियम् । अनुद्भूतरूप-
मुद्भूतस्पर्शं यथा तप्तवारिस्थं तेजः । उद्भूतरूपमनुद्भूतस्पर्शं यथा
प्रदीपप्रभामण्डलम् ।
माना है । अर्थात् उसके उष्णस्पर्श और भास्वर शुक्ल रूप को विजातीय और
बलवद् पार्थिव रूप तथा स्पर्श ने अभिभूत कर दिया है । इसलिये उसमें
पीतरूप और अनुष्णाशीतस्पर्श प्रतीत होता है । उसमें रूप अथवा स्पर्श में से
किसी को भी अनुद्भूत नहीं मान सकते हैं क्योंकि रूप के अनुद्भूत होने पर
उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष न होगा और स्पर्श के अनुद्भूत होने पर त्वचा से उसका
ग्रहण सम्भव नहीं होगा । इसलिए रूप तथा स्पर्श के अनुद्भूतत्व के आधार
पर तेज के जो चार भेद ऊपर दिखाए हैं उन चारों से भिन्न सुवर्ण एक अलग
ही पांचवां भेद 'उद्भूताभिभूतरूपस्पर्श' है। यही बात आगे कहते हैं ।
सुवर्णं तो [ पूर्वोक्त चारो भेदों में से भिन्न ] 'उद्भूताभिभूतरूपस्पर्श' [पांचवां
भेद ] है । [ क्योंकि ] अनुद्भूतरूप होने पर वह अचाक्षुष हो जायगा और
अनुद्भूतस्पर्श होने पर त्वचा से गृहीत नहीं होगा । [ इसलिए उसके रूप और
स्पर्श दोनों को उद्भूत मानना होगा । परन्तु उसमें अग्नि के भास्वर शुक्ल रूप
तथा उष्णस्पर्श के स्थान पर पीत रूप और अनुष्णाशीत स्पर्श उपलब्ध होता है
इस कारण उसको 'उद्भूताभिभूतरूपस्पर्श' पांचवां भेद मानना चाहिए । उसके
रूप और स्पर्श का ] अभिभव तो बलवान् सजातीय पार्थिव रूप तथा स्पर्श ने
कर दिया है । [ इसलिए पार्थिव रूप और स्पर्श से अभिभूत होने से पीत रूप
और अनुष्णाशीतस्पर्श सुवर्ण में उपलब्ध होता है ] ।
२ अनुद्भूतरूपस्पर्श तेज [ का उदाहरण ] जैसे चक्षुः इन्द्रिय । [ चक्षुः
तैजस इन्द्रिय है । परन्तु उस में तेज का भास्वरशुक्ल रूप तथा उष्णस्पर्श दोनों
अनुभव नहीं होते हैं ] ।
३ अनुद्भूतरूप और उद्भूतस्पर्श [ वाले तेज का उदाहरण ] जैसे गरम
पानी में स्थित तेज [ उस में उष्णस्पर्श तो अनुभव होता है परन्तु भास्वर शुक्ल
रूप अनुभव नहीं होता है ] ।
४ उद्भूतरूप और अनुद्भूत स्पर्श [ वाले तेज का उदाहरण ] जैसे, दीपक
का प्रकाश-मण्डल । उसका भास्वर शुक्ल रूप तो दिखाई देता है परन्तु उष्ण-
स्पर्श अधिक दूर पर अनुभव नहीं होता है ] ।